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‘पलंग सागवान के’ नहीं, ये है बिहार का असली भोजपुरी लोकगीत; इस गाने में झलकती है गांव की ठेठ संस्कृति

Published: Sat, 24 Oct 2026 01:54 PM (IST)

बिहार के लोकगीतों में वहां की असली संस्कृति और ठेठ अंदाज देखने को मिलता है।

इस भोजपुरी लोकगीत में बयां होती है एक महिला की मजबूरी (AI Generated Image)

इस भोजपुरी लोकगीत में बयां होती है एक महिला की मजबूरी (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार की असली संस्कृति वहां के फिल्मी भोजपुरी गानों में नहीं, बल्कि लोकगीतों में बसती है। यहां के लोकगीत मनोरंजन से कहीं बढ़कर हैं। इनमें गांव के जीवन, रिश्ते, प्रेम और समाज से जुड़े मुद्दों की बात होती है। ऐसा ही एक भोजपुरी लोकगीत है निमिया पतईया झरी जाय हो अंगनवा, कईसे बहारु जी। 

ये लोकगीत बिहार के गांव-देहात के इलाकों में काफी मशहूर है और कई भोजपुरी गायक भी इसे अपनी आवाज दे चुके हैं। आइए जानें इस लोकगीत में क्या कहा गया है। 

क्या कहता है ये लोकगीत?

ये लोकगीत एक महिला की दृष्टि से गाया गया है, जिसमें उसके घर की जिम्मेदारी और ससुराल के रिश्तों को बहुत ही खूबसूरत ढंग से बयां किया गया है। इस गीत की शुरुआत नीम के पेड़ से गिर रही पत्तियों और झाड़ू से उन्हें समेटने की मजबूरी से शुरू होती है। महिला कहती है निमिया पतईया झरी जाय हो अंगनवा, कईसे बहारु जी। यानी नीम की पत्तियां झड़कर पूरे आंगन में फैल गई हैं, लेकिन वो आंगन की सफाई कैसे करे। 

वो आंगन में झाड़ू क्यों नहीं लगा पा रही है, इसका कारण महिला गीत में आगे बताती है। इस गीत में महिला की परिवार से जुड़ी बंदिशों को दिखाया गया है। इस गीत में एक बहू का अपने ससुराल में मर्यादा और जिम्मेदारियों को दिखाने की कोशिश की गई है।

परिवार के रिश्तों की मर्यादा

बिहार में गांव-देहात में महिलाओं को पारिवारिक रिश्तों को बहुत संभालकर निभाना पड़ता है और इसे ही इस गीत में आगे बताया गया है। महिला कहती है ओही रे अंगनवा ससुर जी के डेरा, पगरी देखत जिया जाय रे अंगनवा कईसे बहारु जी। यानी उसी आंगन में उसके ससुर रहते हैं और इसी वजह से वो आंगन में झाड़ू नहीं लगा पा रही है। 

भारतीय संस्कृति में ससुर को पिता के समान माना जाता है, लेकिन एक मर्यादा भी होती है। उनकी उपस्थिति से ही बहू के मन में झिझक का भाव आ जाता है। वहीं इस गीत में बताया गया है। 

भसूर जी का डेरा और बहू की दूरी

आगे गीत में महिला कहती है ओही रे अंगनवा भसूर जी के डेरा, तनीको छूवत जिया जाय रे अंगनवा, कईसे बाहरु जी। यानी उसी आंगन में भसूर जी यानी पति के बड़े भाई भी रहते हैं और बिहार में भसूर को छूना मर्यादा के खिलाफ माना जाता है। इसलिए गलती से उसका हाथ उन्हें न लग जाए, इसलिए वो आंगन में सफाई करने से बच रही है। 

पति का डेरा और अपनापन 

ससुराल के इन तमाम रिश्तों के बीच जब पिया जी यानी पति की बात आती है, तब महिला का एक अलग भाव देखने को मिलता है। महिला कहती है कि ओही रे अंगनवा पिया जी के डेरा, खियां लड़त जिया जाय रे अंगनवा कईसे बहारु जी। 

जहां बाकी रिश्तों में संकोच औ झिझक का भाव था, वहीं पति के साथ आंखें चार होती हैं। ये नजरों का मिलना ससुराल में महिला को अपनेपन का एहसास करवाता है और वो सारे संकोच भूल जाती है।