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हाथरस के अखाड़े से शुरू हुई ‘नौटंकी’, पढ़ें कैसे एक राजकुमारी की प्रेम कहानी से जन्मी UP की ये लोक नाटक परंपरा

Published: Thu, 10 Sep 2026 01:09 PM (GMT+05:30)

नौटंकी की शुरुआत उत्तर प्रदेश के हाथरस से जुड़ी है। लोक नाटक की इस शैली को ये नाम मिलने के पीछे भी दिलचस्प कहानी है।

क्या है नौटंकी की कहानी? (AI Generated Image)

क्या है नौटंकी की कहानी? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की संस्कृति में नौटंकी की खास जगह है। लोक नाटक की ये शैली सिनेमा के आने से बहुत पहले से लोगों के मनोरंजन का जरिया रहा है। गांव-देहात के इलाकों में नौटंकी मनोरंजन के साथ-साथ समाज की बुराइयों और लोक कथाओं को सुनाने के लिए भी किया जाता है। 

उत्तर प्रदेश के लोक जीवन और संस्कृति से जुड़ी नौटंकी काफी दिलचस्प है और इतनी ही दिलचस्प इसकी शुरुआत की कहानी है। आइए जानें कैसे हुई नौटंकी की शुरुआत और इसकी खासियत क्या है। 

कैसे हुई नौटंकी की शुरुआत?

मध्यकालीन समय में स्वांग हुआ करते थे, जो एक प्रकार के लोक नाटक की परंपरा है। 19वीं सदी में आकर आगरा और ऊध के प्रांतों में स्वांग ने नौटंकी का रूप लिया और धीरे-धीरे लोगों के बीच काफी मशहूर होने लगा। 

राजकुमारी नौटंकी से मिला ये नाम

स्वांग का नाम नौटंकी पड़ने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी छिपी है। कहा जाता है कि पंजाब की एक बेहद खूबसूरत राजकुमारी नौटंकी और शहजादे फूलसिंह की प्रेम कहानी पर एक स्वांग रचा गया। ये नाटक लोगों को इनता पसंद आया कि जब भी ये स्वांग होता, लोग इसे नौटंकी कहते और धीरे-धीरे लोक नाटक की इस शैली का नाम नौटंकी ही पड़ गया। 

हाथरस से शुरू हुई नौटंकी

कहा जाता है कि नौटंकी सबसे पहले उत्तर प्रदेश के हाथरस के एक अखाड़े में शुरू हुई थी, जिसमें सिर्फ पुरुष हिस्सा लेते थे। महिलाओं के किरदार भी पुरुष ही निभाया करते थे। इसके बाद नौटंकी कानपुर के इलाकों में पहुंची और वहां भी काफी मशहूर हुई। यहीं से नौटंकी की दो शैलियां हाथरस शैली और कानपुर शैली की शुरुआत हुई।  

हाथरस शैली में नौटंकी स्वांग से मिलती-जुलती ही रही, जिसमें हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक पर जोर दिया जाता है। वहीं कानपुर शैली में एक्टिंग, डायलॉग्स और हाव-भाव पर ज्यादा जोर दिया जाता है। 

क्या है नौटंकी की खासियत?

नौटंकी अपनी खास प्रस्तुति के लिए जानी जाती है। इसमें नगाड़ा, हारमोनियम और शहनाई जैसे वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें बातचीत भी साधारण तरीके से न करके छंद या पद्य में किए जाते हैं। साथ ही, नौटंकी बंद थिएटर की जगह खुली जगहों पर की जाती है। इसमें दर्शकों को नाटक से जोड़ने के लिए एक सूत्रधार होता है, जो कहानी का ताना-बाना बुनता है। 

ऊंची आवाज, छंदों और एक्टिंग के जरिए लैला-मजनू, महाभारत, राजा हरिश्चंद्र, भक्त प्रहलाद और कई ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं को नौटंकी के जरिए लोगों तक पहुंचाया जाता है। 


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