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सिर्फ लोकनृत्य नहीं, कान्हा भक्ति का प्रमाण है छत्तीसगढ़ का 'राउत नाचा'; श्रीकृष्ण के वंशज आज भी निभा रहे यह परंपरा

Published: Fri, 04 Sep 2026 02:05 PM (IST)

राउत नाचा भगवान कृष्ण की जीत की खुशी में छत्तीसगढ़ में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

भगवान कृष्ण के वंशज निभा रहे हैं राउत नाचा की परंपरा (Image Source: AI Generated)

भगवान कृष्ण के वंशज निभा रहे हैं राउत नाचा की परंपरा (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ का एक ऐसा लोकनृत्य है, जो नृत्य कम और आराधना का प्रतीक ज्यादा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं भगवान श्री कृष्ण से जुड़े लोकनृत्य राउत नाचा की, इसके बारे में कहा जाता है कि इस नृत्य को भगवान श्री कृष्ण के वंशज आज भी किया करते हैं। 

आइए हजारों साल पुराने इस राउत नाचा के अनोखे इतिहास के बारे में विस्तार से बात करते हैं।  

भगवान कृष्ण के वंशज निभा रहे हैं राउत नाचा की परंपरा

राउत नाचा छत्तीसगढ़ में बेहद लोकप्रिय नृत्य है जिसे खासतौर से बिलासपुर और आदिवासी इलाकों में किया जाता है। इसे वहां दूध-दही का काम करने वाले यादव समुदाय के लोग यानी श्री कृष्ण के वंशज एक परंपरा के तौर पर हजारों सालों से करते आ रहे हैं। 

राउत नाचा की शुरुआत दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा से होती है और इसे 7 से 14 दिनों तक किया जाता है। इस दौरान यदुवंशी लोग घर-घर जाकर पारंपरिक नृत्य करते हैं और उन्हें भेंट में वस्त्र अन्न दिए जाते हैं। 

भगवान कृष्ण की जीत से जुड़ी है पौराणिक मान्यता 

राउत नाचा भगवान कृष्ण की विजय का प्रतीक है जिसे दिवाली के बाद गौड़ उत्सव के दिन किए जाने की परंपरा है। इस दिन को श्री कृष्ण द्वारा अधर्मी राजा कंस का वध करने और बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी में यादव समुदाय द्वारा मनाया जाता है। इस दौरान, यदुवंशी भगवान कृष्ण के जीवन पर आधारित दोहों, वीरगाथाओं, कवि कबीर और तुलसी के छंद गाते हुए नाचते हैं।  

कैसे किया जाता है नृत्य? 

इस नृत्य में यादव समुदाय के केवल पुरुष नर्तक अपनी पारंपरिक चमकीले और रंगीन वेशभूषा पहनकर, अपने कमर और टखनों में घुंघरू बांधकर, हाथों में सजी हुई लाठियों और धातु के ढाल के साथ टोलियों में घरों से निकलते हैं। नृत्य करते समय बीच-बीच में भक्ति, नीति, हास्य और पौराणिक कहानियों वाले दोहे गाए जाते हैं। 

इतना ही नहीं, इन 7 दिनों में महाभारत काल से जुड़ी कहानियों को भी बड़े अनोखे ढंग से चित्रित किया जाता है। वहीं, इस दौरान आदिवासी जीवन शैली की भी झलक देखने को मिलती है। फिर सजी हुई लाठियों से ही गीतों के बीच में शौर्य और शृंगार के सुंदर भाव प्रस्तुत किए जाते हैं। 

राउत नाचा में शामिल होने वाले वाद्य यंत्र

राउत नाचा में टिमकी (अर्धगोलाकार ताल वाद्य), मोहरी (फूंककर बजाए जाने वाला वाद्य यंत्र), दफड़ा (डफली), ढोलक, सिंगबाजा (लोहे या बर्तन के आकार वाला यंत्र), मांदर (ढोलक जैसा पर बेलनाकार वाद्य यंत्र) और ड्रम जैसे छतीसगढ़ के लोकवाद्य यंत्रों का उपयोग होता है। 

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