नवरात्र में सुनें ये पारंपरिक भोजपुरी देवी गीत, मां काली के शृंगार को बयां करता है बिहार का ये लोकगीत
बिहार में नवरात्र के दौरान कई खूबसूरत देवी गीत सुनने को मिलते हैं, जिनमें लाले रंग सेंदुरवा भी शामिल है।

नवरात्र में जरूर गाया जाता है ये देवी गीत (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। नवरात्र के त्योहार में बिहार के गांव-देहात में देवी गीतों की गूंज सुनाई देने लगती है। इन्हीं गीतों में लाले रंग सेंदुरवा, लाले रंग पुतरिया भी शामिल है। ये लोकगीत मां काली की आराधना के लिए गाया जाता है।
ये एक पारंपरिक भोजपुरी देवी गीत है, जिसके बोल और धुन, दोनों ही काफी खास हैं। इस गीत में मां काली और लाल रंग से उनके प्रेम को बहुत ही खूबसूरत तरीके से बयां किया गया है। आइए जानें इस देवी गीत में क्या कहा गया है।
मां काली का प्रिय लाल रंग
ये पारंपरिक देवी गीत मां के प्रिय लाल रंग के इर्द-गिर्द घूमता है। माना जाता है कि मां काली को लाल रंग बहुत प्रिय होता है। इसलिए उनकी चुंदरी, लाल गुड़हल की माला, लाल चूड़ी आदि का शृंगार किया जाता है। इस गीत में यही बताया गया है कि मां का शृंगार सिर से लेकर पैर तक लाल रंग का है।
मां का लाल शृंगार
इस गीत की शुरुआत होती है लाले रंग सेंदुरवा, लाले रंग पुतरिया हो की लाले रंगवा ना…। यानी मां के सिर पर लाल सिंदूर सजा है, उनकी आंखे भी लाल रंग की हैं और उनके शरीर पर सजी चुंदरी भी लाल रंग की है।
इसके आगे कहा जा रहा है लाले रंग मुखड़ा पर लाले रंग ओठवा हो की लाले रंगवा ना, मैया के सोभेला अंगुरिया हो की लाले रंगवा ना…। अब मैया के चेहरे की खूबसूरती को बयां करते हुए कहा जा रहा है कि उनके सुंदर मुखड़े, होंठों का रंग और उंगलियां भी लाल रंग की हैं, जो देखने में बहुत सुंदर लग रही हैं।
पूजा की सामग्री भी है लाल
गीत में आगे बताया गया है कि मां को प्रसन्न करने के लिए जो सामग्री चढ़ाई जा रही हैं, वो भी लाल रंग की हैं। लाले रंग फुलवा आ लाले नरियलवा हो की लाले रंगवा ना…। यानी इन चीजों में लल रंग के गुड़हल के फूल, लाल चुनरी और लाल नारियल शामिल है। देवी को प्रसन्न करने के लिए भक्त उन्हें लाल रंग की चीजें ही अर्पित कर रहे हैं।
भक्तों की श्रद्धा का वर्णन
इस गीत में सिर्फ मां काली ही नहीं, उनके भक्तों का भी वर्णन किया गया है। मां की पूजा करने के लिए महिलाएं और कन्याएं लाल डोली में चढ़कर आ रही हैं और उनकी चुनरी का रंग भी लाल है। ये भक्तों की मां के लिए श्रद्धा को बयां करता है। मां को लाल रंग पसंद है, इसलिए उनके भक्तों ने भी खुद लाल रंग में रंग लिया है।
मां का दरबार और काली का रूप
इस गीत के अंत में मां के दरबार की सुंदरता को बयां किया गया है। लाले रंग झंडा उड़े लाले चंदनियां हो की लाले रंगवा ना, बाढ़े देवी के दुवरिया हो की लाले रंगवा ना…। यानी मां के द्वार पर लाल रंग का झंडा लहरा रहा है और मां का द्वार भी लाल रंग का है।
इसके आगे कहा जाता है लाले रंग दंतवा आ सोभे मुंह की लाली हो की लाले रंगवा ना, चढ़े काली माई के नूरिया हो की लाले रंगवा ना…। यानी मां काली के मंदिर के लाल होंठ, दांतों की चमक और उनके तेज का बखान किया गया है।
