सिर्फ उत्सव नहीं! मां दुर्गा की विदाई पर 'सिंदूर खेला' क्यों होता है खास? इस पावन रस्म में छिपा है गहरा संदेश
सिंदूर खेला दुर्गा पूजा की एक महत्वपूर्ण रस्म है, जो विजयदशमी पर मां दुर्गा की विदाई के समय निभाई जाती ...और पढ़ें

दुर्गा पूजा में सिंदूर खेला: मां की विदाई का गहरा संदेश और परंपरा (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
विजयादशमी पर मां दुर्गा की विदाई से पहले सिंदूर खेला।
विवाहित महिलाएं मां को सिंदूर अर्पित कर आपस में लगाती हैं।
यह रस्म सुख, सौभाग्य और आपसी प्रेम का प्रतीक है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे देश में दुर्गा पूजा की धूम है और इसकी कई रस्मों में से खास माना जाता है माता दुर्गा की मूर्ति के विसर्जन के समय सिंदूर खेलना। इस रस्म को 'सिंदूर खेला' कहा जाता है। बंगाल में दुर्गा पूजा का उत्सव जितना भव्य होता है, उतना ही भावुक भी हो जाता है।
जहां एक तरफ माता दुर्गा मायके से विदाई लेकर ससुराल जा रही होती हैं, वहीं पीछे छूट जाती हैं दुर्गा पूजा की कुछ ऐसी रस्में जो लोगों को बेक साथ जुड़ने का कारण होती हैं। माता दुर्गा की विदाई विजयदशमी के दिन की जाती है और इस दिन होने वाली कई खास परंपराओं में सिंदूर खेला का विशेष महत्व होता है।
इस रस्म में विवाहित महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे के चेहरे पर सिंदूर लगाकर घर के सुख, सौभाग्य और खुशहाली की कामना करती हैं। आइए आपको बताते हैं इस परंपरा के पीछे के गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक संदेश के बारे में।
क्या है सिंदूर खेला की परंपरा?
सिंदूर खेला मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा की एक लोकप्रिय परंपरा है। इसे दुर्गा पूजा के अंतिम दिन, यानी विजयादशमी पर मां दुर्गा की विदाई से पहले किया जाता है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक लाल और सफेद साड़ी पहनकर पूजा पंडालों में इकठ्ठा होती हैं और दुर्गा पूजा के पर्व की खुशियां मनाती हैं, यही नहीं मन में माता की विदाई का एक भाव भी होता है और माता से समृद्धि की कामना करती हैं।
इस रस्म में सबसे पहले मां दुर्गा के चरणों और माथे पर सिंदूर अर्पित किया जाता है। इसके बाद पंडाल में मौजूद सभी महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मिठाई खिलाकर शुभकामनाएं देती हैं। इस रस्म के दौरान ढाक की थाप, शंखनाद और उल्लासपूर्ण वातावरण उत्सव को और भी खास बना देते हैं।
मां दुर्गा की विदाई पर क्यों खेला जाता है सिंदूर?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां दुर्गा को बेटी के रूप में भी देखा जाता है, जो दुर्गा पूजा के दौरान अपने मायके आती हैं और कुछ दिनों के वहीं रहने के बाद विजयदशमी के दिन ही ससुराल यानी कैलाश पर्वत लौटती हैं।
जिस तरह से मायके से बेटी की विदाई के समय माताएं बेटी को सिंदूर लगाकर विदा करती हैं उसी तरह दुर्गा विसर्जन से ठीक पहले महिलाएं माता को सिंदूर अर्पित करती हैं। विजयदशमी के दिन माता की विदाई को इसी भाव से जोड़ा जाता है। सिंदूर खेला के माध्यम से महिलाएं मां दुर्गा को विदाई देती हैं और उनके सुखमय जीवन की कामना भी करती हैं।
सिंदूर खेला का आध्यात्मिक संदेश
सिंदूर खेला की रस्म न केवल माता की विदाई के समय समृद्धि की कामना करना होता है, बल्कि यह आपसी प्रेम और एकजुटता का भाव भी बढ़ाता है।
एक-दूसरे को सिंदूर लगाना आपस में खुशियां बांटने और रिश्तों को मजबूत करने का भाव दिखाता है। इस रस्म में सिर्फ महिलाएं हिस्सा लेती हैं क्योंकि किसी भी अपरिवार की नींव महिलाएं ही मानी जाती हैं और उन्हें माता से जुड़ने का सीधा माध्यम समझा जाता है।
इस प्रकार, सिंदूर खेला दुर्गा पूजा के समापन का प्रतीक तो है ही और सिंदूर सुहाग, सौभाग्य और मंगल का प्रतीक भी होता है।
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