बिना किसी स्क्रिप्ट के किया जाता है कश्मीर का ये लोक नाटक, सत्ता पर मजाकिया तंज कसता है ‘भांड पाथेर’
भांड पाथेर कश्मीर का सदियों पुराना लोक नाटक है, जिसमें सत्ता पर हास्य के जरिए तंज कसा जाता है।

कश्मीर का सदियों पुराना लोक नाटक भांड पाथेर (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। कश्मीर का नाम लेते ही वहां की हसीन वादियां और शिकारा राइड्स की तस्वीर दिमाग में आती है, लेकिन वहां की संस्कृति में और भी काफी कुछ है। कश्मीर की लोक संस्कृति में भांड पाथेर भी शामिल है, जो यहां का सदियों पुराना लोकनाट्य है।
भांड पाथेर मनोरंजन के लिए तो किया जाता है, लेकिन इसके साथ-साथ इसमें और भी काफी कुछ छिपा है। जब मीडिया का कोई वजूद नहीं था, तब भांड पाथेर कश्मीरी समाज के आईने की तरह काम करता था। आइए जानें इस लोकनाट्य की शुरुआत कैसे हुई और इसकी क्या खासियत है।
क्या है भांड पाथेर का इतिहास?
इन नाटक का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है। भांड और पाथेर। भांड शब्द भावना से आया है और पाथेर पात्र शब्द से निकला है। भांड पाथेर का इतिहास काफी पुराना रहा है। इस नाटक की कोई स्क्रिप्ट नहीं होती, ये मौखिक परंपरा है। गुरु-शिष्य परंपरा के जरिए ये नाटक पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा है। इसमें कंश्मीर के सूफी संतों के लिखे वाख और शुरुख की झलक देखने को मिलती है।
कैसे किया जाता है भांड पाथेर?
इस लोक नाटक का आयोजन आमतौर पर खुले मैदानों या गांव के चौपालों के पास किया जाता है। दर्शक जमीन पर बैठकर नाटक का आनंद लेते हैं और कलाकारों की मंडली रंग-बिरंगे चमकीले पोशाकों में नाटक पेश करती है। ये कलाकार एक जगह से दूसरी जगह घूम-घूमकर भांड पाथेर का आयोजन करते हैं और गांव वाले इन नाटकों को बड़े शौक से देखा करते थे।
इस नाटक में बैकस्टेज साउंड या रिकॉर्डेड म्यूजिक का इस्तेमाल नहीं होता। सब कुछ दर्शकों की आंखों के सामने लाइव होता है। इस नाटक को पेश करते समय ढोल और सुरनाई जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। खास बात ये भी है कि इस नाटक में सिर्फ पुरुष ही सभी किरदार निभाते हैं और महिलाएं इस नाटक में हिस्सा नहीं लेती हैं। कला, नृत्य और संगीत से मिल जुलकर बना ये लोकनाट्य कश्मीर की संस्कृति में काफी खास जगह रखता है।
भांड पाथेर इतना खास क्यों है?
इसकी सबसे खासियत इसकी व्यंगात्मक शैली है। भले ही इसकी कहानियां पुरानी हो, लेकिन कलाकारा इसमें आज के समाज और राजनीति के मुद्दों को इतनी कुशलता के साथ इन कहानियों में पिरोते हैं कि हर प्रदर्शन नए जैसा लगता है।
नकल, हास्य और तंज के जरिए ये नाटक सत्ता की कमियों और सामाजिक बुराइयों को दर्शकों को इस अंदाज में पेश करता है कि लोग हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते हैं। इसमें शिकारागाह पाथेर, अंग्रेज पाथेर, गोसाईं पाथेर जैसे अलग-अलग विषय हैं, जो इसे और भी मजेदार और खास बनाते हैं। इसके अलावा, बाकी नाटकों की तरह इसकी कोई फिक्स टिकट प्राइस नहीं होती। दर्शक अपनी मर्जी और हैसियत के हिसाब से शुल्क दे सकते हैं।
