दिहाड़ी न कटे, इसलिए हजारों महिलाओं ने कटवा दिया यूटेरस; रोंगटे खड़े कर देगा गन्ने के खेतों का काला सच
महाराष्ट्र के बीड जिले में हजारों महिलाएं दिहाड़ी बचाने के लिए अपना गर्भाशय निकलवा चुकी हैं।

आजीविका के लिए गर्भाशयन निकलवा रही महिलाएं (AI Generated Image)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सोचिए अपना रोजगार बचाने के लिए आपको अपने शरीर का कोई हिस्सा काटना पड़ जाए? सुनकर ही तकलीफ हो रही है, नहीं? लेकिन महाराष्ट्र के बीड जिले की कई महिलाओं के जीवन की ये सच्चाई है। इस जिले की महिलाएं पिछले कुछ सालों से इसी वजह से चर्चा में हैं।
दरअसल, महाराष्ट्र बीड जिले के छोटे गांवों से ये महिलाएं गन्ने के खेतों में काम करने के लिए दूसरी जगहों पर जाती हैं। इसी रोजगार को बचाए रखने के लिए इस जिले की हजारों महिलाओं ने बिना किसी जरूरत के हिस्टेरेक्टॉमी करवाया, यानी सर्जरी के जरिए अपना यूटेरस निकलवा दिया। गरीबी, शोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे कारणों ने महिलाओं को इस फैसले की ओर धकेला। आइए जानें इस बारे में।
पीरियड्स और दिहाड़ी का नुकसान
बीड जिले के आस-पास के क्षेत्रों से हर साल लाखों पुरुष और महिलाएं पलायन करके पश्चिम महाराष्ट्र के चीनी कारखानों और गन्ने के खेतों में कटाई के लिए जाते हैं। ये मजदूर अक्सर जोड़ियों में काम करते हैं, यानी पति-पत्नी दोनों साथ मिलकर मजदूरी करते हैं।
हालांकि, इसके साथ एक शर्त होती है कि अगर दोनों में से किसी ने भी एक दिन छुट्टी ली, तो दोनों की दिहाड़ी काट ली जाएगी। इसलिए अगर कोई महिला पीरियड्स के दौरान पेट दर्द या ज्यादा ब्लीडिंग की वजह से एक दिन भी काम से छुट्टी ले ले, तो उसके साथ-साथ उसके पति की भी दिहाड़ी काट ली जाती है।
ये लोग खेतों के पास ही टेंट या झोपड़ी बनाकर रहते हैं। यहां न तो साफ पानी की सुविधा होती है और न ही टॉयलेट की। इसलिए पीरियड्स के दौरान महिलाओं को ज्यादा परेशानी होती है और गंदे कपड़े के इस्तेमाल से इन्फेक्शन जैसी समस्याएं होने लगती हैं।
डॉक्टर्स करते हैं शोषण
जब ये महिलाएं इलाज के लिए किसी प्राइवेट या झोलाझाप डॉक्टर से पास जाती हैं, तो उनकी मजबूरी का फायदा उठाया जाता है। पैसे कमाने के लालच में छोटे-मोटे इन्फेक्शन या सामान्य हार्मोनल समस्या के लिए भी उन्हें डराया जाता है और यूटेरस यानी गर्भाशय निकलवाने के लिए कहा जाता।
कम उम्र में शादी हो जाने के कारण 25 साल की उम्र तक ही इन महिलाओं के 2-3 बच्चे हो चुके होते हैं। इसलिए ये महिलाएं मान भी लेती हैं कि उन्हें अब यूटेरस की कोई जरूरत नहीं है। ठेकेदार के जुर्माने से बचने और पीरियड्स के कारण होने वाली तकलीफ से छुटकारा पाने के लिए जानकारी के अभाव में ये महिलाएं कर्ज तक लेकर यूटेरस निकलवाने की सर्जरी करवा लेती हैं।
सर्जरी के बाद मुश्किल जीवन
बिना किसी जरूरत के यूटेरस निकलवाने से शरीर सर्जिकल मेनोपॉज में चला जाता है। इसके कारण उन्हें कई तकलीफों का सामना करना पड़ता है। कमर में दर्द, पेट के निचले हिस्से में लगातार दर्द, चक्कर आना, चलने में तकलीफ जैसी सम्सयाएं उन्हें घेरने लगती हैं। इन वजहों से गन्ने के खेतों में होने वाला भारी काम वो महिलाएं नहीं कर पाती और उनकी स्थिति बदतर होती चली जाती है।
गरीबी, ठेकेदार के जुल्म, डॉक्टरों के शोषण और जानकारी की कमी के कारण बीड जिले की हजारों महिलाओं ने अपने गर्भाशय निकलवा दिए। सिर्फ इस उम्मीद में कि इससे उनका जीवन बेहतर होगा, लेकिन इस फैसले ने उनके जीवन को और भी मुश्किल बना दिया।
