रातभर सोने के बाद भी क्यों नहीं मिलती ताजगी? नींद और डिप्रेशन का कनेक्शन समझें
बार-बार सोने का मन करना, नींद पूरी नहीं होने और सुबह उठने के बाद थकान लगने जैसे लक्षण आपकी मानसिक ...और पढ़ें

नींद और अवसाद का गहरा संबंध: जानें क्यों सुबह भी रहती है थकान
HighLights
सुबह थकान डिप्रेशन का शुरुआती लक्षण हो सकता है
सर्केडियन रिदम में गड़बड़ी नींद व मनोदशा बिगाड़ती है
अच्छी नींद के लिए जीवनशैली में बदलाव आवश्यक हैं
सीमा झा, नई दिल्ली। सुबह जागने के बाद ताजगी महसूस करने के बजाय हर रोज थकान और उदासी महसूस करना, सामान्य बात नहीं है। भले ही आप शाम होते-होते थोड़ा बेहतर महसूस करते हैं लेकिन नींद की अधिकता या कमी की समस्या के चलते दिनभर ऊर्जा की कमी महसूस होती है। ऐसा भी देखा गया है कि ज्यादातर लोग हफ्ते के सामान्य दिनों में नींद खराब होने के बाद भी अपना कामकाज अच्छी तरह से कर रहे होते हैं, लेकिन सप्ताहांत या अवकाश की अवधि में खूब सो लेना चाहते हैं। कुछ लोग ऊर्जा में भारी कमी या बीमार महसूस करते हैं।
बता दें कि नींद खराब होने के बाद शरीर में ऊर्जा का संतुलन भी बिगड़ता है। आपको यह लग सकता है कि आपकी मानसिक सेहत अच्छी है, लेकिन नींद के साथ भूख भी असामान्य या खराब हो गई है तो संभव है आप अवसाद के शिकार हो रहे हैं। एम्स, नई दिल्ली की पूर्व क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट डा. सुजाता मिन्हास के अनुसार, अवसाद के मरीजों को ठीक होने की सलाह में सबसे जरूरी सलाह नींद को ठीक करना होता है। दरअसल, नींद पूरी होती है तो अवसाद का मरीज भी स्वयं की देखभाल के प्रति सजग होने का प्रयास करता है।
परस्पर जुड़े हैं नींद और अवसाद
अगर आप अवसाद से बचना चाहते हैं तो सबसे पहले जरूरी है कि नींद न आने के कारणों का निदान करें। दरअसल, नींद की कमी या इसकी अधिकता हमारी भावनाओं का प्रबंधन मुश्किल बना सकती है। आपको कभी भी या जल्दी गुस्सा आ सकता है, चिड़चिड़ापन रहता है या किसी बात पर उचित प्रतिक्रिया का अभाव आपके निजी, कामकाजी, सामाजिक सभी तरह के रिश्तों पर भारी पड़ सकते हैं। इसके बाद एक दिन नींद से जुड़ी परेशानियां हैं और अवसाद भी है तो ये मिलकर आपको ऐसे कुचक्र में फंसा सकती है जिससे शारीरिक व मानसिक सेहत से जुड़ी चुनौतियां भारी पड़ने लगती हैं। बता दें कि अवसाद के शुरुआती लक्षणों में नींद की कमी या अधिकता है, जिसे अनदेखा करना सही नहीं है।
क्या है सर्केडियन रिदम डिप्रेशन
इन दिनों देर रात तक काम करने या नाइट शिफ्ट, देर रात बाहर खाने की संस्कृति के कारण शरीर की जैविक घड़ी का बाहरी वातावरण से तालमेल बिगड़ रहा है। इससे नींद से जुड़ा हार्मोन मेलाटोनिन बुरी तरह प्रभावित होता है। मेलाटोनिन में खराबी आने से हमारी मनोदशा को नियंत्रित करने वाले हार्मोन जैसे सेरोटोनिन व डोपामाइन पर भी असर पड़ता है। अवसाद के लक्षणों को उभारने में इसका बड़ा योगदान होता है।
ये लक्षण हैं तो विशेषज्ञ से परामर्श लें-
- रात में दो–तीन बजे से पहले नींद न आना और सुबह देर तक सोते रहने की इच्छा
- दिनभर थकान या कमजोरी व देर रात को तेज भूख।
- एंग्जाइटी या मानसिक दबाव होने पर अधिक सोने की इच्छा।
- सामान्य काउंसलिंग या एंटीडिप्रेसेंट दवाओं का प्रभाव कम होना।
जीवनशैली में आवश्यक बदलाव
- रात में स्क्रीन टाइम (मोबाइल, लैपटाप) को कम से कम करने का प्रयास।
- दिन के समय आउटडोर या शारीरिक गतिविधि बढ़ाने का अभ्यास।
- सोने और जागने का एक तय समय निर्धारित करें।
- देर रात कैफीन, अल्कोहल और भारी भोजन लेने से बचें।
नींद से जुड़ी समस्याओं से करें बचाव
- अनिद्रा या इंसोम्निया। अवसाद के अधिकांश मरीजों में यह समस्या होती है।
- हाइपरसोम्निया है तो बहुत अधिक नींद आती है। दिनभर एकाग्रता बनाए रखने में कठिनाई हो सकती है।
- स्लीप एप्निय में सांस-सांस रुककर या कम आती है। यह नींद को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। यदि यह अधिक बढ़ जाए तो अवसाद की परेशानी हो सकती है।
शरीर को भी सुनना जरूरी
डॉ. सुजाता मिन्हास (पूर्व क्लीनिकल साइकोलाजिस्ट, एम्स दिल्ली) बताती हैं कि डेडलाइन पूरा करने का दबाव, देर रात तक जागने की संस्कृति इतनी सामान्य होती जा रही है कि हम उन लक्षणों को अनदेखा करने लगते हैं जो अवसाद से जुड़े हो सकते हैं। सोचकर देखें कि आपकी नींद की समस्या लंबे समय तक बनी रहे? सच तो यह है कि इसके बाद आपको न केवल जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां होंगी बल्कि आप जल्द ही अवसाद के चपेट में आ सकते हैं। यदि आपको अपनी नींद को ठीक करनी है और अवसाद से भी बचना है तो अपने शरीर की सुनें कि वह इन दिनों आपकी आदतों के कारण कितना असहज हो रहा है। देर रात कभी भी खा लेना या सो लेना, यह एक ऐसी आदत बन चुका है कि केवल इन दो चीजों के कारण हम बीमार हो रहे हैं।
पता होना चाहिए शरीर का काम करने का अपना तरीका है यह हमारी इच्छा से नहीं चल सकता। यह सुबह अपशिष्ट बाहर निकालता है और सुबह नौ बजे से दोपहर तीन बजे तक स्वीकार करता है। तीन बजे से नौ बजे तक यह पोषक पदार्थों को प्रोसेस करता है, इसलिए रात में कम या हल्का खाने की सलाह दी जाती है। इसके बाद रात नौ बजे से तीन बजे तक जब हम नींद में होते हैं तो शरीर में मरम्मत प्रकिया चल रही होती है। आप चाहेंगे कि आप रात तीन बजे से दस बजे सुबह तक सोते रहें, तो यह कार्य चलता रहेगा तो ऐसा नहीं है। यदि शरीर के कार्यप्रणाली के विरुद्ध चलेंगे, तो स्वाभाविक है कि वह बीमार ही होगा।
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