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रेगिस्तान के चरवाहों से निकली थी 'केसरिया बालम' की धुन, जानिए राजस्थान की मशहूर 'मांड शैली' का दिलचस्प इतिहास

Published: Tue, 01 Sep 2026 12:36 PM (GMT+05:30)

राजस्थान के लोक संगीत में मांड शैली के गीतों का खास महत्व है। इसी शैली में राजस्थान का मशहूर लोकगीत केसरिया बालम भी गाया गया है।

राजस्थान के मांड शैली की कहानी (AI Generated Image)

राजस्थान के मांड शैली की कहानी (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान की धरती से संगीत की कई ऐसी शैलियां निकली हैं, जिन्होंने सिर्फ लोकगीतों में ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड के भी कई हिट गाने दिए हैं। इन्हीं में मांड शैली भी शामिल है। ये वही शैली है, जिसमें राजस्थान का मशहूर लोकगीत केसरिया बालम गाया गया है। 

मांड शैली के गीतों की शुरुआत की कहानी भी काफी दिलचस्प है। आइए जानें क्या है मांड शैली का इतिहास, इसकी खासियत क्या है और इस शैली के कुछ मशहूर लोकगीत। 

मांड शैली की शुरुआत कैसे हुई?

मांड शैली की शुरुआत राजस्थान के जैसलमेर और बीकानेर क्षेत्र से मानी जाती है। मध्यकाल में जैसलमेर और उसके आस-पास के इलाके को मांड प्रदेश कहा जाता था। इसी कारण से यहां शुरू हुई इस संगीत शैली को मांड कहा गया और इसी नाम से ये मशहूर हुई। 

शुरुआत में गानों की ये शैली मरुस्थल के चरवाहों और लोक कलाकारों तक सीमित थी, जिसे वे रेगिस्तान में खुले आसमान के नीचे गाते थे। समय के साथ यह राजपूती राजाओं के महलों तक पहुंचा, जिन्होंने मांड गायकों को संरक्षण दिया। रजवाड़ों में इन संगीतकारों को मनोरंजन के लिए रखा जाने लगा और धीरे-धीरे मांड शैली में कुछ बदलाव भी आए। 

मांड शैली की खासियत क्या है?

मांड शैली में राग बिलावल और खमाज की झलक मिलती है। इसमें गायक अपने सुरों में उतार-चढ़ाव का खास ध्यान रखते हैं, जो इस शैली को बेहद खास बनाते हैं और इन्हीं उतार-चढ़ाव के कारण मांड शैली के गीत बहुत भावुक करने वाले होते हैं। 

इनमें विरह, प्रेम, शूरवीरता और अतिथि सत्कार से जुड़े गीत गाए जाते हैं। मांड के सुरों को कामायचा, सारंगी, खड़ताल और ढोलक जैसे वाद्य यंत्रों की धुन और मधुर बना देती है।  

मांड शैली के मशहूर गाने

मांड शैली की सबसे मशहूर गाना केसरिया बालम है, जो आज पूरे राजस्थान की शान बन चुका है। इस गाने में ढोला-मारू की कहानी कही जाती है और मांड शैली के सुरों से ये कहानी और भी भावुक करने वाली लगती है। म्हारी घूमर छै नखराली भले ही एक घूमर का लोकगीत है, लेकिन इसे भी कई कलाकारों ने मांड शैली में गाया है, जिसमें इसकी ताल थोड़ी धीमी हो जाती है, जो मांड शैली की पहचान है। 

मांड शैली के मशहूर गायक

मांड शैली के गायकों में अल्लाह जिल्लाई बाई का नाम सबसे ऊपर आता है। इन्हें राजस्थान की मरू कोकिला भी कहा जाता है। इन्हें साल 1982 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, बतुल बेगम, गवरी देवी और मांगी बाई का भी मांड शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में अहम योगदान रहा है। 


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