मराठी संस्कृति की शान है ‘तमाशा’, कभी अश्लील कहकर किया गया था साइड लाइन; दिलचस्प है लोक नाट्य की कहानी
तमाशा महाराष्ट्र का मशहूर लोक नाट्य है, जिसका इतिहास सदियों पुराना है। इसमें शृंगार रस, हास्य और व्यंग्य का मेल देखने को मिलता है।

क्या है तमाशा की कहानी? (AI Generated Image)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। महाराष्ट्र की लोक संस्कृति की बात करें, तो तमाशा का जिक्र करना जरूरी है। ये एक लोक नाट्य है, जो लावणी, तीखे व्यंग्य और समाजिक मुद्दों को पेश करता है। तमाशा का इतिहास सदियों पुराना है और पेशवाओं के समय से जुड़ा हुआ है।
फारसी से निकले इस शब्द का मतलब मनोरंजन होता है, लेकिन असल में ये समाज की कुरीतियों और जातिप्रथा पर करारा प्रहार करने का एक जरिया रहा है। आइए जानें कैसे हुई तमाशा की शुरुआत और इसका महत्व क्या है।
क्या है तमाशा का इतिहास?
तमाशा का इतिहास बारहवीं शताब्दी के गांवों से जुड़ा माना जाता है। पुराने समय में मनोरंजन के लिए नाटक का आयोजन होता था और माना जाता है कि तमाशा इसी से निकला है। हालांकि, पेशवाओं के संरक्षण में इस कला को काफी बढ़ावा मिला।
16वीं शताब्दी में युद्ध के मैदानों में सैनिकों का मनोरंजन करने के लिए घुमंतू कलाकार कलाबाजियों और संगीत का सहारा लेते थे। इस कला में गोंधल, दशावतार और वाघ्या मुरली जैसी लोक परंपराओं को शामिल किया जाता था।
शुरुआत में तमाशा सिर्फ दलित और खानाबदोश समुदाय के लोग ही किया करते थे। सामंती व्यवस्था में इन कलाकारों के पास सामान्य इंसानों जैसे अधिकार नहीं थे। सवर्णों के मनोरंजन के लिए उनसे नाच-गाना करवाया जाता था।
तमाशा की शुरुआत में सिर्फ पुरुष ही इसमें हिस्सा लिया करते थे, लेकिन पेशवा काल के बाद दलित महिलाओं को नाचने के लिए रखा जाने लगा और उच्च जाति के सामंत उनके साथ शारीरिक जबरदस्ती और शोषण भी किया करते थे।
वक्त के साथ तमाशा में क्या बदलाव आए?
19वीं शताब्दी तक तमाशा सिर्फ पुरुष ही किया करते थे, जिन्हें नाचया कहा जाता था। ये पुरुष महिलाओं के कपड़े पहनकर नृत्य किया करते थे। हालांकि, समय के साथ पुरुषों का महिलाओं की तरह नाचने को बुरा माना जाने लगा और पुरुषों की जगह महिला कलाकारों ने ले ली।
तमाशा में शृंगार रस भी शामिल होता है। इसलिए 20वीं सदी में उच्च वर्ग के लोगों ने इसी शृंगार रस के कारण इसे अश्लीलता का दर्जा देकर इस कला को साइड लाइन करने की कोशिश की। आज तमाशा में काफी बदलाव आए हैं और ये सिर्फ लावणी तक सीमित नहीं है। इसमें आधुनिक थिएटर और मंचो के हिसाब से ढलकर खुद को समाज में जिंदा रखा है।
क्या है तमाशा की खासियत?
पेशवा काल के बाद आम जनता ने ही तमाशा को जिंदा रखा और प्राइवेट बैठकों और खुले मैदानों में इसका आयोजन किया जाने लगा। इसमें कलाकार पारंपरिक जरीदार नवरी साड़ी, कमरपट्टा और भारी घुंघरू पहनते हैं। तमाशा में एक सूत्रधार होता है, जो इसे चलाता है और विदूषक अपने दोहरे मतलब वाले संवादों और हास्य के जरिए समाज पर व्यंग्य कसता है।
असल तमाशा में लावणी, शृंगार और कामुकता का मेल देखने को मिलता है हालांकि, लोक नाट्य के रूप में इसे काफी सॉफिस्टिकेटेड ढंग से पेश किया जाता है।
