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सिर्फ घूमर नहीं, राजस्थान का 'तेरह ताली' नृत्य भी है जबरदस्त! शरीर पर 13 मंजीरे बांधकर डांस करती हैं महिलाएं

Published: Wed, 02 Sep 2026 12:03 PM (IST)

राजस्थान के लोक नृत्यों में तेरह ताली नृत्य भी अपनी खास जगह है। ये नृत्य कामड़ समुदाय से जुड़ा है।

राजस्थान का तेरह ताली नृत्य (AI Generated Image)

राजस्थान का तेरह ताली नृत्य (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप समझते हैं कि राजस्थान का डांस सिर्फ घूमर और कालबेलिया तक ही सीमित है? अगर हां, तो आपको तेरह ताली के बारे में नहीं पता होगा।

ये राजस्थान का बहुत खास लोक नृत्य है। ये नृत्य अपनी खास शैली, लय और मुश्किल बैलेंसिंग तकनीक के लिए जाना जाता है। आइए जानें राजस्थान का तेरह ताली नृत्य कैसे किया जाता है और इसका इतिहास क्या है। 

कैसे हुई थी तेरह ताली की शुरुआत? 

राजस्थान के इस लोक नृत्य की शुरुआत कामड़ जाति से जुड़ी मानी जाती है। ये नृत्य सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं किया जाता था। इसका धार्मिक अनुष्ठानों से भी नाता जुड़ा है। कामड़ जाति बाबा रामदेव जी को पूजते हैं और उन्हीं के लिए अपनी भक्ति जाहिर करने के लिए तेरह ताली नृत्य की शुरुआत की गई थी। इस नृत्य के नाम से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इसमें तेरह ताली या तेरह ताल का बहुत महत्व होता है। 

कैसे किया जाता है तेरह ताली नृत्य?

इस नृत्य में महिलाएं अपने शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर 13 मंजीरे बांधती हैं। पैरों, हाथों और कोहनी पर मंजीरे बांधे जाते हैं और एक-एक मंजीरा हाथ में पकड़ा जाता है। हाथों में पकड़े गए मंजीरे से शरीर के दूसरे हिस्सों में बंधे मंजीरों पर तेज गति से बजाया जाता है। मंजीरों की थाप से बहुत सुंदर संगीत पैदा होता है। 13 मंजीरों के इस्तेमाल के कारण ही इसका नाम तेरह ताली पड़ा।  

इस नृत्य में पुरुष कलाकार तंबूरा और ढोलक बजाकर बाबा रामदेव जी के भजन गाते हैं और महिला नर्तकियां जमीन पर बैठकर हाथों की मुद्राओं के साथ ये नृत्य करती हैं। ये नृत्य सिर्फ महिलाएं करती हैं। पुरुष भजन गाने और वाद्य यंत्र बजाने के काम संभालते हैं। 

क्यों खास है तेरह ताली नृत्य?

इस नृत्य में संतुलन की अहम भूमिका होती है। नृतकियां अपने दांतों में तलवार या कृपाण दबाती हैं और सिर पर पानी का मटका रखकर बैलेंस करती हैं। इस नृत्य को पूरी तरह जमीन पर बैठकर किया जाता है, लेकिन बहुत ही फुर्ति के साथ। 

इस नृत्य के लिए महिलाएं चमकीले घाघरा-चोली और ओढ़नी पहनती हैं, जो राजस्थानी की संस्कृति को दिखाते हैं। इसके साथ वे पारंपरिक गहने पहनती हैं, जो नृत्य करते समय काफी खूबसूरत लगते हैं।