माता-पिता में दिख रहे ये बदलाव सिर्फ उम्र का तकाजा नहीं, अल्जाइमर का भी हो सकते हैं संकेत
क्या आपके माता-पिता अचानक अपने पसंदीदा कामों से कटने लगे हैं या रोजमर्रा की बातों में उलझ रहे हैं? अक्सर ...और पढ़ें

'उम्र का असर' कहकर इग्नोर मत कीजिए माता-पिता में दिख रहे ये बदलाव (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम अक्सर देखते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ हमारे माता-पिता के स्वभाव और आदतों में बदलाव आने लगता है। कई बार हम इसे 'उम्र का असर' मानकर अनदेखा कर देते हैं। हालांकि, फोर्टिस अस्पताल, नोएडा की सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ. नेहा पंडिता का मानना है कि ये छोटे-छोटे बदलाव किसी गहरी परेशानी का संकेत हो सकते हैं।
अक्सर माता-पिता यह नहीं बताते कि उन्हें किसी काम को करने में तकलीफ हो रही है। उन्हें डर होता है कि अगर उन्होंने मदद मांगी, तो उनकी आजादी छिन जाएगी। कई बार तो उन्हें खुद भी अपनी घटती क्षमताओं का एहसास नहीं होता। ऐसे में, परिवार की जिम्मेदारी है कि वे इन संकेतों को समय रहते पहचानें। आइए, आज 21 सितंबर को मनाए जा रहे 'वर्ल्ड अल्जाइमर डे' के मौके पर डिटेल में समझते हैं इस बारे में।
'उम्र का असर है' कहकर न करें इग्नोर
सबसे अहम बात यह नहीं है कि माता-पिता क्या भूल रहे हैं, बल्कि यह है कि उन्होंने कौन से काम करने बंद कर दिए हैं। उदाहरण के लिए, अगर सालों से बेहतरीन खाना बनाने वाली मां अचानक रसोई से दूर भागने लगे क्योंकि उसे खाना पकाने का क्रम उलझाने लगा है, तो यह सिर्फ 'पसंद' का बदलना नहीं है। इसी तरह, सालों से घर का हिसाब-किताब रखने वाले पिता अगर अचानक बिल भरना भूलने लगें या पैसों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाएं, तो परिवार को सतर्क हो जाना चाहिए।
चश्मा भूलना आम है, लेकिन उसका इस्तेमाल भूलना नहीं
डॉक्टर के अनुसार, चश्मा कहां रखा है यह भूल जाना, और चश्मा मिलने के बाद यह समझ न आना कि उसका इस्तेमाल कैसे करना है- ये दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। नई जगह का रास्ता भटकना आम बात है, लेकिन अगर माता-पिता अपने जाने-पहचाने बाजार, पार्क या किसी रिश्तेदार के घर जाने में अचानक झिझकने लगें या रास्ता भूलने लगें, तो इसे महज उम्र का तकाजा नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, अगर वो पिछली बातचीत भूलकर एक ही सवाल बार-बार पूछ रहे हैं, तो यह भी एक बड़ा संकेत है।
बातचीत में अटकना और व्यवहार में अचानक बदलाव
अगर आप गौर करें कि आपके माता-पिता बातचीत के बीच सही शब्द खोजने में अटकने लगे हैं, चीजों का नाम लेने के बजाय उनका विवरण देने लगे हैं या बोलते-बोलते अपनी बात भूल जाते हैं, तो इस पर ध्यान दें।
उनके व्यवहार में आए बदलाव भी चेतावनी हो सकते हैं। मसलन:
- अचानक बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा या शक्की हो जाना।
- अपने पसंदीदा शौक (जैसे बागवानी, पढ़ना या सुबह की सैर) से दूरी बना लेना और लोगों से मिलना-जुलना कम कर देना।
- फैसले लेने में गड़बड़ी करना, जैसे- अजीबोगरीब खर्चे करना, बेकार की चीजें खरीदना या आसानी से ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार हो जाना।
हर बदलाव नहीं होता 'डिमेंशिया'
यह समझना बहुत जरूरी है कि हर बदलाव डिमेंशिया का संकेत नहीं है। कई बार डिप्रेशन, अकेलापन, नींद की कमी, सुनने में परेशानी या किसी दवा के साइड-इफेक्ट के कारण भी ऐसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इसलिए हर परेशानी को सीधे बीमारी का नाम देना सही नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप उनके आज के व्यवहार की तुलना, उनके ही पुराने व्यवहार से करें, न कि उनकी उम्र के किसी अन्य व्यक्ति से।
सही तरीके से करें बात, प्यार से बढ़ाएं मदद का हाथ
परिवार का काम बीमारी का निदान करना नहीं, बल्कि बदलावों को पहचानकर सही समय पर मदद दिलाना है। अगर आपको कोई बदलाव दिखे, तो सीधे यह न कहें कि "आपको डिमेंशिया हो रहा है।" इसके बजाय प्यार से पूछें, "मैंने देखा है कि आपको इस काम में थोड़ी मुश्किल हो रही है, क्या कोई बात है जो आपको परेशान कर रही है?"
याद रखिए, ये परेशानियां किसी बड़ी घोषणा के साथ नहीं आतीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों, जैसे एक भूला हुआ बिल, छोड़ा हुआ शौक या जाने-पहचाने रास्ते पर झिझक में छिपकर सामने आती हैं। इन संकेतों से घबराने की जरूरत नहीं है, बस थोड़ी जागरूकता और सही समय पर डॉक्टर की सलाह आपके परिवार के लिए बहुत मददगार साबित हो सकती है।
