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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 17, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

जंगल को जीवन देगी बंजर की हरियाली...वन संरक्षण के लिए जरूरी हैं उठाने ये 3 कदम

Published: Mon, 17 Mar 2025 02:00 PM (IST)

वन निःसंदेह प्रकृति ने बनाए हैं लेकिन इनके बाहर मानव ने भी असंख्य उपवन उपजाए हैं। वन संपदा को बचाना ...और पढ़ें

ब्रिटिश सरकार के दौरान शुरू हुआ था भारत में वन प्रबंधन (Picture Courtesy: Freepik)
ब्रिटिश सरकार के दौरान शुरू हुआ था भारत में वन प्रबंधन (Picture Courtesy: Freepik)

HighLights

  1. ब्रिटिश सरकार ने शुरू किया था भारत में वन प्रबंधन।
  2. भारत का वनों के साथ जुड़ने का प्रयास ‘चिपको आंदोलन’ से शुरू हुआ।
  3. पेड़ों को हर कीमत पर संरक्षित करना जरूरी है।

सुनीता नारायण, नई दिल्ली। भारत में वन प्रबंधन ब्रिटिश सरकार के दौरान शुरू हुआ था। अंग्रेजों ने सामुदायिक भूमि सरकार के अधीन करके उसका राष्ट्रीयकरण कर दिया था। वन उनके लिए आर्थिक शोषण को पोषित करने का जरिया भर थे। स्वतंत्रता के बाद पहले चरण तक भारत ने इस दोहनकारी व्यवस्था को जारी रखा। दूसरा चरण बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में शुरू हुआ जब वन संरक्षण अधिनियम बना और इसमें संशोधन हुए। इस काल में वनों की कटाई रोकने के लिए जागरूकता पर जोर दिया गया।

 भारत का वनों के साथ जुड़ने का प्रयास ‘चिपको आंदोलन’ से शुरू हुआ जब ऊपरी हिमालय में रहने वाली महिलाओं ने पेड़ों को लकड़हारों द्वारा कटने से बचाने के लिए उन्हें गले लगा लिया, लेकिन हमने आंदोलन की गलत व्याख्या की।

महिलाओं ने पेड़ों की कटाई इसलिए नहीं रोकी कि वे पेड़ों का काटा जाना नहीं चाहती थीं बल्कि इसलिए रोकी कि वे पेड़ों को कब काटा जाए, इसका अधिकार चाहती थीं। उन्हें पता था कि उनका अस्तित्व जंगलों से जुड़ा है। उन्हें चारे और जल संरक्षण के लिए इसकी जरूरत थी, लेकिन हमने आधा-अधूरा संदेश सुना और जब तक यह मैदानी इलाकों में सत्ता के गलियारों में पहुंचाया गया, तब तक और छोटा हो गया। हमने सुना है कि पेड़ों को हर कीमत पर संरक्षित करना जरूरी है। यह नहीं सुना कि हमें एक स्थायी भविष्य बनाने की जरूरत है जो स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए लकड़ी के उपयोग पर आधारित हो!

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वन प्रबंधन के तीसरे चरण में वनीकरण मिशन की शुरुआत हुई। इसमें देशभर में वनों के बाहर अनुपयोगी बंजर भूमि (वेस्टलैंड) पर पेड़ लगाने पर जोर दिया गया। बहुत जल्द यह स्पष्ट हो गया कि वास्तविक बंजर भूमि वन विभाग के नियंत्रण में आती है। यह भी स्पष्ट हो गया कि वनों का अस्तित्व बचाने के लिए जरूरी है कि लोग अपने मवेशियों को बंजर भूमि पर लगाए गए पेड़ों से दूर रखें।

इसी के मद्देनजर संयुक्त वन प्रबंधन की शुरुआत की गई और लोगों को घास जैसे वन उत्पादों पर अधिकार दिया गया। इसके बदले में लोगों को वन भूमि की रक्षा करनी थी ताकि वन बढ़ते रहें। संयुक्त वन प्रबंधन सफल नहीं हो पाया क्योंकि राज्य के वन विभाग की इस योजना में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं हो पाई। वन विभाग भी तभी तत्पर दिखाई दिया, जब वर्षों से संरक्षित पेड़ कटाई के लिए तैयार थे।

समझौते के तहत इसका पैसा ग्राम समुदाय को हस्तांतरित किया जाना था, लेकिन देशभर में यह देखा गया कि वन उत्पादों के लिए मिला धन बहुत कम था। यह ग्रामीण समुदाय के साथ मजाक जैसा था। इससे लोगों का भरोसा उठ गया और पेड़ों को फिर से उगाने का आंदोलन नष्ट हो गया। वर्तमान में चौथा चरण जारी है जिसमें वन संघर्ष के स्थायी युद्धक्षेत्र बन गए हैं।

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वनाधिकारों को मान्यता) अधिनियम 2006 से इन्हें भूमि पर सामुदायिक अधिकार दिया गया। जनजातीय कार्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार करीब 17.1 लाख हेक्टेयर वन भूमि पर इन्हें स्वीकृत किया गया है, लेकिन इस भूमि व अन्य क्षेत्रों में वनीकरण की आवश्यकता पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है।

हमको अतीत से सबक लेते हुए पांचवीं पीढ़ी के वन सुधारों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। आज निजी भूमि पर उगे पेड़ को काटना अपराध की श्रेणी में है, जबकि भारत अधिकांश लकड़ी उत्पादों का आयात करता है। जापान स्थित अंतर-सरकारी संगठन इंटरनेशनल ट्रापिकल टिंबर आर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रकार के लकड़ी उत्पादों का स्रोत आमतौर पर अफ्रीका व अन्य देशों में जंगलों की अवैध कटाई है। ऐसे में भविष्य में वन प्रबंधन के निम्न तीन एजेंडे होने चाहिए :

बचे हुए अति सघन वनों की रक्षा

उच्च गुणवत्ता और जैव विविधता से परिपूर्ण अति सघन वन का एक हेक्टेयर हिस्सा खोना भी हम बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसलिए इन वनों की बेहद सख्ती से रक्षा की जानी चाहिए और ऐसे क्षेत्रों में किसी परियोजना को मंजूरी न दी जाए। यह बेहद संपन्न वन देश की सबसे गरीब आबादी की रिहाइश भी हैं। इस वन भूमि पर सह-अस्तित्व वाले समुदायों को वनों की सुरक्षा का पारिश्रमिक देना चाहिए। 12वें वित्त आयोग ने 2002 में वनों को संरक्षित करने वाले राज्यों को पुरस्कृत करने के लिए राज्य में वनों के क्षेत्र के अनुसार प्रोत्साहन-आधारित अनुदान की स्थापना की थी। 14वें वित्त आयोग ने इस अनुदान के लिए शर्तें हटा दीं जिसका अर्थ है कि राज्य इसका उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं।

बंजर जमीन पर पेड़ों को काटना-लगाना

वन विभाग के अधीन आने वाला विशाल क्षेत्र बंजर रहता है। यह क्षेत्र लोगों और उनके पशुओं का आवास भी है, इसलिए पेड़ लगाने के लिए समुदायों की भागीदारी जरूरी है। वन अधिकार अधिनियम में सामुदायिक वन प्रबंधन का प्रविधान है और अब समय आ गया है कि राज्य इस दिशा में काम करें। इसका मतलब है कि लघु एवं बड़े वन उत्पादों का व्यापार हो। पेड़ों को काटना समस्या नहीं है, समस्या उन्हें फिर से न लगाने और उगाने की है। इस समस्या को दूर किया जाना चाहिए, ताकि घरों व फर्नीचर में सीमेंट, एल्युमिनियम अथवा स्टील के स्थान पर लकड़ी का उपयोग किया जा सके। अगर हम यह काम समुदाय के लाभ के लिए करें तो यह जीवनयापन, स्थानीय आर्थिकी और जलवायु परिवर्तन के लिए भी अच्छा है।

वनक्षेत्र से बाहर लाइसेंस राज खत्म करना

भारत वन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, लोग अपनी भूमि पर पेड़ लगा रहे हैं लेकिन इस बारे में बात नहीं होती कि यह वृक्षारोपण तमाम मुश्किलों के बाद हो रहा है। आज भारत में पेड़ काटना आपराधिक कृत्य है, भले ही वह निजी भूमि पर उगाया गया हो। भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत वनों के बाहर के पेड़ों से प्राप्त लकड़ी या अन्य उपज को भी वन उत्पाद के रूप में माना जाता है। इसके साथ ही राज्य सरकारों ने इसे अपने कई कानूनों से भी जोड़ दिया है, जो पेड़ों की विभिन्न प्रजातियों की कटाई और परिवहन को नियंत्रित करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि ग्रामीणों के लिए पेड़ बैंक खातों की तरह होते हैं। एक पीढ़ी जरूरत पड़ने पर पेड़ लगाती है और दूसरी पीढ़ी काटती है।

(लेखिका पर्यावरणविद् हैं)

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