मसालों के लिए मशहूर तेकड़ी उन पर्यटकों के लिए स्वर्ग है, जो शहरी भागदौड़ से दूर प्रकृति की गोद में शांत और रोमांचक समय व्यतीत करना चाहते हैं। इस छोटे कस्बे की बनावट ऐसी है कि आपका इस पर दिल आना तय है। प्राकृतिक रूप से बने रास्ते ट्रेकिंग करने वालों को सहज ही भा जाते हैं, क्योंकि इन्हीं रास्तों पर चलकर आप पक्षियों का कलरव सुन सकते हैं और दुर्लभ जीवों और पेड़-पौधों को देखकर अलग ही रोमांचक अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। यहां आग्नेय चट्टानों की ऊंची पहाडि़यों पर फैले वन और उनके भीतर मौजूद अतुलनीय जैवविविधता हर किसी को बांध लेती है। 

वैसे सौंदर्य से भरपूर पेरियार घाटी के आगोश में समुद्र तल से लगभग 1700 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस स्थान का जादू आप यहां आकर ही महसूस कर पाएंगे। यहां की बारिश हो या फिर चाय-कॉफी के बागान या इलायची के खेत, ये सब मन को बांधने वाले दृश्य पैदा करते हैं। यहां का जंगल जैवविविधता के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इसकी घाटियां, झरने और कलकल करते पानी के सोते मन मोह लेते हैं। यहीं केरल का सबसे बड़ा वन्य जीव अभयारण्य पेरियार टाइगर रिजर्व भी है।

तेकड़ी का अर्थ

हिंदीभाषी लोग इस स्थान के नाम का गलत उच्चारण करते रहे हैं। उनके द्वाराप्रयुक्त नामों में 'थेकड्डी' सबसे आम है। यह रोमन में इस स्थल कीस्पेलिंग की वजह से होता है, वरना स्थानीय भाषा मलयालम में इस स्थान का नाम तेकड़ी है। तेकड़ी शब्द, 'तेक' से आया है। मलयालम में तेक सागवान के वृक्ष के लिए प्रयोग में आता है। यहां के जंगलों में सागवान के वृक्षों की बहुलता इसके नाम को सार्थक करती है।

मूल निवासियों से मुलाकात

यह स्थान अपने हरे-भरे जीवन के लिए जाना जाता है। लेकिन यहां के मूल निवासियों से मिलकर लगता है कि जितनी हरियाली बाहर है, उतनी ही उनके मन में भी। प्रकृति से सामंजस्य बनाते हुए रहना इनसे सीखा जा सकता है। तेकड़ी के मूल निवासी यहां के आदिवासी ही हैं। यहां मुथुवान, एजवा आदि आदिवासियों की एक बड़ी जनसंख्या यहां निवास करती है। जंगलों के बीचोबीच बसी उनकी बस्तियां उनके जीवन में उपस्थित रोमांच को दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं। ये लोग तेकड़ी के सौंदर्य में विशेष योगदान करते हैं। आप यहां ठहरकर उनके बीच जा सकते हैं और यहां रहकर उनकी सदियों पुरानी विशिष्ट पहचान से रूबरू हो सकते हैं।

शानदार है ट्रेकिंग का अनुभव

तेकड़ी के आसपास घूमने-फिरने और ट्रैकिंग के रोमांच को जी सकने वाले जगहों की भरमार है। इनमें प्रमुख हैं-रामक्कलमेड़, परिंदुपारा, कलावरी माउंट आदि। इसके साथ-साथ लोग एलापारा नामक स्थान पर भी जा सकते हैं। इस गांव का नाम ही इलायची यानि एला के नाम पर पड़ है। इसके साथ-साथ पर्यटक गवी की यात्रा भी करते हैं। तेकड़ी से गवी के लिए जीप सफारी उपलब्ध रहती है। इस तरह यह दोहरे आनंद की जगह बन जाती है।

यह है अनूठा टाइगर ट्रेल

रोमांच के शौकीन पर्यटकों के लिए यह एक नायाब तोहफा है। यहां रात के समय ट्रेकिंग करने वालों की दो टोलियां जंगल के सघन हिस्से में जाती हैं। इस समय जंगली जानवरों को उनके प्राकृतिक वातावरण में देखने की संभावना बहुत ज्यादा रहती है। पांच से आठ लोगों की दो टोलियों को प्रशिक्षित गाइड और हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों के साथ जंगल में जाने दिया जाता है। इसे 'जंगल नाइट पेट्रोल' के नाम से भी जाना जाता है। सघन वन में बड़े जानवर रात के अंधेरे में शिकार करते देखे जा सकते हैं। यह ट्रेकिंग रात के अंधेरे और जानवरों की वजह से रोमांचक तो होती ही है, साथ में एक और विशेषता इसे रोमांचक बनाती है। केरल सरकार के पर्यटन विभाग ने जिन लोगों को गाइड के रूप में चुना है, उन्हें उस जंगल के चप्पे-चप्पे का अनुभव होता है। साथ ही जानवरों के व्यवहार को भी वे बखूबी समझते हैं। यह जानना काफी दिलचस्प है कि ये गाइड्स वे लोग हैं, जो उन्हीं जंगलों में पहले तस्कर रह चुके हैं। उन्हें पुनर्वास और रोजगार देने के साथ-साथ उनके जीवन को मुख्यधारा में लौटाने के लिए यह प्रशंसनीय प्रयास किया गया है। ये गाइड्स जानवरों से नजदीकी मुठभेड़ों के कई रोचक किस्से बड़ी रोचकता से सुनाते हैं। केरल पर्यटन (केटीडीसी) की वेबसाइट पर जाकर हर रात जाने वाली उन दो टोलियों में अपना नाम आरक्षित कराया जा सकता है।

बांस की नाव पर राफ्टिंग

इसे 'बोंडी राफ्टिंग' भी कहते हैं। बोंडी यानी बांस की नाव। तेकड़ी आने पर इन नावों की सवारी जरूर करना चाहिए। यह सबसे रोमांचक होता है। बांस की मोटी-मोटी बल्लियों को एक साथ रखकर बनाई गई यह नाव लकड़ी या प्लास्टिक की नावों से अलग होती है। यह पानी की सतह पर जैसे तैरती है, वह यात्री को स्वयं पानी पर फिसलने जैसा अनुभव देती है। सुबह आठ बजे से देर शाम तक चलने वाली यह यात्रा जीवन भर के लिए यादगार रह जाती है। इसमें आपको दस-दस यात्रियों के दलों में स्थानीय मूल निवासी गाइड और हथियारबंद सुरक्षाकर्मी के साथ ले जाया जाता है। वे गाइड किसी भी आपात स्थिति में उचित सहायता के लिए प्रशिक्षित भी हैं। पर्यटकों को घने जंगल के रास्ते ट्रेकिंग करवाते हुए ले जाया जाता है। इसी ट्रेक में पश्चिमी घाट की पहाडि़यों का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है और जंगली जीवों के दर्शन होते हैं। इसके बाद बांस की नावों की तीन घंटे लंबी यात्रा होती है, जो जंगल को इतने करीब से देखने का अद्वितीय आनंद देती है।

बागानों की सैर

तेकड़ी केवल अपने जंगल के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बागानी कृषि के लिए भी मशहूर है। यहां इलायची, काली मिर्च, चाय-कॉफी व अन्य मसालों की खेती होती है। बागानों में गाइडेड टूर भी आयोजित किए जाते हैं, जो पर्यटकों को बागानी कृषि की बारीकियों को समझने के साथ-साथ उन्हें उगते हुए देखने और मसालों के पेड़-पौधों को पहचानने का भी अवसर देते हैं। यहां कुमली में जिला पर्यटन कार्यालय द्वारा बागानों की यात्रा आयोजित की जाती है। पर्यटक वहां से टिकट लेकर इस अनूठी ट्रेकिंग का आनंद ले सकते हैं। यह उन लोगों के लिए भी मुफीद है, जो कठिन और मध्यम स्तर की ट्रेकिंग नहीं कर सकते हैं। उन्हें यहां केरल की असल पहचान से मिलने का अवसर होता है। वे मसालों की उस दुनिया को करीब से देखते हैं, जिसने कभी यूरोपीय लोगों को और बाद में अरब के लोगों को आकर्षित किया। तेकड़ी के ये बागान सहज ही इतिहास से हमें जोड़ देते हैं। केरल से जाने वाली विश्व प्रसिद्ध काली मिर्च का मूल स्थान यही था।

चेलारकोविल झरना

तेकड़ी से 15 किलोमीटर उत्तर की ओर चेलारकोविल झरना बहता है, जो तेकड़ी की खूबसूरती का एक नगीना है। यदि आप जंगल और ट्रेकिंग का आनंद उठा चुके हैं और कुछ नया देखना चाहते हैं तो यह झरना सबसे सुंदर जगह है। केरल सरकार के पर्यटन विभाग ने पर्यटन में सामुदायिक दायित्व और भूमिका को बढ़ाने के उद्देश्य से आनाकारा पंचायत के इस झरने के आसपास रह रहे लोगों को यहां के पर्यटन को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी दी है। केरल की ऊंचाई से तमिलनाडु के खेतों की ओर बहता यह झरना अपने आप में अलग अनुभव देता है। यह सहज ही दो अलग-अलग राज्यों की भौगोलिक स्थिति और उससे उपजे सौंदर्य की ओर हमारा ध्यान खींच लेता है। झरने से दूध-सा सफेद गिरता पानी नीचे तमिलनाडु के खेतों के लिए मां के दूध के समान लगता है। 

कब और कैसे जाएं?

तेकड़ी देश के उन गिने-चुने स्थलों में से है, जहां वर्ष भर जाया जा सकता है। पर मानसून और इसके तुरंत बाद इस स्थान की खूबसूरती कमाल की होती है। जब उत्तर भारत ठंड से सिकुड़ रहा होता है, उन दिनों इधर हल्की गर्मी शुरू हो चुकी होती है। तेकड़ी तक जाने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा कोचीन इंटरनेशनल एयरपोर्ट है और रेलवे स्टेशन है आलुवा। यहां से बस या टैक्सी से तेकड़ी तक जाया जाता है। सरकारी और निजी दोनों ही प्रकार की बसें यहां चलती हैं। यहां ठहरने के लिए सभी तरह के होटल और लॉज उपलब्ध हैं। 

Posted By: Priyanka Singh

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