क्या इंस्टाग्राम की रील्स देखकर आपको भी हो रहा है दीवाली FOMO? दिखावे से दूर ऐसे ढूंढें असली खुशी
दीवाली के रंग में रंगा हुआ है इंटरनेट मीडिया और इंस्टाग्राम पर लगातार आ रहे हैं एस्थेटिक दीवाली की सजावट ...और पढ़ें

सोशल मीडिया के एस्थेटिक प्रेशर को पीछे छोड़ ऐसे मनाएं असली दीवाली (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
आरती तिवारी , नोएडा। मायरा की सोसाइटी के सारे दोस्त अपने घर की एस्थेटिक सजावट की तस्वीरें वाट्सएप ग्रुप पर साझा कर रहे हैं। कमरे में उदास मायरा को बस कल रात मम्मी से हुई बात याद आ रही है। दीवाली पर वो भी अपने दोस्तों की तरह कुछ अलग तरह की सजावट करना चाह रही थी, ताकि दीवाली की रात जब तस्वीरें ग्रुप पर साझा की जाएं तो सबसे स्पेशल मायरा की ही तस्वीरें हों। मगर न तो उसकी पसंद की सजावट हो रही है और न ही मिठाइयों के मामले में मम्मी ने कुछ अलग किया। हर बार की तरह घर पर तैयार हुई हैं कुछ मिठाइयां, जो स्वाद में तो अच्छी होती हैं मगर उनकी तस्वीरें खींचने में वो बात नहीं आती। सजावट भी पापा ने रंग-बिरंगी लाइटों से कर दी है, जबकि वो चाहती थी कि इस बार घर वार्म लाइट से ही डेकोरेट हो।
आधुनिकता और परंपरा के बीच फंसी नई पीढ़ी के लिए बड़ा मुश्किल होता है इंटरनेट मीडिया की दुनिया में अपनी जगह बनाना। घर पर सब मम्मी या दादी की पसंद का हो रहा है तो वहीं इंस्टाग्राम की फीड खोलिए या यूट्यूब शार्ट्स देखिए, हर तरफ खूबसूरत वार्म-टोन लाइट्स, मिनिमलिस्ट दीये, कैंडल्स और पेस्टल शेड्स की सजावट से भरी तस्वीरें हैं। हर कोई अपनी पोस्ट को परफेक्ट और इंस्टाफ्रेंडली बनाने में जुटा है, जिसको देखकर नई पीढ़ी को होने लगता है फोमो।

(Image Source: AI-Generated)
जब एस्थेटिक से टकराए रियलिटी
एक तरफ बच्चों के मन में इंटरनेट पर वायरल हो रहे उन शानदार सेटअप्स की चाहत होती है, तो दूसरी तरफ घर और मम्मी-पापा का ट्रेडिशनल अंदाज। बच्चे हाल में फेयरी लाइट्स और पेपर लैंटर्न से एक कूल कार्नर सेट करने की सोच रहे हैं और उधर मम्मी आकर बोलती हैं- 'अरे, ये सब क्या उलझा रखा है? वो पुरानी झालर और पीतल के दीये निकालो, असली रौनक तो उसी से आती है!' पापा को एस्थेटिक लाइटिंग का वो साफ्ट, डिम ग्लो समझ ही नहीं आता। उनके लिए तो घर का कोना-कोना नीली-पीली-लाल रंग की रोशनी से जगमगाना चाहिए, तभी दीवाली लगती है। ऐसे में बच्चों को लगता है कि उनके अरमान धरे के धरे रह गए और हम अपने दोस्तों जैसी ट्रेंडी तस्वीरें अपलोड नहीं कर पाएंगे।
फोमो से रहें दूर
जब बच्चे इंटरनेट मीडिया पर दूसरों के खूबसूरत रील्स और स्टोरीज देखते हैं, तो मन में एक अजीब सी बैचेनी होने लगती है- यह पीछे छूट जाने का डर यानी फोमो महसूस कराता है कि बाकी सब की दीवाली उनसे ज्यादा कूल और परफेक्ट है। लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या इंटरनेट पर दिखने वाली वो आठ-दस सेकेंड की रील असली खुशी से ज्यादा जरूरी है? जो लाइटिंग और फिल्टर से स्क्रीन पर नजर आ रही है, वह सिर्फ कुछ लाइक्स और कमेंट्स के लिए है। जबकि घर की वो थोड़ी सी बिखरी हुई सजावट, मम्मी की डांट और पापा के साथ मिलकर दीये जलाना- यह सब किसी फिल्टर का मोहताज नहीं है।
ऐसे होगी परफेक्ट वाली दीवाली
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि एस्थेटिक क्रेज को छोड़ दें या इंटरनेट मीडिया से पूरी तरह कट जाएं। जिंदगी और इंटरनेट के बीच बैलेंस बनाना ही तो असली स्मार्टनेस है! इस दीवाली कुछ नया और मजेदार कर सकते हैं, जैसे कि घर के एक छोटे से कोने को अपनी पसंद के मुताबिक (जैसे स्टडी टेबल या बालकनी) एस्थेटिक लुक दें। बाकी घर मम्मी-पापा के हिसाब से सजने दें। इससे दोनों की पसंद की बात हो जाएगी। आपको कुछ अपनी पसंद की तस्वीरें पोस्ट करनी हैं तो पुरानी और ट्रेडिशनल सजावट को भी क्रिएटिव एंगल से कैप्चर करें। परंपरा और आधुनिक सोच का फ्यूजन तस्वीरों को और भी शानदार बना देगा। एस्थेटिक वो नहीं जो हर कोई करें, बल्कि वो भी है जो आपका अपना हो।
अपनों के साथ है असली दीवाली
दीवाली सिर्फ लाइट्स, डेकोरेशन या इंस्टाग्राम के लाइक्स का नाम नहीं है। यह त्योहार है एक-दूसरे के करीब आने का, रिश्तों में मिठास घोलने का और अपनों के साथ वक्त बिताने का। भले ही घर इंटरनेट के किसी पेज जैसा परफेक्ट न दिखे, लेकिन वहां प्यार, अपनापन और ठहाके तो पूरे होने चाहिए। यही जिंदगी की सबसे खूबसूरत और यादगार दीवाली बनाते हैं। तस्वीरें खींचने और रील्स बनाने के चक्कर में कहीं ऐसा न हो कि आप असली पल जीना ही भूल जाएं। फोन को थोड़ी देर साइड में रखें और परिवार के साथ बैठकर बातें करें, पुरानी यादें ताजा करते हुए सबके गले लगकर बोलें हैप्पी दीवाली!
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