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पीरियड्स को एक उत्सव की तरह मनाता है ओडिशा, बहुत दिलचस्प है चार दिनों तक मनाया जाने वाला ‘रज पर्व’

Published: Sat, 19 Sep 2026 01:07 PM (IST)

ओडिशा में चार दिनों का रज पर्व मनाया जाता है, जिसका नाता पीरियड्स यानी मासिक धर्म से है।

ओडिशा में क्यों मनाया जाता है रज पर्व? (AI Generated Image)

ओडिशा में क्यों मनाया जाता है रज पर्व? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति की खासियत ही यही है कि यहां हर मौके के लिए कोई न कोई खास रिवाज, नृत्य या गीत है। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है ओडिशा, जहां रज पर्व मनाया जाता है। जहां हमारे समाज में पीरियड्स यानी मासिक धर्म को अपवित्र माना जाता है, ओडिशा उसे एक त्योहार की तरह धूमधाम से मनाता है। आइए जानें कैसे मनाया जाता है रज पर्व।

क्या है रज पर्व?

रज शब्द संस्कृत के शब्द रजस्वला से बना है, जिसका मतलब होता है मासिक धर्म से गुजरने वाली स्त्री। ये त्योहार आषाढ़ के महीने में चार दिनों तक मनाया जाता है। मान्यता है कि इस समय धरती माता रजस्वला होती हैं और मानसून की पहली बारिश के बाद धरती मां नई फसल उगाने के लिए खुद को तैयार करती हैं। इसलिए इस दौरान महिलाएं भी अपने कामों से ब्रेक लेती हैं और फर्टिलिटी से जुड़े इस त्योहार को मनाती हैं। 

क्यों मनाया जाता है ये त्योहार?

ये उत्सव धरती मां की उर्वरता यानी फर्टिलिटी के लिए आभार जाहिर करने के लिए मनाया जाता है। जैसे पीरियड्स के दौरान महिलाओं को शारीरिक आराम की जरूरत होती है, वैसे ही माना जाता है कि धरती मां को भी इस समय आराम चाहिए। इसलिए चार दिनों तक खेती, जुताई या पेड़ काटने जैसे काम पूरी तरह रोक दिए जाते हैं। 

ये त्योहार महिलाओं को समर्पित है। इस त्योहार के दौरान उन्हें भी रोजमर्रा के कामों से तीन दिनों के लिए आराम दिया जाता है और वे केवल आराम करती हैं और खुशियां मनाती हैं। 

कैसे मनाया जाता है रज पर्व?

इस त्योहार के पहले दिन को पहिली रज कहा जाता है। इस दिन से त्योहार शुरू होता है और बरसात के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन लड़कियों के हाथों में मेहंदी, पैरों में आलता और नए कपड़े पहनाए जाते हैं। दूसरा दिन सबसे खास होता है, जिसे रज संक्रांति कहा जाता है। ये उत्सव का दिन है और इस दिन किसी भी तरह का काम करना मना होता है। इस दिन महिलाएं झूला झूलती हैं, खेल खेलती हैं और साथ मिलकर उत्सव मनाती हैं। 

इस त्योहार का तीसरा दिन बासी रज कहलाता है, जो धरती मां के रजस्वला होने का आखिरी दिन माना जाता है। इसके बाद चौथे दिन यानी वसुमती स्नाने के दिन सिलबट्टे को धरती मां का प्रतीक मानकर हल्दी और चंदन से नहालाया जाता है और फूलों और सिंदूर से सजाया जाता है।