पाकिस्तान के पंजाब से भारत की रील्स तक पहुंचा ये लोकगीत, ‘ना कजरे की धार’ से मिलती है इसकी धुन
पाकिस्तान का एक प्राचीन सराइकी लोकगीत 'छलरे छलरे वाल' भारत में सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है।

पाकिस्तान के पंजाब का सराइकी लोकगीत ‘छलरे छलरे वाल’ भारत में वायरल (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। लोग सरहदें पार नहीं कर पाते, पर संगीत सीमाओं को बड़ी ही आसानी से पार कर हमारे दिलों में एक खास जगह बना लेता है। इन दिनों सोशल मीडिया पर ऐसा ही एक लोकगीत नए वर्जन में खूब वायरल हो रहा है। खास बात यह कि इस लोकगीत का नाता भारत से नहीं, बल्कि पड़ोसी पाकिस्तान से है।
पाकिस्तान के पंजाब का सराइकी लोकगीत
पंजाब का वो दक्षिण और दक्षिणी पश्चिमी हिस्सा जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान में मिल गया, वहीं की ही सराइकी लोकसंस्कृति से ‘छलरे छलरे वाल’ और इसके जैसे कई गीत निकले हैं। जिसमें एक प्रेमिका अपने प्रेमी को देखकर उसकी खूबसूरती बयां कर रही है।
बता दें कि इससे पहले सोशल मीडिया पर काफी पुराना गाना ‘सम्मी मेरी वार’ खूब सुर्खियों में था, और अब लोग इस सराइकी लोकगीत को मॉडर्न ट्यून के साथ सुनना पसंद कर रहे हैं।
क्या है ‘छलरे छलरे वाल’ गाने का मतलब?
इस गाने की शुरुआत ‘तू सांवल फुल कस्तूरी, तेरी थी गई बहु मशहूरी’ से होती है। यहां प्रेमिका अपने प्रेमी के सांवले रंग की तुलना कस्तूरी के फूल से कर रही है। जिसके बाद वो आगे कहती है कि:
‘चलरे चलरे वाल
मोढे रखदा ए काली शॉल
हाथ छे नए रहता आ रुमाल
तेरीयां रीसां कौन करे’
यहां सराइकी भाषा में ‘छलरे छलरे वाल’ कहा गया है, जिसका मतलब है प्रेमी के घुंघराले लहराते बाल। इसके बाद प्रेमिका उसके कंधों पर रखे शॉल और हाथ के रुमाल को देखकर तारीफों के पुल बांध देती है।
हिंदी की पुरानी धुन पर बना है यह गाना?
अगर आप इस गाने को ध्यान से सुनें तो इसकी धुन साल 1994 की बॉलीवुड फिल्म ‘मोहरा’ के आइकॉनिक गाने ‘ना कजरे की धार’ से हूबहू मिलती-जुलती है। ऐसे में इस लोकगीत का भारतीय कनेक्शन भी लोगों को इससे काफी जोड़ रहा है। वहीं, ‘छलरे छलरे वाल’ को मूल रूप से पाकिस्तान के मशहूर लोक गायक मुहम्मद हुसैन बंदियालवी ने गाया था।
पंजाबी सिंगर सुनंदा शर्मा ने किया मशहूर
भारत में इस गाने को लोगों तक पहुंचाने का श्रेय पंजाब की सिंगर सुनंदा शर्मा को जाता है। उन्होंने ही बीते महीने अपनी आवाज में इसे गाकर लोगों को सदियों पुराने इस लोकगीत से परिचित करवाया।
हड़पा सभ्यता के समय की है सराइकी लोकसंस्कृति
अब बात करें सराइकी लोकसंस्कृति की, तो इसकी जड़ें पाकिस्तान के दक्षिणी पंजाब के मुल्तान, बहावलपुर, डेरा, गाजीखान और चोलिस्तान रेगिस्तान से जुड़ी हुई हैं। कहते हैं कि सराइकी भाषा भारतीय आर्या परिवार की भाषा है, जो आज पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में आज भी बोली जाती है।
