बिना स्टेज के महफिल लूट लेते हैं ये कलाकार, कभी राजाओं के लिए करते थे गुप्तचरी; दिलचस्प है ‘बहरूपिया’ की कहानी
बहरूपिया लोक नाट्य की एक शैली है, जिसमें कलाकार अलग-अलग भेष लेकर नाटक पेश करता है।

न कोई रंगमंच, न कोई स्क्रिप्ट... फिर भी जीत लेते हैं सबका दिल (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं कि भारत की लोक कलाओं में बहरूपिया भी शामिल है। ये लोक नाट्य की एक शैली है, जो बिना किसी रंगमंच के भी दर्शकों का दिल जीत लेता है। बहरूपिया दो शब्दों से मिलकर बना है। बहु यानी कई और रूपिया यानी वेश धारण करने वाला। इसमें कलाकार अलग-अलग रूप लेते हैं और नाटक पेश करते हैं।
भारत के गांव-देहात के इलाकों में ये काफी मशहूर है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी? आइए जानें बहरूपिया का इतिहास क्या है और इसकी खासियत क्या है।
क्या होता है बहरूपिया?
बहरूपिया में पौराणिक, ऐतिहासिक, सामाजिक पात्रों या जानवरों का भेष लेकर कलाकार लोगों के बीच जाते हैं और जिस पात्र का वेश उसने धरा है, उसकी बोल-चाल, चाल-ढाल और हाव-भाव को पूरी तरह आत्मा में बसाकर उसी की तरह नाटक करते हैं।
अगर किसी ने किसी जानवर का भेष धरा है, तो वो उसी की तरह चलेगा, आवाज निकालेगा और व्यवहार भी बिल्कुल उसी जानवर की तरह करेगा। ये नाटक पेश करने वाले कलाकारों को भी बहरूपिया कहा जाता है।
बहरूपिया का इतिहास क्या है?
बहरूपिया का इतिहास सदियों पुराना माना जाता है। माना जाता है कि मध्यकाल के दौरान राजा-महाराजा बहरूपिया कलाकारों को गुप्तचर बनाकर दूसरे राज्यों में भेजते थे, जहां वे खूफिया जानकारी निकालने में अपनी कला का इस्तेमाल करते थे।
समय के साथ ये मनोरंजन का जरिया बना और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में खूब मशहूर हुआ और वहां की लोक संस्कृति का हिस्सा बन गया। बहरूपिया कलाकार अलग-अलग रूप लेते और दर्शकों का मनोरंजन करने के लिए नाटक पेश करते।
कैसे किया जाता है बहरूपिया नाटक?
बहरूपिया नाटक काफी मुश्किल होता है, क्योंकि इसमें कलाकार को अलग-अलग भेष बदलने होते हैं और उन्हीं पात्रों की तरह व्यवहार भी करना होता है। भेष बदलने के लिए कलाकार चेहरे पर अलग-अलग रंगों और मेकअप का इस्तेमाल करते हैं और अपने पात्र के हिसाब से कपड़े और विग पहनते हैं।
नाटक की दूसरी शैलियों की तरह बहरूपिया नाटक के लिए किसी स्टेज या रंगमंच की जरूरत नहीं होती। कलाकार सार्वजनिक जगहों पर ही अभिनय करते हैं और अपने दर्शकों को इकट्ठा करते हैं। बहरूपिया नाटक में कलाकार कुछ देर के लिए दर्शकों को ये यकीन दिला देता है कि जो पात्र वो निभा रहा है, वो सचमुच भी वही है। जैसे सिपाही का पात्र निभाने वाला कलाकार अचानक आकर चालान काटने लगे या चोरों को पकड़ने के लिए पूछताछ शुरू कर दे।
इस नाटक के जरिए सिर्फ ऐतिहासिक या पौराणिक कथाएं नहीं दिखाई जाती, बल्कि समाज की कुप्रथाओं को भी पेश किया जाता है। बहरूपिया हंसी और व्यंग्य के जरिए समाज की बुराइयों को दर्शकों के सामने पेश करता है। बहरूपिया नाटक देखने के बाद लोग उन कलाकारों को अनाज, कपड़े या पैसे देते हैं, जिससे उनकी गुजर-बसर होती है।
