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'द वन' का छठी मैया गाना नहीं, असल में ऐसे होते हैं छठ के पारंपरिक गीत, हर शब्द बयां करता है बिहार की संस्कृति

Published: Thu, 10 Sep 2026 04:00 PM (IST)Updated: Fri, 11 Sep 2026 04:36 PM (IST)

बिहार की संस्कृति में छठ पूजा की खास जगह है। इस महापर्व के गीतों में छठी मैया और सूर्य देवता की आराधना की जाती है।

छठ पूजा के गीतों में छलकती है छठी मैया के लिए भक्ति (AI Generated Image)

छठ पूजा के गीतों में छलकती है छठी मैया के लिए भक्ति (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की आत्मा छठ पूजा में बसती है। ये महापर्व बिहार की संस्कृति का अटूट हिस्सा है। हाल ही में तमन्ना भाटिया और सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म द वन का छठी मैया गाना रिलीज हुआ है, जिसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं। 

बड़े पर्दे पर छठ पूजा देखने के लिए लोग काफी एक्साइटेड हैं, लेकिन क्या आपने छठ पूजा के पारंपरिक लोकगीत सुने हैं? ये लोकगीत पीढ़ियों से चले आ रहे हैं, जिनमें छठ पूजा की असली झलक देखने को मिलती है। ये गीत छठी मैया और सूर्य देव की आराधना के लिए गाए जाते हैं। इन गीतों की धुन और बोल इतनी मीठी होती है कि एक बार सुनने के बाद बार-बार सुनने का दिल करता है। आइए जानें छठ पूजा के पारंपरिक लोकगीतों के बारे में। 

पहिले पहिल छठी मैया

छठ पूजा के गीतों की बात करें, तो शारदा सिन्हा के गाए गीत सबसे पहले दिमाग में आते हैं। ये गीत व्रत करने वाली महिला के दिल की आशा, 48 घंटों की भूख-प्यास, सर्दी में ठंडे पानी में खड़े होकर अर्घ्य देने के इंतजार और छठी मैया के लिए असीम श्रद्धा को बयां करते हैं। शारदा सिन्हा का गीत ‘पहिले पहिले हम कईनी छठी मैया बरत तोहार’ इस भावना को बहुत खूबसूरती से बयां करता है। इस गीत में व्रती कहती है कि छठी मैया मैं पहली बार आपका व्रत कर रही हूं, आप मेरी मदद करना। 

केलवा के पात पर 

शारदा सिन्हा का ही गाया ये गीत छठ पूजा के सबसे मशहूर गीतों में से एक है। ‘केलवा के पात पर उगेलन सुरुज मल झांके झूंके’ इस गीत के बोल हैं, जिसमें अर्घ्य देने के लिए खड़ी व्रती के इंतजार को बयां किया गया है और साथ ही, ये भी बताया गया है कि वो इतना कठिन व्रत किसके लिए कर रही है। इस गीत के जरिए व्रती बताती है कि वो अपने पति, बच्चों, भाई और घर के सदस्यों के लिए छठ पूजा करती है। 

कांच ही बांस के बंहगिया

छठ पूजा में घाट पर बांस की टोकरी और सूप में फल और प्रसाद का बाकी सामान लेकर जाया जाता है। इसे बहंगी कहते हैं, जिसे घर के पुरुष अपने सिर पर रखकर लेकर जाते हैं। ‘कांच ही बांस के बहंगिया’ गीत में इसी परंपरा को बयां किया गया है। इसमें व्रती अपने पति से बहंगी घाट लेकर चलने के लिए कह रही है और रास्ते में मिलने वाले बटोही को बताती है कि ये बहंगी वो छठी मैया के लिए लेकर जा रही है। 

मारबो रे सुगवा धनुख से

इस गीत में छठ पूजा के प्रसाद के महत्व के बारे में बताया गया है। इस गीत में व्रती कहती है कि जो फल उसने सूर्य देव को अर्घ्य देने के लिए रखे थे, उसे एक तोते ने झूठा कर दिया है। इसी पर गुस्सा होकर वो तोते को तीर से मारती है और वो घायल होकर गिर जाता है। इस पर सुगनी यानी मादा तोता वियोग में रोने लगती है, तो व्रती छठी मैया से उस सुगनी की मदद करने का आग्रह करती है। 

चाननी ताने चलले गौरा देई

देवी का गाया ये गाना छठ पूजा के दौरान घाटों पर खूब बजता है। इस गाने में छठ पूजा के दौरान चननी बांधने और अर्घ्य देने की परंपरा के बारे में बताया गया है। छठ पूजा में गन्नों को जोड़कर खड़ा किया जाता है और उसके नीचे छठ मैया के लिए मिट्टी के हाथियों पर प्रसाद रखा जाता है और दीया जलाया जाता है। इसे कोसी भरना कहा जाता है। इस गीत में इस परंपरा को भी बयां किया गया है। साथ ही, अर्घ्य देने के बारे में भी बताया गया है। इसके बोल हैं ‘चननी ताने चलले महादेव, घूँटी भर धोती भींजे’।

उगी हे दीनानाथ

इस गीत में सूर्य देव के उगने का इंतजार करती व्रती की पीड़ा को दिखाया गया है। कार्तिक महीने की सुबह ठंडे पानी में खड़ी व्रत अर्घ्य लेकर सूरज देव के उगने का इंतजार कर रही है, लेकिन सूर्य देवता उग नहीं रहे हैं। इसी भावना को ये गीत बयां करता है। इसके बोल हैं ‘कल्पेली भीजल तिवईया हो, उगी हे दीनानाथ’। 

इन गीतों के अलावा छठ पूजा के और भी कई गीत हैं, जिन्हें सुनकर आपका दिल उमंग और भक्ति से भर जाएगा।