बिहार में क्यों दूल्हे को दी जाती है गाली? दिलचस्प है गारी गीतों का अनोखा इतिहास; समय के साथ ऐसा बदला इसका रूप
बिहार की संस्कृति में गारी गीतों की खास जगह है। इन गीतों को शादी के मौके पर दुल्हन पक्ष की महिलाएं गाती हैं।

कैसे हुई गारी गीतों की शुरुआत? (AI Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की लोकगीतों में गारी गीतों की खास जगह है। ये गीत शादी के मौके पर खासतौर से गाए जाते हैं। इन गीतों को दुल्हन पक्ष की महिलाएं गाती हैं और दूल्हे के रिश्तेदारों को गाली देती हैं।
अब आप सोच रहे होंगे कि शादी जैसे शुभ अवसर भला कोई गाली क्यों दे रहा है और किसी का अपमान क्यों किया जा रहा है? आपको बता दें कि गारी गीत गाने के पीछे अपमान नहीं, बल्कि प्रेम और हास्य छिपा होता है। हालांकि, शुरुआत से लेकर आज के दौर में काफी बदलाव आ चुका है। आइए जानें गारी गीत क्यों गाए जाते हैं और कैसे इनमें समय के साथ बदलाव हुआ है।
गारी गीत होते क्या हैं?
गारी गीत दुल्हन पक्ष की महिलाएं बारात के स्वागत और खाने के समय गाती हैं। ये किसी का अपमान करने के लिए नहीं गाए जाते, बल्कि इनमें मीठी नोंक-झोंक होती है और व्यंग्य छिपा होता है, जैसे- देखे में पातर, खाए भर थारी, बता द बबुआ…। इन गीतों में महिलाएं समधी यानी दूल्हे के पिता, चाचा, फूफा और खुद दुल्हे पर मजाकिया तंज कसती हैं।
गारी गीत गाने के रिवाज की कहानी
बिहार में शादी में गारी गीत जरूर गाए जाते हैं। बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में भी गारी गीत गाए जाते हैं। बारात जब दुल्हन के घर पहुंचती है, तब स्वागत के लिए महिलाएं गारी गीत गाती हैं और दूल्हे के रंग-रूप या कद-काठी का मजाक उड़ाती हैं।
इसके अलावा, वर पक्ष जब खाना खाने बैठता है, तब मुख्य रूप से गारी गीत गाया जाता है। महिलाएं दूर बैठकर या पर्दे के पीछे से समधी को निशाना बनाते हुए गारी गीत गाती हैं, जैसे-
राजा दशरथ जी कईलन होशियारी
एकटा मरद पर तीन-तीन गो नारी
बता द बबुआ…।
कैसे गाया जाता है गारी गीत?
गारी गीत कभी भी अकेले नहीं गाया जाता। इसे महिलाएं हमेशा समूह में गाती हैं। ढोलक या थाली की थाप पर महिलाएं एक साथ एक सुर में गारी गीत गाना शुरू करती हैं और दूल्हे के संबंधियों पर बारी-बारी से तंज कसती हैं या उनका मजाक उड़ाती हैं। इन गीतों में दुल्हे की मां और बहन का भी मजाक उड़ाया जाता है।
कैसे हुई गारी गीतों की शुरुआत?
गारी गीतों की परंपरा काफी पुरानी है और इसे सीता विवाह से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि त्रेतायुग में भगवान राम जब माता सीता से विवाह करने मिथिला पहुंचे, तो वहां की महिलाओं ने समधी दशरथ और वर पक्ष के लोगों का स्वागत ऐसे ही तंज भरे गीतों को गाकर किया था, जैसे-
राम जी से पूछे, जनकपुर के नारी
बता द बबुआ, लोगवा देत काहे गारी
बता द बबुआ...।
माना जाता है कि भगवान राम ने इन गीतों का आनंद लिया था और तभी से गारी गीत गाने की परंपरा शुरू हुई। धीरे-धीरे मिथिला से शुरू होकर ये परंपरा पूरे बिहार में पहुंच गई।
समय के साथ कैसे बदला गारी गीत?
गारी गीतों की शुरुआत शादी-ब्याह के मौके में माहौल को हंसी-मजाक से हल्का बनाने के लिए की गई थी। हालांकि, समय के साथ इन गीतों में काफी बदलाव भी आए हैं। कई जगहों पर गारी गीतों में महिलाएं वर पक्ष के लिए काफी अपशब्द और असली गालियों का भी इस्तेमाल करती हैं। जबकि शुरुआत में ऐसा नहीं था।
इन गीतों को शुरुआत में सिर्फ मजाक उड़ाने या तंज कसने के लिए बनाया जाता था। अपशब्दों के इस्तेमाल के कारण अब दूसरे क्षेत्रों में गारी गीतों को बुरा माना जाने लगा है, लेकिन पुराने गारी गीत काफी मजेदार और मीठी तकरार से भरे होते थे।
