भाषा विमर्श में जानिए नमन करने के दौरान अशुद्धियों से बचने का सही तरीका
संस्कृत से कोसों दूर चले गए हमारे बुद्धिजीवी और राजकीय अधिकारी सोचते हैं कि हलंत लगा देने से शब्द संस्कृत हो जाता है। शब्दों का शुद्ध लेखन हमारा अभीष्ठ होना चाहिए। साथ ही शब्दों के शुद्ध रूप को जानना हमारी भावी पीढ़ी के लिए भी बहुत जरूरी है

डा. बुद्धिनाथ मिश्र, देहरादून, उत्तराखंड।
संस्कृत को द्वितीय राजभाषा बनाने वाले एकमात्र राज्य उत्तराखंड में जो तीर्थयात्री या पर्यटक संस्कृति और संस्कृत के अ-दूषित रूप देखने की लालसा लेकर आते हैं, उन्हें यहां के राजमार्गों पर बड़े-बड़े होर्डिंगों में नागरिकों और शहीदों को 'शत् शत् नमनÓ होते देखकर बड़ी निराशा होती है।
संस्कृत से कोसों दूर चले गए हमारे बुद्धिजीवी और राजकीय अधिकारी सोचते हैं कि हलंत लगा देने से शब्द संस्कृत हो जाता है। इसीलिए शत-शत को शत्-शत् कर दिया और नमन को नमन् कर दिया। ये ऐसी अशुद्धियां हैं, जो सभी हिंदीभाषी राज्यों के राजमार्गों पर चलने वाले लाखों पथिकों की नजरों से गुजरती हैं और जिन्हें भाषा का ज्ञान है, उन्हें हमेशा कचोटती भी हैं। इन राजमार्गों से आने-जाने वाले बच्चों के कोमल मन पर ये अशुद्ध भाषा-प्रयोग उतना ही घातक प्रभाव डालते हैं जितना अश्लील फिल्मी पोस्टर।
शब्द के गलत उच्चारण ने ही कुंभकर्ण को चिरशायी बना दिया था। उसने कड़ी तपस्या कर ब्रह्मा से वर मांगना चाहा 'निर्देवत्वम्Ó (देवताओं का नाश), लेकिन कह बैठा 'निद्रावत्वम्Ó और ब्रह्मा ने उसे सुदीर्घ निद्रा का वरदान दे दिया।
मिथिला और काशी में मिला भाषा का उच्च संस्कार दिल्ली-देहरादून में मुझे बेहद कष्ट देता है। सड़कों के हिंदी साइनबोर्डों में जहां नीचे बिंदी होनी चाहिए, वहां बिंदी नहीं मिलेगी। जहां बिंदी नहीं होनी चाहिए (रोड) वहां बिंदी मिलेगी (रोड़)। कृपा की तृतीया विभक्ति का शब्द 'कृपयाÓ (कृपा से) अक्सर आपको 'कृप्याÓ के भ्रष्ट रूप में दर्शन देगा। सतत् (सतत) शत् (शत) कृप्या (कृपया) जैसी पीड़ादायक अशुद्धियां इतनी मात्रा में सड़कों, बाजारों और सरकारी कार्यालयों में दिखने लगी हैं कि कभी-कभी यह भ्रम होने लगता है कि कहीं मैं ही तो गलत नहीं हूं। आखिर अपनी भाषा के प्रति इतनी लापरवाही क्यों?
संस्कृत भाषा का ज्ञान न होने के कारण हमारे बुद्धिजीवी अशुद्ध उच्चारण तो करते ही हैं, अशुद्ध उद्धरण भी देते हैं। यह एक विनाशकारी कृत्य है, क्योंकि इससे अनर्थ-कारी अशुद्ध उद्धरणों का सिलसिला शुरू हो जाता है। कुछ वर्ष पूर्व मुझे कनाट प्लेस की एक दूकान से 'म्यूजिक टुडेÓ द्वारा तैयार किया गया एक आडियो कैसेट 'मेघदूतम्Ó प्राप्त हुआ था। बहुत प्रसन्नता हुई कि हमारे इलेक्ट्रानिक उद्यमी अपनी प्राचीन अमूल्य धरोहर को संजोने में चेष्टारत हैं, लेकिन जब उस कैसेट को सुना तो सिर पकड़कर बैठ गया। 'मेघदूतÓ के चुने हुए श्लोकों को अच्छी तरह संगीतबद्ध कर नामी गायक द्वारा गाया गया था। मगर संस्कृत के जानकार व्यक्तियों का सहयोग न लेने के कारण किसी भी श्लोक की एक पंक्ति ऐसी नहीं थी, जिसमें 2-3 अशुद्ध उच्चारण न हों। यह चिंताजनक पहलू है जिस पर सामान्य जनता से लेकर विद्वन्मंडली तक का ध्यान आकर्षित होना चाहिए।
हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में धर्म-दर्शन से लेकर कला-साहित्य तक सभी विषयों पर जो भी लेख छपते हैं, उनमें वेद मंत्रों से लेकर लौकिक साहित्य के जो श्लोक उद्धृत किए जाते हैं, उनको यदि गौर से आप पढ़ें तो ढेर सारी अशुद्धियां आपको अनायास ही मिल जाएंगी। नकल की बाढ़ इतनी प्रबल है कि कोई भी लेखक मूल तक जाना ही नहीं चाहता। वह नकल की नकल कर आगे बढ़ जाता है। और इस प्रकार अशुद्धियां रक्तबीज की तरह बढ़ती हैं।
उदाहरण के लिए किसी स्वनामधन्य व्यक्ति की मृत्यु पर अखबारों के विज्ञापन में जो गीता के श्लोक उद्धृत किए जाते हैं, वे अक्सर अशुद्धियों से भरे होते हैं। उन श्लोकों को शुद्ध रूप में उद्धृत करना कोई कठिन काम नहीं है। गीता प्रेस ने श्रीमद्भगवद्गीता और रामचरितमानस को अल्पमोल पर घर-घर पहुंचा दिया है। वह भी पूर्णत: शुद्ध रूप में। उसकी फोटोकापी कर उपयोग में लाया जा सकता है, मगर इसके लिए भाषा की शुद्धता के प्रति थोड़ा आग्रह तो होना ही चाहिए। न जाने क्यों हमारे श्रीमंत लोग अंग्रेजी की वर्तनी के प्रति जितने सतर्क दिखते हैं, उतने हिंदी वर्तनी के प्रति नहीं। एक ही साइन बोर्ड में अंग्रेजी पाठ बिल्कुल शुद्ध है और हिंदी पाठ अशुद्ध! जबकि उसको लिखने वाला पेंटर हिंदीभाषी होता है। उसे अपनी भाषा की वर्तनी को शुद्ध रखना ही चाहिए था, मगर उसका हस्तक्षेप अनधिकार चेष्टा हो जाएगी!
शादी ब्याह के निमंत्रण पत्रों में जो संस्कृत के श्लोक छपते हैं, वे भी त्रुटियों के कारण प्राय: अनर्थकारी हो जाते हैं। उदाहरण के लिए एक बहु प्रचलित श्लोक है-
मंगलं भगवान् विष्णु:
मंगलं गरुडध्वज:।
मंगलं पुण्डरीकाक्ष:
मंगलायतनो हरि:।।
हिंदी के बड़े-बड़े प्रोफेसरों द्वारा भेजे गए निमंत्रण पत्रों में भी मैंने मंगलायतन (मंगल+आयतन) हरि को 'मंगलाय तनो हरिÓ के रूप में पाया है, जैसे प्रोफेसर साहब अपनी बिटिया की शादी में भगवान विष्णु को 'मंगलÓ के लिए 'तनÓ जाने का निर्देश दे रहे हों। इस श्लोक में गरुडध्वज संस्कृत शब्द है। उसे गरुड़ध्वज नहीं बनाया जा सकता। इसी प्रकार संस्कृत में भगवान् भी हलंत शब्द है।
हिंदी समाचार पत्रों में भाषा के जानकारों के अभाव में अखबारों की भाषा दिल्ली की जमुना नदी की तरह ही पूरी तरह प्रदूषित हो चुकी है। 'नान-रेजिडेंट इंडियनÓ (एनआरआई) के लिए भारत सरकार ने 'आप्रवासी भारतीयÓ शब्द बनाया है, मगर हिंदी अखबारों में सामान्यत: 'अप्रवासी भारतीयÓ छपता है, यानी 'जो प्रवासी भारतीय नहीं हैÓ। यह तो अर्थ ही उलट गया! वैसे, इसके लिए स्वतंत्र हिंदी शब्द 'प्रोषित भारतीयÓ ज्यादा उपयुक्त होता। साहित्य में 'प्रोषित पतिकाÓ शब्द पहले से उस नायिका के लिए है, जिसका पति परदेस में रहता है।
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