सबके सामने मुस्कुराना और अकेले में रोना... क्या आप भी 'मास्क डिप्रेशन' के शिकार तो नहीं? डॉक्टर से जानें सच
अवसाद और आत्महत्या की घटनाओं में अक्सर सफल और पढ़े लिखे लोगों का नाम स्तब्ध करता है। आए दिन प्रतिष्ठित ...और पढ़ें

मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी (Picture Courtesy: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। रोजमर्रा के जीवन में होने वाले तनाव को संगीत, यात्रा अथवा प्राणायाम से ठीक कर लेना चाहते हैं तो ऐसा सोचने वाले आप अकेले नहीं हैं। वास्तव में मानसिक सेहत को लेकर यही धारणा रही है। हालांकि, समय के साथ जागरूकता बढ़ी है, पर इसे संपूर्ण सेहत का अंग मानना जरूरी है ताकि आप समझ सकें कि मन भी शरीर की तरह बीमार होता है।
यदि आपका हीमोग्लोबिन कम है तो थकान व सुस्ती होती है, किसी से बात करने का भी मन नहीं करता। लोग आपसे इस बदले व्यवहार का कारण पूछते हैं। इसी तरह हीमोग्लोबिन कम होने का प्रभाव आपके शरीर व मन पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों पर भी पड़ता है।
एम्स दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. नंद कुमार कहते हैं, यदि आप किसी बात से परेशान हैं, कुछ सूझ नहीं रहा है कि आपको उस समय क्या करना चाहिए तो इसके लिए स्वयं को दोषी मानने के बजाय बाहरी कारणों को समझें। यह कुछ भी हो सकता है। हर बात का आपके मन पर असर पड़ता है। समस्या अधिक बढ़े इससे पहले चेतना जरूरी है अन्यथा यह गंभीर व जानलेवा रूप ले सकती है।
इस समय देश में बड़ी संख्या में युवाओं में अवसाद के मामले सामने आए हैं। आत्महत्या की खबरें आए दिन स्तब्ध कर रही हैं। भारतीय मनोचिकित्सा सोसाइटी के अनुसार, देश में कुल मानसिक विकारों के मामलों में से लगभग 60 प्रतिशत मामले 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं और किशोरों से जुड़े हैं।
वहीं हाल ही के उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को दूर करने और आत्महत्याओं को रोकने के लिए गठित राष्ट्रीय कार्यबल (एनटीएफ) की रिपोर्ट की मानें तो उच्च शिक्षा संस्थानों के करीब 15 प्रतिशत छात्रों ने यह माना है कि पिछले छह महीनों में खुद को बेहद परेशान या तनावग्रस्त महसूस किया, जबकि नौ प्रतिशत छात्रों ने माना कि उन्हें आत्महत्या का विचार आया।
सफलता और मानसिक सेहत
बीते दिनों आईआईटी जैसे देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में होने वाली आत्महत्याएं बताती हैं कि मानसिक सेहत का असाधारण प्रतिभा, शिक्षा या सफलता से विशेष सरोकार नहीं है। डॉक्टरों की आत्महत्या की खबरें तो सुनी तो कई लोगों को हैरानी हुई।
इतिहास के सबसे सफल ओलंपियन तैराक माइकल फेल्प्स ने भी अवसाद का सामना किया है, यह उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकारा है। वर्ष 2021 में जिम्नास्ट सिमोन बाइल्स ने भी अपनी खराब मानसिक सेहत के लिए ओलिंपिक प्रतियोगिता से अपना नाम वापस लिया।
प्रोफेसर नंद कुमार के अनुसार, 15-30 साल के युवा इस समय सबसे अधिक तनाव में हैं। जब वे आईआईटी जैसे संस्थानों में जाते हैं तो वहां परीक्षा पास कर लक्ष्य पूरा करने का तनाव कम नहीं होता। वह एक ऐसे परिवेश में प्रवेश करते हैं जहां उनका तनाव और बढ़ जाता है। वहां रहते दिमाग एक ही दिशा में काम कर रहा होता है कि कैसे अपनी श्रेष्ठता को बरकरार रखा जाए। लोगों से मिलना जुलना या परिवार समाज से कोई खास मतलब नहीं होता, बस नजर रहती है कि कुछ बड़ा प्राप्त करने पर।
उच्च शिक्षण संस्थानों में रहने वाले बच्चों को बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है कि जब कुछ बन जाओगे तो लोग तुम्हारी सुनेंगे, पर जब यह नहीं होता तो उनमें असंतोष पैदा होता है। वे खुद को कम आंकते हैं जबकि यह सीख व्यावहारिक नहीं है। चुनौतियां कभी खत्म नहीं होती। चुनौतियों से जूझकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। वहां रहकर भी जिन बच्चों का परिवार-समाज से भी जुड़ाव रहता है वे अपेक्षाकृत अधिक बेहतर तालमेल बना पाते हैं।
प्रतिभाशाली छात्रों या लोगों में आत्महत्या की घटनाएं एक दिन में नहीं होती, यह एक प्रक्रिया है जो धीरे-धीरे उन्हें एक दिन ऐसा करने पर बाध्य कर देती हैं। जब उन्हें लगता है कि अपनी परेशानी से निकलने के लिए यही एकमात्र राह बची है, अब उन्हें कोई सुनेगा नहीं, कोई मदद नहीं करेगा।
मनोचिकित्सक डॉ. जितेंद्र नागपाल के अनुसार, आज बच्चों के मन में काल्पनिक दुनिया घर कर गयी है। वे शुरू से ऐसी चीजें पा लेना चाहते हैं जो उम्र के हिसाब से धीरे-धीरे ही हासिल हो सकता है। कुछ प्राप्त करने के लिए श्रम, सुनियोजित प्रयास व कांटों भरी राह पर चलना पड़ता है। दो करोड़ का पैकेज प्राप्त करना ही सफलता नहीं है, पर समाज व परिवार इन्हीं बातों के इर्द-गिर्द सीख देते हैं जो बच्चों को अवसाद की ओर धकेल रहा है।
मास्क डिप्रेशन तो नहीं?
सफलता या मानसिक सेहत एक-दूसरे की विरोधी तो नहीं, पर सफल लोग बीमार नहीं हो सकते यह कहना उनके ऊपर अतिरिक्त दबाव डालना है। यह एक बड़ा कारण है कि ऐसे लोग मास्क डिप्रेशन में जीने लगते हैं। बाहर से मुस्कुराते रहना, सब ठीक है ऐसी भाव-भंगिमा को बनाए रखना ताकि लोग समझ न पाएं कि वे अपनी परेशानियों से उबर नहीं पा रहे।
दरअसल, अवसाद या तनाव से जूझ रहे लोगों की छवि अक्सर उदास या सामाजिक संपर्क से कटे व्यक्ति की बनी रहती है। वे खुद इस छवि से बाहर नहीं आना चाहते। वास्तव में अवसाद से पीड़ित लोग भी उच्च कार्यक्षमता व सामाजिक रूप से सक्रिय दिखायी पड़ सकते हैं। उनके रिश्ते भी अच्छे हो सकते हैं। ऐसे में जरूरी है कि अवसाद को किसी खास लक्षणों के दायरे में बांधने के बजाय विशेषज्ञों से परामर्श लेकर ही समझें।
बड़ों को बनना होगा मार्गदर्शक
बीते कुछ दशकों में बच्चों पर सफल होने और माता-पिता की उम्मीदों का दबाव बढ़ा है। परिवार की प्रतिष्ठा के नाम पर बच्चों को कुछ कर दिखाने की प्रेरणा मुश्किल में डाल सकती है। जब अपेक्षाकृत परिणाम नहीं होते बच्चों में ग्लानि व शर्मिंदगी होती है। महत्वाकांक्षा बुरी नहीं है, लेकिन यह जानलेवा न बन जाए, इसका ध्यान रहना चाहिए। मां-बाप की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के दबाव में बचपन नहीं भूलना चाहिए। उन्हें अच्छा दिखने या बड़ा बनने के बजाय अच्छा होने का महत्व बताना चाहिए। उन्हें उनका मूल्य समझाएं व सामाजिकता, उदारता आदि जीवनमूल्यों पर स्वयं अमल करें और उनके मार्गदर्शक बनें। यूनिसेफ व विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, छोटी उम्र से ही बच्चे मानसिक सेहत की समस्याओं से जूझ रहे हैं। लगभग आधी यानी 50 प्रतिशत स्वास्थ्य समस्याएं 14 वर्ष की उम्र तक शुरू हो जाती है। तीन चौथाई मानसिक विकार 24 साल की उम्र तक विकसित हो चुके होते हैं। इससे स्पष्ट है कि अगर बचपन से ध्यान दिया जाए तो मानसिक सेहत बिगड़ने से काफी हद तक रोका जा सकता है।
डॉ. जितेंद्र नागपाल, वरिष्ठ मनोचिकित्सक, मूलचंद अस्पताल, नई दिल्ली
स्वयं के बनें साथी
मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोग अक्सर तर्क देते हैं कि मेरी बीमारी का कोई कैसे इलाज कर लेगा, मेरी समस्या समझ ही नहीं सकते, दवा कैसे यह ठीक कर सकती है आदि। जबकि तथ्य यह है कि आप ठीक हो सकते हैं। दवा दिमाग पर असर करती है, वह उस रसायन पर काम करती है जिनकी वजह से आप समस्याग्रस्त महसूस करते हैं। आपकी समस्या तो नहीं बदलती, लेकिन आप उपचार के बाद बेहतर समाधान निकाल पाने में सक्षम हो सकते हैं। अगर आपको समस्या है इसे लेकर सजग बनें साथ ही स्वीकार करें कि हां मुझे समस्या है और इसको लेकर चिकित्सक से मिलना है, आगे बढ़ना है। आपको खुद का साथी बनना होगा, तभी आप सही समाधान तक पहुंच पाएंगे।
डॉ. नंद कुमार, मनोचिकित्सक, एम्स, दिल्ली
लक्षणों को समझें
- अधिकांश समय में उदासी या निराशा महसूस होना।
- छोटी-छोटी बातों का गुस्सा, झुंझलाहट या भावनात्मक उबाल आना।
- नींद नहीं आने या बहुत आने जैसी समस्या। भूख में बढ़ोत्तरी या कमी।
- पसंदीदा काम में अरुचि होना, पारिवारिक गतिविधियों से दूर रहना।
- ऊर्जा में कमी महसूस होना, सिरदर्द, एसिडिटी या अन्य शारीरिक लक्षण।
- एकाग्रता में कमी आना, निर्णय लेने में कठिनाई।
- आत्मघाती विचार या स्वयं को दोषी मानना।
छोटी मगर काम की बातें
- मानसिक सेहत के लिए लक्ष्य बनाएं। जैसे नींद पूरी करना, कोई समस्या हो तो मदद मांगना।
- आराम के लिए समय निकालना, ध्यान, कसरत और दोस्तों से मिलना-जुलना।
- परफेक्ट कोई नहीं यह ध्यान रहे, अवकाश लेना आवश्यक है।
- कोई समस्या है तो यह आपकी व्यक्तिगत कमजोरी नहीं है बल्कि लक्षणों को पहचानकर समस्या दूर हो सकती है, यह स्वीकारें।
