बुल्ले शाह की मशहूर कविता से बना 53 साल पुराना गाना, ऋषि कपूर-डिंपल कपाड़िया की डेब्यू फिल्म का था हिस्सा
बॉबी फिल्म का गाना मैं नहीं बोलना असल में बुल्ले शाह की एक कविता से प्रेरित होकर बना है।
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बॉबी फिल्म का ये गाना बना है 18वीं सदी की कविता से (Picture Courtesy: Facebook)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। साल 1973 में आई फिल्म बॉबी का एक गाना है मैं नहीं बोलना…। इस गाने के बोल बहुत खूबसूरत हैं और लोगों को आज भी ये गाना खूब पसंद आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं इस गाने की शुरुआत बाबा बुल्ले शाह की एक कविता से बनी है?
जी हां, इस गाने के शुरुआत के बोल बुल्ले शाह की लिखी एक कविता से लिए गए हैं। आइए जानें ये कौन-सी कविता है और इसका मतलब क्या है।
बुल्ले शाह की कविता
बाबा बुल्ले शाह की लिखी ये पंक्तियां ‘मंदिर ढा दे, मस्जिद ढा दे, ढा दे जो कुछ ढहंदा; पर किसी दा दिल ना ढावीं, रब दिलां विच रहंदा’ हैं। बुल्ले शाह ने ये पंक्तियां 18वीं सदी में लिखी थी, लेकिन आज भी ये लाइनें उतना ही महत्व रखती हैं।
इन पंक्तियों के जरिए बुल्ले शाह इंसानियत और प्रेम का संदेश का दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि ईश्वर किसी ईंट-पत्थर से बनी इमारत यानी मंदिर या मस्जिद में नहीं रहता। वो तो इंसानों के दिलों में बसता है। इसलिए चाहे मंदिर तोड़ो या मस्दिद तोड़ो, लेकिन कभी किसी का दिल नहीं तोड़ना चाहिए, क्योंकि वो ईश्वर का घर है। भगवान दिलों में रहते हैं।
बुल्ले शाह ने दुनिया की बनावट और धार्मिक आडंबरों को नकारते हुए ये पंक्तियां लिखी थीं। वो मानते थे कि अगर दिल में नफरत है या जहर है, तो हजारों मंदिर या मस्जिद चले जाओ, ईश्वर नहीं मिलेगा। लेकिन अगर दिलों में प्यार है, मोहब्बत है, तो ईश्वर तुम्हें तुम्हारे अंदर ही मिलेंगे और जिस इंसान के दिल में प्यार है, उसका दिल तोड़ने से भगवान को चोट पहुंचती है। इसलिए ऐसा कभी नहीं करना चाहिए।
फिल्म बॉबी में बुल्ले शाह की कविता
1973 में ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया पर बनाई गई फिल्म बॉबी का गाना मैं नहीं बोलना बुल्ले शाह की इन्हीं पंक्तियों से बनाई गई है। इस गाने की शुरुआती लाइन है-
बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो
बुल्ले शाह वे कहते
बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो
बुल्ले शाह वे कहते
पर प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो
इस दिल में दिलबर रहता
फिल्म की कहानी, जिसमें अलग-अलग धर्म के होने के कारण बॉबी और राजा को परिवार वालों की नाराजगी और मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। बुल्ले शाह की इन पंक्तियों को जरिए नफरत और समाज की बंदिशों को तोड़ने के लिए कहा गया है।
