भारत में कैसे पहुंचे पटाखे और कब बने दीवाली का हिस्सा? कभी भूत भगाने से हुई इनकी शुरुआत!
पटाखों का इतिहास चीन में भूत भगाने के लिए बांस जलाने से शुरू हुआ और फिर बारूद की खोज के साथ इसने आतिशबाजी का रूप ले लिया।

क्या दीवाली पर पटाखे जलाना सचमुच पुरानी परंपरा है? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जब भी किसी बड़े जश्न या दीवाली जैसे त्योहार की बात आती है, तो हमारे जहन में सबसे पहली तस्वीर आसमान में फूटते रंग-बिरंगे पटाखों की ही उभरती है। आज के दौर में बिना आतिशबाजी के खुशी का इजहार अधूरा-सा लगता है।
दिलचस्प बात यह है कि पटाखों का यह शोर सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस, फ्रांस के 'बैस्टील डे', कनाडा डे, चीन के लूनर न्यू ईयर और मेक्सिको के क्रिसमस सेलिब्रेशन में भी आसमान आतिशबाजी से जगमगा उठता है। हालांकि, क्या आपने कभी सोचा है कि पहली बार ये पटाखे किसने और कैसे बनाए होंगे? आइए, इसके इतिहास पर नजर डालते हैं।

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भूत भगाने के लिए जब आग में डाले गए बांस
पटाखों की कहानी ईसा पूर्व दूसरी सदी के चीन से शुरू होती है। उस दौर में वहां के लोग बांस के टुकड़ों को आग के हवाले कर देते थे। गर्मी पाकर जब बांस के अंदर की हवा फैलती थी, तो वह एक बहुत तेज धमाके के साथ फट जाता था। तब लोगों का विश्वास था कि इस तेज आवाज से बुरी आत्माएं डरकर भाग जाती हैं। इस तरह दुनिया के पहले 'देसी पटाखे' वजूद में आए।
एक अनजानी गलती और बन गया बारूद
बांस वाले इस नुस्खे के कई सौ साल बाद, चीनी रसायन शास्त्रियों ने एक ऐसा कारनामा कर दिया जिसने दुनिया का इतिहास बदल दिया। उन्होंने अनजाने में गंधक, शोरा और चारकोल को मिलाकर 'बारूद' की खोज कर ली। दूसरी शताब्दी में हान राजवंश के विद्वान वेई बोयांग ने अपनी किताब 'बुक ऑफ द किंशिप ऑफ द थ्रीज' में इन सामग्रियों का जिक्र भी किया है। जब इस नए मसाले को कागज या बांस की नली में भरकर आग लगाई गई, तो पहली बार धमाके के साथ रोशनी भी निकली। यहीं से असली आतिशबाजी ने जन्म लिया।
क्या प्राचीन भारत को भी थी इसकी भनक?
भले ही पटाखे चीन में बने, लेकिन प्राचीन भारत को भी ऐसे पदार्थों की जानकारी थी। बता दें, 300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच लिखे गए कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में 'अग्निचूर्ण' नाम के एक खास ज्वलनशील पाउडर का जिक्र है। आठवीं सदी की संस्कृत पुस्तक 'वैशम्पायन की नीतिप्रकाशिका' में भी ऐसी ही सामग्री के बारे में बताया गया है।

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युद्ध के मैदान से भारत पहुंचा बारूद
भारत में बारूद असल में 13वीं शताब्दी में चीन के मिंग राजवंश के सैन्य अभियानों के जरिए पहुंचा। दिल्ली सल्तनत ने पूर्वी भारत की जनजातियों से इसे सेना में इस्तेमाल करना सीखा। 15वीं सदी में जब पुर्तगाली भारत आए, तो युद्ध में हथियारों के रूप में इसका इस्तेमाल और तेज हो गया। मुगल साम्राज्य की नींव रखने वाले बाबर भी मध्य एशिया से बारूद की तकनीक लेकर आए थे।
राजा-महाराजाओं की शादियों में गूंजने लगे पटाखे
धीरे-धीरे भारत ने चीन से फुलझड़ी बनाने का हुनर भी सीख लिया और फिर बारूद का सफर हथियारों से निकलकर जश्न और शादियों तक पहुंच गया। इतिहासकार पीके गोडे के दस्तावेजों के अनुसार, साल 1518 में एक पुर्तगाली यात्री डुआर्टे बारबोसा ने गुजरात में एक ब्राह्मण जोड़े की शादी में पटाखे चलते देखे थे।
बाद में मुगलों के दौर में जश्न के लिए आतिशबाजी का खूब इस्तेमाल हुआ। 1633 में शाहजहां के बेटे की शादी की पेंटिंग में इसका सबूत मिलता है। 17वीं सदी में बीजापुर के शासक आदिल शाह ने अपनी शादी में सिर्फ आतिशबाजी पर 80 हजार रुपये उड़ा दिए थे।
दीवाली से कैसे जुड़ा पटाखों का नाता?
17वीं शताब्दी के आखिर की कुछ पेंटिंग्स में राधा-कृष्ण को दीवाली मनाते दिखाया गया है। हालांकि, उनमें सिर्फ दीये जल रहे हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसी दौर में खुशियों का इजहार करने के लिए दीवाली पर पटाखों का इस्तेमाल शुरू हो चुका था। 18वीं सदी तक तो आतिशबाजी दीवाली का एक हिस्सा बन गई।
19वीं सदी में जब लोगों की भारी डिमांड बढ़ने लगी, तो उसे पूरा करने के लिए कोलकाता में भारत की पहली पटाखा फैक्ट्री लगाई गई। बाद में इस पूरी इंडस्ट्री को तमिलनाडु के शिवकाशी में शिफ्ट कर दिया गया।

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आसमान में कैसे बनते हैं लाल-नीले रंग?
आपको जानकर हैरानी होगी कि शुरुआत में पटाखों की रोशनी सिर्फ नारंगी होती थी। 19वीं सदी में यूरोप के वैज्ञानिकों ने इसमें अलग-अलग केमिकल मिलाना शुरू किया:
- लाल रंग: स्ट्रोंशियम से
- हरा रंग: बेरियम से
- सफेद रोशनी: टाइटेनियम, जिरकोनियम और मैग्नीशियम से
- नीला रंग: यह सबसे मुश्किल काम है, जो तांबे से बनता है। थोड़ा-सा भी तापमान बिगड़ने पर रंग गायब हो जाता है। इसलिए 'परफेक्ट ब्लू' बनाना आज भी विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
पटाखों से जुड़े कुछ और हैरान करने वाले सच
- सबसे बड़ा खरीदार: दुनिया में पटाखों की सबसे बड़ी खरीदार 'वॉल्ट डिज्नी' कंपनी है। यह कंपनी दुनिया भर में मौजूद अपने थीम पार्क्स में रोज होने वाले शोज के लिए हर साल लगभग 5 करोड़ डॉलर खर्च कर देती है।
- सबसे बड़ा शो: साल 2016 में नए साल के जश्न पर फिलीपींस के 'चर्च ऑफ क्राइस्ट' में दुनिया की सबसे बड़ी आतिशबाजी हुई थी। भारी बारिश के बावजूद वहां सिर्फ एक घंटे के भीतर 8 लाख 10 हजार 904 पटाखे फोड़कर रिकॉर्ड बनाया गया था।
बदलते वक्त के साथ बढ़ रही पर्यावरण की चिंता
पुराने समय में पटाखों के अंदर पूरी तरह से प्राकृतिक चीजें इस्तेमाल होती थीं, जिससे आज जैसे गंभीर हादसे नहीं होते थे। हालांकि, वो भी 100% सुरक्षित नहीं थे, लेकिन रसायनों का इस्तेमाल सीमित था। आज के पटाखों में तरह-तरह के हानिकारक केमिकल भरे होते हैं। इसी वजह से अब सेहत और पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए 'ग्रीन पटाखों' का चलन तेजी से बढ़ाया जा रहा है।
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