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शादी-ब्याह के लिए ही नहीं, समाज की बुराई पर भी सवाल उठाते हैं लोकगीत; महिलाओं के विद्रोह की सुनाते हैं दास्तान

Published: Sat, 26 Sep 2026 04:30 PM (IST)

लोकगीत केवल त्योहारों के लिए नहीं, बल्कि समाज की बुराइयों और महिलाओं के अधिकारों पर सवाल उठाने का जरिया भी हैं।

समाज की बुराइयों पर सवाल उठाते हैं लोकगीत (AI Generated Image)

समाज की बुराइयों पर सवाल उठाते हैं लोकगीत (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लोकगीत किसी भी समाज का आईना होते हैं। ये सिर्फ त्योहारों या शादी-ब्याह पर नहीं गाए जाते, बल्कि ये समाज की कमियों और बुराई के खिलाफ भी आवाज उठाते हैं।

सदियों से जब भी महिलाओं के अधिकारों को कुचलने और उनकी गरिमा को चोट पहुंचाने की कोशिश की गई है, तब-तब लोकगीतों के जरिए समाज पर सवाल उठाए गए हैं और प्रतिरोध दर्ज करवाया गया है। 

सुरक्षा के नाम पर बंदिशें

राजस्थान का मशहूर लोकगीत चांग चढ़यो गिगनार में एक लाइन आती है, जिसमें मां अपनी बेटी से कहती है कि आसमान में चांद निकल आया है और अंधेरा हो गया है। तुम जल्दी घर आओ, नहीं तो तुम्हारा पिता तुम्हें डांटेंगे। गीत ये पंक्ति इस सोच को उजागर करती है कि महिला की सुरक्षा के लिए उसे घर में ही रखना चाहिए और अंधेरा होने पर बाहर नहीं निकलने देना चाहिए। हालांकि, ऐसी कोई बंदिश पुरुषों पर नहीं लगाई जाती। 

हाल ही में दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। कालकाजी के पास एक नाबालिक लड़की के साथ हुए दुष्कर्म के बाद पास ही स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज ने छात्राओं की क्लासेज ऑनलाइन मोड में शिफ्ट कर दी और कहा कि बच्चियों की सुरक्षा हमारे लिए सबसे अहम है। 

कॉलेज का ये फैसला भी यही दिखाता है कि सुरक्षा के नाम पर महिलाओं को बंदिशों में रखा जाता है। लोकगीत इसी सोच पर सवाल खड़ा करते हैं कि अपराध करने वालों पर लगाम लगाने के बजाय हर बार महिलाओं की आवाजाही और उनके दायरों को ही सीमित क्यों किया जाता है। 

गरिमा से खिलवाड़ का जवाब

जहां एक ओर लोकगीत महिलाओं पर लगने वाली रोक-टोक को बयां करते हैं, वहीं दूसरी ओर वो मिसाल भी पेश करते हैं कि अगर महिलाओं की गरिमा और सम्मान को ठेस पहुंचाई जाए, तो अपराधी का क्या हाल होता है। राजस्थान का एक लोकगीत है गुडलो घूमेला जी घूमेला। ये गीत मारवाड़ में हुई एक घटना से जुड़ा है। कहानी कुछ ऐसी है कि एक बार गणगौर के दिन कुछ महिलाएं पूजा के लिए घर से निकली थीं।

रास्ते में अजमेर के सूबेदार के सेनापति गुडले खां ने 40 महिलाओं का अपहरण कर लिया। जब ये खबर वहां के राजा राव सातल देव को मिली, तो वो तुरंत अपनी सेना के साथ गुडले खां के साथ युद्ध के लिए निकले और उसे मार गिराया। राजा राव सातल देव ने उन महिलाओं को रिहा करवा दिया और उन्हें गुडले खां का सिर भेंट में दे दिया। 

इन महिलाओं ने गुडले खां का सिर एक थाली में रखकर पूरे गांव का चक्कर लगाया और संदेश दिया कि महिला की गरिमा से खिलवाड़ करना कितना भारी पड़ सकता है। तब से ये परंपरा शुरू हो गई और हर साल महिलाएं गुडले खां के सिर के प्रतीक के रूप में मटका सिर पर रखकर पूरे गांव में घूमती हैं और गुडलो घूमेला जी घूमेला लोकगीत गाया जाता है। 

समाज की आवाज हैं लोकगीत

इन गीतों से समझ सकते हैं कि लोकगीत सिर्फ ये बयां नहीं करते कि हमारे आस-पास क्या हो रहा है, बल्कि समाज में पैर पसार रही बुराइयों पर भी सवाल उठाते हैं।