कैसे अरबों के कारोबार में बदल गई सड़क किनारे की एक मिठाई? दिलचस्प है सोन पापड़ी का इतिहास
फेस्टिव सीजन में जिस एक मिठाई की सबसे ज्यादा चर्चा होती है, वह है- 'सोन पापड़ी'।

सोन पापड़ी का इतिहास (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। त्योहारों का जिक्र हो और मिठाइयों की बात न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। दीवाली (Diwali 2026) के मौके पर इंटरनेट पर मीम्स से लेकर रिश्तेदारों के गिफ्ट्स तक, एक मिठाई हर जगह छाई रहती है और वह है सोन पापड़ी।
लोग भले ही मजाक में इसे 'घूमने वाला डिब्बा' कहते हों, लेकिन मुंह में घुल जाने वाले इसके स्वाद से कोई इनकार नहीं कर सकता। आइए, इस आर्टिकल में आपको इसके दिलचस्प इतिहास से रूबरू कराते हैं (History of Soan Papdi)।

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कहां से हुई इसकी शुरुआत?
इस मिठाई के जन्म को लेकर कोई पक्का लिखित इतिहास नहीं है। कुछ लोग मानते हैं कि यह राजस्थान से आई है, तो कई इसे महाराष्ट्र की देन बताते हैं। हालांकि, ज्यादातर जानकार यही मानते हैं कि सबसे पहले पश्चिमी महाराष्ट्र के कारीगरों ने ही बेसन और चाशनी को मिलाकर यह रेशेदार मिठाई बनाई थी। वहां से यह गुजरात, राजस्थान और पंजाब होते हुए पूरे भारत में मशहूर हो गई।
तुर्किए से भी है एक खास कनेक्शन
फूड एक्सपर्ट्स सोन पापड़ी की तुलना तुर्किए की एक बेहद पुरानी मिठाई 'पिस्मानिये' से करते हैं। तुर्किए की वह मिठाई भी बिल्कुल धागे जैसी और खस्ता होती है। दोनों में बस इतना ही फर्क है कि पिस्मानिये को भुने हुए आटे से बनाया जाता है, जबकि हम इसे बेसन से बनाते हैं।
क्या-क्या डलता है इसमें और क्या हैं इसके नाम?
देश भर में इसे शोण पापड़ी, सन पापड़ी, सोहन पापड़ी और पतीसा जैसे कई नामों से जाना जाता है। इसे तैयार करने के लिए बेसन, मैदा, चीनी की गाढ़ी चाशनी और शुद्ध घी का इस्तेमाल किया जाता है। इसके स्वाद को और निखारने के लिए ऊपर से पिस्ता, बादाम, इलायची और खरबूजे के बीज डाले जाते हैं।

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आखिर जल्दी खराब क्यों नहीं होती सोन पापड़ी?
दूध या मावे से बनी मिठाइयां कुछ ही दिनों में खराब हो जाती हैं, लेकिन सोन पापड़ी के साथ ऐसा नहीं है। इसे बनाने में दूध का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं होता। बेसन, चीनी और घी से बनी होने के कारण इसकी शेल्फ लाइफ बहुत लंबी होती है और यह कम से कम छह महीने तक बिल्कुल ताजी रहती है। इसी खूबी की वजह से बड़ी कंपनियां इसे आसानी से देश-विदेश में सप्लाई कर पाती हैं।
दीवाली पर ही सबसे ज्यादा क्यों बंटती है?
दीवाली पर इसके इतने बड़े पैमाने पर बंटने की सबसे बड़ी वजह इसका सस्ता होना है। काजू कतली या मावे की महंगी मिठाइयों के मुकाबले यह हर इंसान के बजट में आसानी से आ जाती है। सस्ते दाम और भारी मात्रा में उत्पादन की वजह से ही कॉरपोरेट गिफ्ट्स से लेकर आम घरों के लेन-देन में इसका डिब्बा सबसे ज्यादा नजर आता है।
सिर्फ त्योहार नहीं, साल भर रहता है जलवा
अगर आपको लगता है कि सोन पापड़ी सिर्फ दीवाली की मिठाई है, तो आप गलत हैं। यह साल के पूरे बारह महीने बिकने वाली मिठाई है। मोहल्ले की छोटी दुकानों से लेकर एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों तक, इसके पैकेट हमेशा मौजूद रहते हैं। खुशी का कोई भी मौका हो, काजू कतली और लड्डू की तरह लोग इसे भी चाव से बांटते हैं।
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