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राजपूत राजाओं के दरबार से शुरू गांव के चबूतरों तक कैसे पहुंची कठपुतली? राजस्थान के भाट समुदाय से जुड़ा है नाता

Published: Tue, 06 Oct 2026 12:20 PM (IST)

कठपुतली का इतिहास हजारों साल पुराना है और राजस्थान के भाट समुदाय के साथ जुड़ा हुआ है।

कैसे हुई कठपुतली की शुरुआत? (AI Generated Image)

कैसे हुई कठपुतली की शुरुआत? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लोक नाट्यों की बात करें, तो राजस्थान की कठपुतली का नाम लेना जरूरी हो जाता है। ये भारत की सबसे पुरानी कलाओं में से एक है और अपने खास तरीके के लिए जानी जाती है। कठपुतली दो शब्दों से मिलकर बना है। एक काठ और दूसरा पुतली। 

काठ का मतलब होता है लकड़ी और पुतली यानी गुड़िया। यानी लकड़ी से बनी गुड़िया, जिसमें कलाकार धागों और उंगलियों के जादू से जान फूंक देते हैं। राजस्थान की कठपुतली का इतिहास काफी दिलचस्प है और इसका तरीका भी काफी मजेदार होता है। आइए जानें कठपुतली की कहानी। 

क्या है कठपुतली का इतिहास?

कठपुतली का इतिहास हजारों साल पुराना माना जाता है और इसकी शुरुआत राजस्थान के भाट या नट समुदाय ने की थी। माना जाता है कि भाट समुदाय राजा-महाराजाओं के दरबारों में जाकर उनके पूर्वजों की वीरता की गाथाओं को कठपुतली के जरिए पेश करते थे। इसलिए राजाओं के दरबार में इन्हें काफी संरक्षण मिला। 

राजाओं के दौर के बाद इस समुदाय ने गांव-गांव घूमकर लोक कथाओं और पौराणिक कहानियों को कठपुतली के जरिए सुनाना किया, जो आम जनता के मनोरंजन का एक तरीका बना। भाट एक घुमंतू समुदाय है, जो एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं और जगह-जगह रुककर कठपुतली के जरिए कहानियां सुनाते। आज भी राजस्थान के कई हिस्सों में इस समुदाय ने अपनी कला को जिंदा रखा हुआ है। 

कठपुतली की खासियत क्या होती है?

राजस्थानी कठपुतली की अपनी खासियत होती है, जो उसकी पहचान मानी जाती है। ये कठपुतलियां लगभग 30 सेंटीमीटर लंबी होती है और लकड़ी के एक ही टुकड़े को तराश कर कठपुतली के हाथ और सिर बनाया जाता है। इसके लिए आमतौर पर आम की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। 

एक खासियत ये भी होती है कि इनके चेहरे पीले रंग से रंगे जाते हैं, आंखे बड़ी और बादामी आकार की बनाई जाती हैं। साथ ही, पुरुष कठपुतली के सिर पर पगड़ी या साफा पहनाया जाता है और मूंछें बनाई जाती हैं, ताकि उन्हें देखकर राजपूती शान का अनुभव हो। 

ज्यादातर कठपुतलियों के पैर नहीं बनाए जाते हैं, ताकि मूवमेंट में परेशानी न हो। इनके शरीर में रुई भरी जाती है और पैरों को छिपाने के लिए लंबे और घेरदार राजस्थानी कपड़े या लहंगे पहनाए जाते हैं। 

कैसे किया जाता है कठपुतली नाटक?

कठपुतली में सिर्फ गुड़िया को नचाया नहीं जाता, बल्कि संगीत और संवाद के साथ कहानियां पेश की जाती हैं। दो खाटों को खड़ा करके उन पर बांस बांध दिए जाते हैं और पीछे काला पर्दा लगाया जाता है और आगे तीन मेहराबों पर रंगीन पर्दा लगाया जाता है, जिसे तिबारा कहते हैं। ये पर्दे कठपुतली चलाने वाले कलाकारों को छिपाने के लिए होते हैं। 

कठपुतली के हाथ, गर्दन और कंधों पर लंबे धागे बंधे होते हैं, जो कलाकारों की उंगलियों से लिपटे होते हैं। उंगलियों की मूवमेंट्स से कलाकार इन कठपुतलियों को जिंदा करते हैं। शो के दौरान महिलाएं गीत और ढोलक के जरिए कहानी सुनाती हैं। कठपुतलीबाज एक खास आवाज निकालते हैं, जिसे संगीत और गीतों के जरिए बयां किया जाता है।