सामंजस्य का रामत्व, भरत और लक्ष्मण हैं अधिकार और समर्पण की मूर्ति, जिनके केंद्र में हैं श्रीराम
भरत के स्वर को राम ही बजाते हैं उस स्वर के श्रोता लक्ष्मण हैं। राम के प्रति अधिकारजन्य प्रेम लक्ष्मण का है और समर्पणजन्य प्रेम भरत का। समर्पण और अधिकार दोनों का केंद्र राम होते हैं तो चाहे राम के पास रहो चाहे दूर पर रामराज्य बनेगा ही...

संत मैथिलीशरण। समुद्र में रत्न छिपे रहते हैं, आकाश में तारे दिखाई देते हैं, दोनों का आश्रय एकमात्र अनंत है, चाहे वह आकाश हो या समुद्र! वे अनंत राम हैं, जहां लक्ष्मण और भरत के प्रेम को आश्रय प्राप्त है। सबमें राम हैं, यह भरत का चिंतन है। राम में ही सब हैं, यह लक्ष्मण जी का दर्शन है। दोनों का सामंजस्य ही रामत्व है। श्रीराम के प्रति लक्ष्मण जी के प्रेम का वर्णन हो सकता है, पर श्रीभरत के और श्रीराम के प्रेम का वर्णन अनिर्वचनीय है। तुलसीदास जी कहते हैं :
अगम सनेह भरत रघुबर को,
जहं न जाइ मन बिधि हरि हर को।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश किसी का मन वहां तक नहीं जा सकता है। ब्रह्मा जी उद्भव कर सकते हैं, विष्णु सृष्टि का पालन कर सकते हैं और शंकर जी सृष्टि का लय कर सकते हैं, पर श्रीभरत तो इन तीनों से ऊपर शुद्ध प्रेम में स्थित हैं। जिनके लिए जनक जी ने सुनयना जी से कहा :
भरत महा महिमा सुनु रानी।
जानहिं राम न सकहिं बखानी।।
अर्थात भरत के प्रेम को भगवान श्रीराम जानते तो हैं, पर वे भी उस प्रेम का बखान नहीं कर सकेंगे। भरत का प्रेम अनिर्वचनीय है, जिसमें गुरु वशिष्ठ जैसे ज्ञानी की मति भी भरत के वश में हो जाती है। वशिष्ठ जी का धर्ममय ज्ञान यदि कहीं पर पूरी तरह अर्पित हुआ, तो वे हैं प्रेममूर्ति भरत :
तेहि ते कहौं बहोरि बहोरी।
भरत भगति बस भइ मति मोरी।।
फिर वे कहते हैं कि हे राम! श्री भरत आज जो अपना मत सभा में प्रस्तुत करेंगे, उसको विवेकपूर्वक समझ लीजिएगा, क्योंकि भरत की बात न तो साधुमत के प्रतिकूल होगी, न लोकमत के। उसमें न राजनीति की मर्यादाओं की अवहेलना होगी, न वेदों की। अब आपको निर्णय करना है कि आप अपने सत्य और उद्देश्य की पूर्ति के लिए किस तरह मार्ग निकालेंगे :
भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ विचारु बहोरि।
करब साधुमत लोक मत नृपनय निगम निचोरि।।
भगवान श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ का अपने अनुज प्रिय भरत के प्रति जब ऐसा समर्पण और अनुराग देखा तो परमानंद में मग्न हो गए। भगवान राम ने गुरुदेव की स्तुति की और कहा कि जो लोग गुरुदेव के चरण कमलों में अनुराग करते हैं, वे लोग इस संसार में और परलोक में भी बड़भागी होते हैं। हमारे पूज्य पिता श्रीदशरथ जी भी गुरुदेव के प्रति असीम श्रद्धा रखते थे और आज वे गुरुदेव जब हमारे प्रिय भाई भरत की इन शब्दों में प्रशंसा कर रहे हैं तो आज तो आनंद का समुद्र उमड़ पड़ा है। तब गुरु वशिष्ठ ने चित्रकूट में भरत से अपने हृदय की बात कहने को कहा! पर भरत के हृदय में तो सीताराम जी का निवास है :
भरत हृदय सियराम निवासू।
भरत तो वह पोली बांसुरी हैं, जिसको केवल राम ही बजाते हैं। उनका अपना कोई न तो स्वर है और न ही कोई अस्तित्व। भरत के स्वर को तो राम ही बजाते हैं, उस स्वर को सुनने वाले श्रोता लक्ष्मण हैं। जिन लक्ष्मण की भावस्थिति ऐसी है कि जो हमारे भैया को प्रिय है, वह मेरा प्रिय है और जो उनको प्रिय नहीं है, वह सपने में भी लक्ष्मण जी की कृपा प्राप्त नहीं कर सकता है। राम के प्रति अधिकारजन्य प्रेम लक्ष्मण का है और समर्पणजन्य प्रेम भरत का है। कैकेई के द्वारा श्रीराम को वनवास दिए जाने पर संत स्वभाव के भरत ने अनेक बार कैकेई के प्रति कठोर वचनों का प्रयोग किया, पर परम तेजस्वी और ओजस्वी श्री लक्ष्मण ने माता कैकेई पर तनिक भी क्रोध नहीं किया! उसका कारण केवल एक ही था कि जिनसे राम छूट गए, उन भरत ने क्रोध किया और जिनको राम मिल गए, उन लक्ष्मण ने क्रोध नहीं किया।
समर्पण और अधिकार जब दोनों का केंद्र राम होते हैं तो चाहे राम के पास रहो, चाहे राम से दूर, पर रामराज्य बनेगा और यदि द्वापर युग में दुर्योधन की तरह राज्य सत्ता पाने की महत्त्वाकांक्षा ही सर्वोपरि होगी तो महाभारत होगा। त्रेता में रामराज्य का आधार भरत और लक्ष्मण का संयुक्त प्रेम है, जिसमें अपनी कोई न तो इच्छा है न प्रतिज्ञा है। प्रतिज्ञा में अहंकार होता है, इच्छा में वासना होती है। लक्ष्मण भगवान राम की यश की पताका के दंड हैं। डंडे के बगैर झंडा फहरा ही नहीं सकता है। जिस मंदिर में भगवान की मूर्ति पूजी जा रही है, उस मंदिर की नींव श्री भरत हैं। भरत के बगैर राम का मंदिर बन ही नहीं सकता है। राम के वनवास में महाराज दशरथ को यदि कोई भावनात्मक सहारा था तो मात्र लक्ष्मण का था। इसीलिए विश्वामित्र के साथ भी श्रीराम के साथ उन्होंने भरत को न भेजकर लक्ष्मण को साथ में भेजा था। लक्ष्मण राम के संयुक्त गुण हैं। लक्ष्मण वह रामरसायन हैं, जिनके बगैर राम का शील, शौर्य, धैर्य, ऐश्वर्य कुछ भी सुरक्षित और पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता है। बाल्यकाल से खेल से लेकर महल की अनेक घटनाओं में उन्होंने लक्ष्मण को राम से कभी अलग नहीं देखा था। इसीलिए वनवास के लिए प्रस्थान के बाद जब वे पुन: मूर्छा से चैतन्य हुए, तब मंत्री सुमंत से कहते हैं कि तुम पीछे से रथ हांक कर जाओ और श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को चार दिन तक वन में घुमाकर वापस अयोध्या लौटा लाओ। मंत्री सुमंत के द्वारा जब यह प्रस्ताव श्रीराम और सीता जी के समक्ष रखा गया, तो लक्ष्मण जी को क्रोध आ गया और उन्होंने पिता जी के लिए कुछ कठोर वचन कह दिए। भगवान श्रीराम के मना करने पर भी अयोध्या जाकर सुमंत ने महाराज दशरथ को सारा समाचार सुनाकर यह भी कह दिया कि यद्यपि श्रीराम ने आपको बताने को मना किया है, पर लक्ष्मण ने आपके प्रति बड़े कठोर वचन कहे। यह सुनकर महाराज दशरथ दुखी नहीं हुए, अपितु उनका राम के प्रति जो सच्चा प्रेम था, वह बाहर छलक पड़ा। आंसुओं के साथ टपकने लगा। वह बोले, धन्य है मेरा बेटा लक्ष्मण! मैं चिंतित था कि 14 वर्ष तक मेरे बेटे राम और बेटी सीता को कोई वन में कष्ट न दे। पर लक्ष्मण अपने भाई के कष्ट पर अपने पिता के लिए भी कटु वचन बोल सकता है, मुझे भरोसा हो गया कि अब राम का वनवास में कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जब लक्ष्मण जैसा सर्वशक्तिमान भाई साथ में है तो अब मैं निश्चिंत हो गया। वे बार-बार लक्ष्मण के लिए धन्यवाद देते हैं। रामायण में लक्ष्मण ऐसे पात्र हैं, जिन्होंने श्रीराम के प्रति विमुख होते हुए लोगों को भगवान के सन्मुख किया। बस एकमात्र उनका लक्ष्य एक ही था कि :
पूज्यनीय प्रिय परम जहां ते।
मानिए सबहि राम के नाते।।
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