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पेशवाओं के दरबार से तमाशा के मंच तक... दिलचस्प है महाराष्ट्र के लोक नृत्य 'लावणी' की 300 साल पुरानी कहानी

Published: Sun, 28 Jun 2026 04:34 PM (IST)Updated: Fri, 03 Jul 2026 04:29 PM (IST)

लावणी महाराष्ट्र का एक लोक नृत्य है, जिसकी शुरुआत की कहानी काफी दिलचस्प है।

महाराष्ट्र का पारंपरिक लोक नृत्य है लावणी (Picture Courtesy: YouTube)

महाराष्ट्र का पारंपरिक लोक नृत्य है लावणी (Picture Courtesy: YouTube)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। श्रद्धा कपूर की आने वाली फिल्म ईथा आजकल काफी सुर्खियों में है। इसके साथ ही लावणी भी चर्चा में है, क्योंकि इसमें श्रद्धा तमाशा क्वीन के नाम से मशहूर लावणी नृत्यांगना विठाबाई नारायणगांवकर की भूमिका निभा रही हैं। 

लावणी महाराष्ट्र का एक लोक नृत्य है, जिसका इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। लावणी लावण्य शब्द से बना है, जिसका मतलब होता है सुंदर और ये लोक नृत्य अपने नाम पर बिल्कुल खरा उतरती है। घुंघरुओं की झंकार और ढोलकी की थाप के साथ ये लोक नृत्य ऐसा समां बांधती है कि लोगों की नजरें नहीं हटतीं। आइए आज महाराष्ट्र की शान लावणी की कहानी जानते हैं।     

कैसे शुरू हुआ लावणी नृत्य

लावणी का इतिहास मराठा साम्राज्य से जुड़ी है। माना जाता है कि इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी में हुई और पेशवा बाजीराव द्वितीय के शासनकाल में इसे खास संरक्षण मिला। उस दौर में लावणी मनोरंजन का खास साधन बन गया। समय के साथ-साथ लावणी को तमाशा में भी शामिल किया जाने लगा और घुमंतू लोक नाट्य का हिस्सा बन गया। 

शुरुआत में जो लावणी सिर्फ शाही लोगों के मनोरंजन के लिए थी, धीरे-धीरे समाज के हर वर्ग के लोगों तक पहुंच गई। हालांकि, गौर करने वाली एक बात यह भी है कि लावणी पहले सिर्फ पुरुष देखा करते थे और सिर्फ निचले वर्ग की महिलाएं ही इस नृत्य को किया करती थीं। 

Lavni (1)

(AI Generated Image)

लावणी की खासियत क्या है? 

लावणी ढोलकी और तबले की तेज ताल पर किया जाने वाला नृत्य है। ढोलकी की थाप पर घुंघरु पहनकर नृत्यंगनाएं तेज ताल के साथ नृत्य करती हैं और दर्शकों के लिए कहानी पेश करती हैं।

अगर लावणी की शैली की बात करें, तो एक है शृंगारी लावणी, जिसमें प्रेम, सुंदरता और इंतजार को दिखाया जाता है और दूसरी है  निर्गुणी लावणी, जिसमें दार्शनिक और आध्यात्मिक बातों पर जोर होता है। 

साथ ही, लावणी करते समय चेहरे के हाव-भाव और आंखों के एक्सप्रेशन काफी जरूरी होते हैं। आंखों के जरिए कलाकार कहानी के भाव बयां करते हैं। 

लावणी की वेशभूषा कैसी होती है? 

लावणी जितना खूबसूरत नृत्य है, उसकी वेशभूषा और शृंगार भी उतना ही खूबसूरत होता है। लावणी डांसर महाराष्ट्र की पारंपरिक नौवरी साड़ी पहनती हैं, जो 9 गज लंबी होती है। इसे धोती की तरह पैरों के बीच से निकालकर पहना जाता है, ताकि नृत्यांगनाएं तेजी से थिरक और चल सकें।  

इस लोक नृत्य का शृंगार भी काफी खास होता है। नृत्यंगनाएं सोने और मोतियों के गहने पहनती हैं। इनमें गले में ठुशी, कानों में झुमकें, कमरबंध, पैरों में वजनी घुंघरु, माथे पर बड़ी गोल या चांद के आकार की मराठी बिंदी और नाक में पारंपरिक मोतियों वाली नथ पहनी जाती है। इसके साथ बालों का जूड़ा बनाकर गजरे से सजाया जाता है।