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    खालसा की सर्जना का दिन

    By Vivek BhatnagarEdited By:
    Updated: Wed, 13 Apr 2022 09:41 PM (IST)

    सामाजिक दृष्टि से बैसाखी का पर्व रबी की फसल तैयार होने की खुशी में मनाया जाता है परंतु धार्मिक दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण दिवस है। इस दिन को सिख श्रद्धालु खालसा के जन्म दिवस के रूप में मनाते हैं।

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    अपने सजाये हुए पंच प्यारों से अमृतपान करके गुरु जी गोविंद राय से गोविंद सिंह बन गये।

     सामाजिक दृष्टि से बैसाखी का पर्व रबी की फसल तैयार होने की खुशी में मनाया जाता है, परंतु धार्मिक दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण दिवस है। इस दिन को सिख श्रद्धालु खालसा के जन्म दिवस के रूप में मनाते हैं। इसी दिन 13 अप्रैल, 1699 को आनंदपुर साहिब (पंजाब) के सजे हुए दीवान में श्री गुरु र्गोंवद सिंह जी ने पांच प्यारे चुनने के लिए एक कौतुक (लीला) किया था। सतगुरु जी हाथ में नंगी तलवार लेकर ऊंची आवाज में गरज कर बोले थे, 'हमें एक सिख के सिर की आवश्यकता है, जिसे सिर भेंट देना हो वह आगे आ जायेÓ। इस प्रकार गरजते वचनों में गुरु जी ने तीन बार यह मांग दोहराई तो लाहौर निवासी भाई दयाराम जी ने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। गुरु जी उन्हें शामियाने के अंदर ले गये तथा बाहर आकर फिर वही मांग दोहराई। इस बार दिल्ली निवासी भाई धर्मदास जी जाट सामने आये। गुरु जी उन्हें भी अंदर ले गये। तीसरी बार जब एक और सिर की मांग की तो गुजरात निवासी भाई मोहकम चंद्र जी हाजिर हुए। चौथी बार बीदर (कर्नाटक) निवासी भाई साहेब चंद्र जी नाई तथा पांचवीं बार ओडिशा निवासी भाई हिम्मतमल जी झीवर उपस्थित हो गये। इस प्रकार गुरु जी ने उन पांचों सिखों को, जो देश के विभिन्न हिस्सों से थे तथा अलग-अलग जातियों के थे, नये वस्त्र तथा शस्त्र पहनाकर गुरुवाणी द्वारा तैयार किया गया अमृतपान करवाकर एक सूत्र में पिरो दिया। तत्पश्चात् सब संगतों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि, 'ये पांच मेरे प्यारे हैं। ये खालसा के पंथ प्रधान (मुखिया) होंंगे। आज से इनके नाम भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई मोहकम सिंह, भाई साहिब सिंह तथा भाई हिम्मत सिंह होंगे।Ó गुरु जी ने पांचों प्यारों को संबोधित करते हुए कहा कि, 'अमृतधारी सिख को केश, कंघा, कड़ा, कृपाण तथा कछहरा (एक विशेष प्रकार का अंत:वस्त्र) धारण करना होगा तथा नित्य गुरुवाणी का पाठ करना होगा।Ó

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    उन्होंने सिखों का चरित्र ऊंचा करने के लिए कुरीतियों तथा बुराइयों से दूर रहने का आदेश दिया। ऐसे सिखों को खालसा (खालिस, शुद्ध) नाम दिया। तत्पश्चात् खालसा के मान-सम्मान में बहुत से वरदान दिए तथा अंत में अपने सजाये हुए पंच प्यारों से खुद भी अमृतपान करके र्गोंवद राय से र्गोंवद सिंह बन गये। इस प्रकार गुरु जी ने एक दुर्लभ मिसाल कायम कर दी। इस प्रकार गुरु र्गोंवद सिंह जी ने खालसा पंथ का सर्जन करके खालसे का शिष्टाचार, आचरण व मर्यादा कायम की तथा खालसा को संसार से न्यारा बनाकर एक नई पहचान दी।

    डा. दलबीर सिंह मल्होत्रा

    सिख संस्कृति के विषयों के लेखक