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'सिंधी लोकगीत' से बना है तमन्ना भाटिया का ये गाना, पाकिस्तान में मौत की सजा पाए एक कैदी से जुड़ी है कहानी

Published: Thu, 10 Sep 2026 09:54 AM (IST)

सिंधी लोकगीत हो जमालो का इतिहास काफी पुराना है। ये गाना आज पाकिस्तान में आने वाले सुक्कुर से जुड़ा है।

सिंधी लोकगीत हो जमालो की कहानी (AI Generated Image)

सिंधी लोकगीत हो जमालो की कहानी (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। तमन्ना भाटिया का गाना तुतक तुतक तुतिया आपने जरूर सुना होगा। कई लोग इस गाने को तुतक तुतक तुतिया, दही जमा लो गाते हैं, लेकिन ये दही जमा लो नहीं है। जी हां, असल में ये ‘हो जमालो’ है, जिसका नाता आज के पाकिस्तान से जुड़ा है। 

हो जमालो एक सिंधी लोकगीत है, जिसे खुशी के मौके पर इस समुदाय के लोग गाते हैं। सिंधी लोगों के हर सेलिब्रेशन पर ये गाना जरूर बजता है, लेकिन इस गाने के पीछे एक शर्त की कहानी है। आइए जानें क्या है इस सिंधी लोकगीत की कहानी। 

सुक्कुर का लैंसडाउन ब्रिज

ये कहानी 1889 की है, जब सिंध ब्रिटिश शासन के अधीन था। उस दौरान सिंधु नदी पर सुक्कुर और रोहरी, जो आज पाकिस्तान में हैं, को जोड़ने के लिए एक बड़ा लोहे का पुल बनाया गया, जिसे लैंसडाउन ब्रिज कहा गया। ये एक कैंटिलिवर पुल था, जो उस समय के लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। 

इस पुल को ट्रेन के लिए बनाया गया था, ताकि लोग या माल एक तरफ से दूसरी तरफ आसानी से जा सके। लेकिन जब पुल बनकर तैयार हुआ, तो कोई भी इस पुल से ट्रेन लेकर जाने को राजी नहीं था। लोगों को ये पुल काफी खतरनाक लग रहा था और कोई भी अपना जान को जोखिम में नहीं डालना चाहता था। 

लोगों को लग रहा था कि ये पुल रेल का वजन संभाल ही नहीं पाएगा और हादसे का खौफ इतना था कि कोई भी ड्राइवर इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार नहीं था। ऐसे में अब प्रशासन को ऐसे आदमी की तलाश थी, जिसे अपनी जान का कोई डर न हो। 

एक कैदी ने दिखाया साहस

अंग्रेजी शासन के सामने खड़ी इस मुसीबत को सुलझाने के लिए जमालो सीधी नाम के एक व्यक्ति की मदद ली गई। जमालो सिंधी समुदाय से तालुक्क रखता था और उसे किसी अपराध के लिए मौत की सजा दी जाने वाली थी। जब जमालो को पुल वाली बात पता चली, तो उसने अंग्रेजी प्रशासन के सामने शर्त रखी कि वो ट्रेन को उस पुल के पार ले जाने का जोखिम उठाने के लिए तैयार है, लेकिन अगर वो ट्रेन को पुल से पार करवा दे, तो उसकी मौत की सजा को माफ करके उसे रिहा कर दिया जाएगा। अंग्रेजी हुकुमत इस शर्त को मानने के लिए राजी हो गई। 

पुल के पार मिली आजादी

ट्रेन चलाने के लिए जमालो को ट्रेनिंग दी गई और जब ट्रेन को उस पुल से गुजारने का दिन आया, तो इस नजारे को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए। जमालो ने ट्रेन को लैंसडाउन ब्रिज के एक छोर से दूसरे छोर तक ले जाने में सफल रहा। जमालो जिंदा बच गया और शर्त के मुताबिक, उसकी मौत की सजा माफ कर दी गई और उसे आजादी मिली। 

जमालो के स्वागत में गीत

जैसे ही जमालो सीधी ट्रेन से बाहर आया, उसकी पत्नी और समुदाय के सभी लोगों ने खुशी से झूमना शुरू कर दिया और हो जमालो, वाह जमालो कहकर उसका स्वागत किया। माना जाता है कि इसी समय हो जमालो गाना पहली बार बना था।  

हो जमालो! मुंझो खटी इंडो खाई सा, हो जमालो! सुक्कर वारिए पुल ते, हो जमालो! गाकर लोगों ने खुशी मनाई। इस गाने में कहा गया था कि जमालो जीतकर वापस आ गया है और ये पुल सुक्कुर का है। 

सिंधी समुदाय का लोकगीत

वक्त के साथ ये गीत सिंधी समुदाय की संस्कृति का हिस्सा बन गया और हर खुशी के मौके पर गाया जाने लगा। इस गाने को कई बड़े-बड़े संगीतकारों ने गाया और इसे दुनियाभर में मशहूर कर दिया।