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‘रसिया’ गाए बिना अधूरी मानी जाती है ब्रज की होली, बहुत दिलचस्प है प्रेम और मस्ती से भरे इस लोकगीत की कहानी

Published: Sat, 19 Sep 2026 03:40 PM (IST)

रसिया लोकगीत उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र की संस्कृति का अहम हिस्सा हैं। इनमें प्रेम और भक्ति का मेल मिलता है।

ब्रज में होली पर जरूर गाते हैं रसिया (AI Generated Image)

ब्रज में होली पर जरूर गाते हैं रसिया (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के लोक संगीत की बात रसिया के बिना अधूरी है। ब्रज क्षेत्र की आत्मा कहा जाने वाला रसिया एक ऐसा लोकगीत है, जिसमें प्रेम, मस्ती और भक्ति, तीनों मिले हुए हैं। 

ये लोकगीत अपनी खास धुन और बोलों के कारण सभी को खूब पसंद आता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन गीतों की शुरुआत कैसे हुई? आइए जानें रसिया लोकगीत का इतिहास क्या है और ये क्यों इतने खास हैं।  

क्या है रसिया का इतिहास?

रसिया शब्द रस से बना है, जिसका मतलब आनंद या प्रेम से जुड़ा है। ब्रज क्षेत्र में भगवान कृष्ण को रसिया कहा जाता है, क्योंकि वे प्रेम और आनंद का स्वरूप माने जाते हैं। मध्यकाल में जब भक्ति आंदोलन अपने चरम पर था, तब सूरदास जैसे संत-कवियों की रचनाओं ने रसिया लोकगीतों को जन्म दिया। 19वीं सदी के दौरान नौटंकी ने रसिया गीतों को नया मंच दिया और घर-घर में मशहूर कर दिया। 

समय के साथ ये ब्रज क्षेत्र की संस्कृति का हिस्सा बन गए और आम लोगों ने होली के समय चौपालों पर इन गीतों को गाना शुरू कर दिया।  

रसिया क्यों गाया जाता है?

इन गीतों में मुख्य रूप से राधा-कृष्ण का जिक्र सुनने को मिलता है। उनके प्रेम, नोकझोंक, रासलीला और माखन चोरी की लीलाओं का बहुत खूबसूरत वर्णन इन गीतों में सुनाई देता है। ब्रज की होली रसिया लोकगीतों के बिना अधूरी मानी जाती है। फाल्गुन महीने में ब्रजवासी ढोल और बंब की थाप पर रसिया जरूर गाते हैं और पूरा माहौल उत्साह और उमंग से भर जाता है।

हालांकि, रसिया सिर्फ राधा-कृष्ण तक सीमित नहीं हैं। इनमें देवर-भाभी के रिश्ते, पति-पत्नी के प्रेम, सास-बहू के संबंध और बदले मौसमों का जिक्र भी मिलता है। 

क्या है रसिया लोकगीतों की खासियत?

रसिया को खास इसकी भाषा बनाती है। इसे ब्रजभाषा में गाया जाता है, जो इन गीतों को मिठास से भर देते हैं। साथ ही, रसिया लोकगीतों की धुन काफी लयबद्ध होती है और इसे गाते समय बंब, ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम का इस्तेमाल किया जाता है। 

इन लोकगीतों में बंब, जो बड़े नगाड़े जैसे होते हैं, की गूंज पूरे माहौल को ऊर्जा से भर देती है। रसिया की एक खास शैली है दंगल, जिसमें दो गायन मंडलियां आमने-सामने बैठती हैं और सवाल-जवाब के रूप में रसिया गाया जाता है। शृंगार, भक्ति और हास्य रस से भरे ये गीत उत्तर प्रदेश की संस्कृति का अहम हिस्सा हैं।