‘नौटंकी’ और ‘तमाशा’ में जमीन-आसमान का अंतर! एक शुरू हुआ पंजाबी प्रेम कहानी से, तो दूसरा सैनिकों के मनोरंजन से
नौटंकी और तमाशा, दोनों भारतीय लोक नाट्य कलाएँ हैं, जिनमें सांस्कृतिक और शैलीगत अंतर हैं।

नौटंकी उत्तर प्रदेश और बिहार, तो तमाशा महाराष्ट्र का (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हमारी आम बोलचाल की भाषा में ऐसे कई शब्द शामिल हैं, जिनका अपना समृद्ध इतिहास है। आपने लोगों को कहते सुना होगा कि ‘तमाशा मत करो’ या ‘ये क्या नौटंकी है’! पर कभी सोचा है कि इन दो शब्दों का अपना एक अलग इतिहास है? क्या आप जानते हैं कि एक जैसे दिखने वाले नौटंकी और तमाशा शब्द का संबंध कला से है और इन दोनों का मतलब भी अलग है? आइए आपको इन दोनों से जुड़ी दिलचस्प बातें बताते हैं।
नौटंकी क्या है?
हम जिसे बातों ही बातों में नौटंकी कह दिया करते हैं, यह एक रंगमंच यानी फोक थिएटर है। इसका संबंध उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य से है। नौटंकी की खासियत यह है कि इसे खुले मैदान में आयोजित किया जाता है। इसमें नाटक के साथ ही संगीत, नृत्य और संवाद का खास मेल होता है। यह मेलोड्रामा इतना जबरदस्त होता है कि कोई भी अगर इसे शाम को देखना शुरू करे, तो सुबह कब होगी पता ही नहीं चलेगा।
पंजाबी प्रेम कथा से हुई थी इसकी शुरुआत
यह बात बहुत अटपटी जरूर लग सकती है, लेकिन यूपी और बिहार में देखी जाने वाल नौटंकी पंजाबी प्रेम कथा के बाद लोगों की नजर में आई। इसकी कहानी कुछ ऐसी है कि पहले 'स्वांग' नामक लोक कला अखाड़ों में खूब पसंद किया जाता था। फिर 1890 के दशक में इंदरमन के हाथरस अखाड़े ने नत्थाराम गौड़ नाम जैसे कई कलाकारों को ट्रेनिंग देनी शुरू की।
इन कलाकारों की मंडली ने 'शहजादी' या 'रानी नौटंकी' नाम की पंजाबी प्रेम कथा पर आधारित ऐसा नाटक निकाला कि इसके खूब चर्चे हुए। कहते हैं उसके बाद से ही अखाड़ों में दिखाए जाने वाले नाटकों को यहां नौटंकी कहा जाने लगा।
तमाशा क्या है?
हम लोगों से तमाशा शब्द भी बहुत सुनते हैं, जो कि महाराष्ट्र का रंगमंच है। इस फोक थिएटर की खूबी यह है कि इसमें मराठी लोकसंस्कृति की झलक देखने को मिलती है। इस लोक नाटक में लावणी जैसे नृत्य, दोहरे मतलब वाले संवाद और तीखे व्यंग्य बड़ी ही खूबसूरती से पेश किये जाते हैं।
सैनिकों के मनोरंजन के लिए शुरू हुआ था तमाशा
तमाशा शब्द तो अरबी भाषा से निकला है, लेकिन 16वीं शताब्दी में युद्ध के मैदानों में सैनिकों का मनोरंजन करने के लिए यह नाटक किया जाता था। गोंधल, दशावतार और वाघ्या मुरली जैसी लोक परंपराएं इस रंगमंच का हिस्सा हैं। कहा जाता है कि तमाशा कला को पेशवाओं के दौर में सरंक्षण मिला और इसी दौरान यह कला खूब फली-फूली।
दोनों लोकनाटकों में क्या फर्क है?
तमाशा और नौटंकी दोनों रंगमंच में सबसे बड़ा फर्क संस्कृति का है, जिसकी झलक वेशभूषा, भाषा और नृत्य में ददेखी जा सकती है। एक यूपी और बिहार से निकली कला है, तो दूसरी महाराष्ट्र से। वहीं, दूसरा सबसे बड़ा अंतर इसकी विषय वस्तु है क्योंकि नौटंकी प्रेम कहानियों पर आधारित है, जबकि तमाशा कामुकता और डबल मीनिंग वाले डायलॉग्स पर।
फिर तीसरा अंतर इनकी शैलियों और प्रस्तुती किये जाने के तौर-तरीकों का भी है। नौटंकी की दो शैलियां हैं एक हाथरासी और दूसरी कानपुरी। वहीं, तमाशा की संगीत बारी और ढोलक बारी शैली है।
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