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पुष्पेश पंत
दालचीनी का भारतीय भोजन में अधिकतर इस्तेमाल खडे़ मसालों में ही होता है। लवंग, इलायची, काली मिर्च तथा तेजपात के साथ इसकी हल्की मिठास और सुगंध अपनी उपस्थिति का रुचिकर एहसास कराती है। पश्चिमी खान-पान में चॉकलेट, कॉफी तथा एप्पल पाइ, सिनेमन रोल्स के अलावा तरह-तरह की केक-पेस्ट्री के साथ भुने-सिंके मांसाहारी व्यंजनों का प्रमुख आकर्षण दालचीनी है।
जब तक पेटेंट दवाइयों का चलन नहीं था जुकाम के इलाज में दालचीनी के तेल को एलौपैथिक डॉक्टर बेहिचक अपने नुस्खों मे जगह देते थे। संक्षेप में दालचीनी स्वादिष्ट तथा सुगंधित होने के साथ औषधीय गुणों से संपन्न होने के कारण बहुमूल्य समझी जाती रही है।
किंवदंतियों में लिपटी लकड़ी
मिस्र के पिरामिडों में दालचीनी के कई सुराग मिले हैं। जहां ईसा के जन्म के तीन हजार साल पहले इसे सम्राटों के शवों को ममी के रूप में संरक्षित करने लिए काम लाया जाता था। जब से यूरपियों की जुबान पर दालचीनी का जायका चढ़ा, वे इसके लिए कोई भी कीमत देने को तैयार होने लगे। मुनाफाखोर अरब सौदागरों ने-जिनका एकाधिपत्य मसाला व्यापार पर था-इसे निरंतर महंगा पदार्थ बनाए रखने के लिए एक मजेदार कहानी गढ़ी। उनका कहना था कि दालचीनी के वृक्षों पर जहरीले सांप लिपटे रहते हैं और इसे हासिल करने के लिए जान पर खेलना पड़ता है। इसके बाद भी सीमित मात्रा में ही यह हाथ लगती है क्योंकि यह लकड़ी सुर्खाब नाम के दैत्याकार मिथकीय पक्षी को बहुत प्रिय है, इसी के तिनकों से वह अपना घोंसला बनाती है। किंवदंती के अनुसार यह शाही पक्षी बार-बार अपने घोंसलों को जलाकर आत्मदाह करता है और राख से पुनर्जीवित होता है। इसी कारण मनुष्यों के उपयोग के लिए दालचीनी कम बचती है! यह कहानी ईसा के जन्म के पहले की सदी में रोमन इतिहासकार प्लिनी ने इस टिप्पणी के साथ दोहराई कि इसे काल्पनिक ही समझा जाना चाहिए।
ऐसी ही दूसरी कहानी में अरब सौदागर यह दावा करते थे कि दालचीनी को वे नील नदी के स्त्रोत से मछली के जाल डालकर बड़ी हिकमत से हासिल करते हैं!

मीलों दूर से आए सुगंध
15वीं -16वीं सदी के डच अन्वेषक जब इंडोनेशिया तक पहुंचे तो दालचीनी के वनों की मादक सुगंध ने उन्हें मुग्ध कर दिया। इनकी सुगंध तट तक पहुंचने के मीलों पहले ही महसूस की जा सकती थी-मलयानिल की तरह। मूल निवासियों की निर्मम हत्या रक्तरंजित औपनिवेषिक युद्धों में करने के बाद हौलैंड का आधिपत्य इन द्वीप समूहों पर हो गया और दूरदराज की हांकने वाले अरब व्यापारियों की दुकानदारी समाप्त हो गई।
भिन्नताएं हैं कई
वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार दालचीनी की जन्मभूमि चीन है हालांकि आज सबसे उच्च कोटि की दालचीनी दक्षिण पूर्व एशिया में मोलुका, बांदा द्वीप समू्ह, इंडोनेशिया तथा वियतनाम में पैदा होती है। भारत में जिस दालचीनी का प्रयोग आम तौर पर होता है उसका स्त्रोत श्रीलंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह असली दालचीनी नहीं उसकी सहोदर है। विक्रेता भी सिनेमन तथा कासिया में फर्क करते हैं। हम जिस दालचीनी के आदी हैं उसकी खाल मोटी, ज्यादा खुरदुरी, गहरे भूरे-काले रंग की होती है तथा स्वाद भी अधिक तेज होता है। पश्चिम में जिसे सर्वश्रेष्टठ समझा जाता है उस दालचीनी के तिनके पतले, चिकने, हल्के रंग के, लंबे तथा अधिक मुडे़ होते हैं।

हर क्षेत्र में फायदेमंद
दालचीनी का प्रयोग नमकीन- बिरयानी, पुलाव, कोरमा, कोफ्ते, कबाब में अनिवार्यत: होता है। इसकी कुदरती नाजुक मिठास इसे अनेक मिठाइयों का जोड़ीदार बना देती है। मसाला चाय और दूध के मसालों में इसका उपयोग होता है तथा आयुर्वेद के अनेक लवंगादि, दाडिमाष्टक जैसे चूर्णो में भी। पश्चिम में मदिराओं को सुवासित बनाने के साथ-साथ कड़वी औषधियों को मुंह में डालने लायक बनाने में भी इसका योगदान रहता है। सुगंध निर्माता भी इसे अपने काम का हिस्सा समझते हैं।

रहता है। (लेखक प्रख्यात खान-पान विशेषज्ञ हैं)--

 

Posted By: Priyanka Singh

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