गरबा-डांडिया से अलग है गुजरात का ये रास, मां अम्बे के लिए जलती मशालों और धधकते अंगारों पर नंगे पैर होता है लोकनृत्य
गुजरात के जामनगर में होने वाले अनोखे मशाल रास नृत्य में जलती मशालों और धधकते अंगारों पर मां अंबे की आराधना होती है।

जामनगर का मशाल रास नृत्य (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गुजरात के गरबा और डांडिया रास के बारे में कौन नहीं जानता, आजकल तो इसका क्रेज गुजरात के अलावा बाकी शहरों में भी बढ़ गया है। अब लोग इसे मनोरंजन के साथ जोड़कर देखने लगे हैं, जबकि यह नृत्य मां अंबे की आराधना का प्रतीक माना जाता है।
लेकिन आज हम पारंपरिक गरबा से हटकर इस राज्य के एक और अनोखे नृत्य के बारे में बात करने वाले हैं, जिसमें नाचने के लिए हाथों की थाप या डांडिया की खनक का नहीं, बल्कि मशाल का सहारा लिया जाता है। चलिए मां अंबे की आराधना से जुड़े इस खास नृत्य को लेकर विस्तार से बात करते हैं।
जामनगर का मशाल रास नृत्य
गुजरात के सौराष्ट्र में जामनगर एक ऐसा शहर है जहां पिछले 70 सालों से एक अनोखा नृत्य किया जा रहा है, जिसका नाम है मशाल रास। इसकी शुरुआत साल 1957 में श्री पटेल युवक गरबी मंडल ने की थी, तब से ही देवी की आराधना के लिए इस परंपरा को जीवंत रखा गया है। यह नृत्य आम गरबा से अलग है क्योंकि इसे थाप पर नहीं जलती मशालों के साथ किया जाता है।
कैसे किया जाता है मशाल रास?
इस नृत्य को केवल पुरुष कलाकार ही करते हैं जिन्हें खैलैया कहा जाता है। नर्तक इसमें गुजरात की पारंपरिक वेशभूषा 'केडियूं-चोयणी' यानी घेरदार कुर्ता और चूड़ीदार पैजामा पहनते हैं। इसके बाद वो तेल या तारकोल में भिगोए गए सूती कपड़े को लकड़ी की छड़ में बांधकर जलाते हैं और इस तरह मशाल तैयार हो जाती है।
गोल घेरे की दो लेयर में खड़े होते हैं नर्तक
मशाल तैयार करने के बाद पुरुष एक गोल घेरे में अंदर और बाहर 6-6 की जोड़ी में खड़े हो जाते हैं। फिर 'रमती आवे माड़' और ‘मावड़ी’ जैसे देवी दुर्गा के लोकगीतों की धुन शुरू होती है, जिसमें अंदर के घेरे के नर्तक सुई की दिशा में तो बाहर खड़े नर्तक सुई की उल्टी दिशा में नृत्य करते हैं।
जलती मशालों संग गरबा पर थिरकते कदम
मशाल रास का सबसे आकर्षक नजारा तब दिखाई देता है, जब कलाकार हाथों में जलती मशाले लेकर गरबा शुरू करते हैं। इस दौरान जमीन पर आग भी फैलाई जाती है, फिर मशाल लेकर कलाकार इसके ऊपर नंगे पैर संतुलन बनाते हुए नाचते हैं यानी दहकते अंगारों के बीच यह पारंपरिक नृत्य किया जाता है।
