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दीवाली पर बुंदेलखंड में किया जाता है ये अनोखा लोक नृत्य, द्वापर युग से जुड़ी है 'दिवारी नृत्य' की कहानी

Published: Sun, 01 Nov 2026 11:00 AM (IST)

बुंदेलखंड के क्षेत्र में दीवाली के मौके पर दिवारी नृत्य किया जाता है। ये नृत्य मनोरंजन के साथ-साथ वहां के लोगों की बहादुरी से भी जुड़ा है।

दीवाली पर किया जाता है बुंदेलखंड में दिवारी नृत्य (AI Generated Image)

दीवाली पर किया जाता है बुंदेलखंड में दिवारी नृत्य (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली का त्योहार सिर्फ दीयों की रोशनी और मिठाइयों तक सीमित नहीं होती। दीवाली पर कई जगहों पर खास लोक नृत्य भी किया जाता है। ऐसे ही बुंदेलखंड में दीवाली के मौके पर दिवारी नृत्य होता है, जिसकी अपनी अलग रौनक होती है। 

इस नृत्य को पाई डंडा के नाम से भी जाना जाता है। ये दीवाली के आसपास खेला जाने वाला नृत्य है, जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ बुंदेलखंड की शौर्य और उल्लास की भी झलक देखने को मिलती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दिवारी नृत्य की शुरुआत कैसे हुई थी और इसकी खासियत क्या है। 

क्या है दीवारी नृत्य का इतिहास?

लोक मान्यता है कि इस नृत्य की शुरुआत द्वापर युग में भगवान कृष्ण के समय हुई थी। जब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को इंद्रदेव के प्रकोप से बचाया था, तब ब्रज और आसपास के ग्वालों ने प्रसन्न होकर हाथों में लाठियां लेकर उत्सव मनाया था। तभी से ये परंपरा अहीर और ग्वाला समाज में शुरू हुई और आज तक चली आ रही है। माना जाता है कि बुंदेलखंड के इलाके में चंदेल राजाओं के शासनकाल के दौरान इस लोक नृत्य को खास बढ़ावा मिला। 

दिवारी नृत्य क्यों किया जाता है?

ये नृत्य दीवाली से लेकर भैयादूज तक आयोजित किया जाता है। ये नृत्य बहादुरी और आत्मरक्षा से जुड़ा माना जाता है। ये नृत्य बुंदेलखंड के लोगों के साहस और युद्ध कौशल को दिखाने के लिए किया जाता था और आज भी ये नृत्य इसी भावना के साथ किया जाता है। 

युवाओं की टोलियां घर-घर जाकर अपनी इस कला से जरिए सुरक्षा और भाईचारे का संदेश देती है। साथ ही, अहीर और यादव समाज के लोग खुद को भगवान कृष्ण का वंशज या सखा मानते हैं और इस नृत्य के जरिए अपनी आस्था प्रकट करते हैं। 

क्या है दिवारी नृत्य की खासियत?

इस नृत्य की सबसे बड़ी खासियत है इसकी युद्ध शैली। नर्तक अपने हाथों में लगभग 5-6 फीट लंबी मजबूत लाठियां लेकर ढोल और नगाड़ों की गूंज के बीच तेजी से प्रहार करते हैं और उतनी ही फुर्ती से बचाव भी करते हैं। लाठियों के ताबरतोड़ वार और काउंटर-वार के बीच गजब का तालमेल देखने को मिलता है। इस नृत्य के लिए नर्तक काफी समय तक अभ्यास करते हैं, ताकि करतब दिखाते समय किसी को चोट न लगे। 


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