दीवाली की रात बंगाल में होता है बामा काली नृत्य, मशालों की रोशनी में किया जाता है रोंगटे खड़े करने वाला ये डांस
पश्चिम बंगाल के शांतिपुर में दीवाली पर काली पूजा के बाद 'बामा काली नृत्य' की अनोखी परंपरा है।

पश्चिम बंगाल की बामा काली नृत्य की परंपरा (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में काली पूजा का खास महत्व है, लेकिन नदिया जिले के शांतिपुर में काली पूजा के साथ एक और खास परंपरा जुड़ी हुई है। दीवाली पर काली पूजा के बाद शांतिपुर में कोई सोता नहीं है, बल्कि रात को बामा काली नृत्य किया जाता है।
ये नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं होता, बल्कि ये पश्चिम बंगाल की काली पूजा परंपरा से जुड़ा है। इस नृत्य को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं। इस नृत्य में माना जाता है कि मां काली खुद नृत्य करती हैं। आइए जानें बामा काली नृत्य का इतिहास क्या है और इसकी खासियत।
बामा काली नृत्य का इतिहास क्या है?
शांतिपुर में बामा काली नृत्य की शुरुआत लगभग 500 साल पहले शुरू हुई थी। बामा शब्द का मतलब बायां होता है, क्योंकि मां काली भगवान शिव की छाती पर बायां पैर रखकर खड़ी होती हैं। इसलिए मां के इस स्वरूप को बामा काली कहा जाता है। मां का ये स्वरूप काफी उग्र माना जाता है। इसलिए बामा काली नृत्य में भी काफी उग्रता देखने को मिलती है।
क्या है बामा काली नृत्य की खासियत?
बामा काली नृत्य मां काली की प्रतिमा के विसर्जन से पहले किया जाता है। मां काली की प्रतिमा को एक मजबूत बांस के मंच पर बैठाया जाता है। कई युवा मिलकर इस मंच को अपने कंधों को पर उठाते हैं और ढोल व ढाक की थाप पर ताल से ताल मिलाकर आगे बढ़ते हैं और नृत्य करते हैं। ये नजारा ऐसा लगता है, जैसे मां काली खुद ही नृत्य करने उतर आई हैं।
मां की ये शोभायात्रा रात के समय निकाली जाती है और इसमें तेज लाइट्स की जगह मशालों का इस्तेमाल किया जाता है। मशालों की रोशनी में मां काली का नृत्य ऐसा दृश्य पेश करता है, जिसे देखकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
सोशल मीडिया पर वायरल
पिछले कुछ सालों में बामा काली नृत्य सोशल मीडिया पर भी काफी वायरल हुआ और लोगों के बीच इस नृत्य को लेकर काफी उत्सुकता जागी है। ये नृत्य शांतिपुर के लोगों की मां काली में आस्था और भक्ति का प्रतीक है। भक्त पूरी रात जागते हैं और बामा काली नृत्य में हिस्सा लेते हैं।
