जीभ से पहले दिमाग को होता है 'स्वाद' का एहसास, रिसर्च में सामने आया डाइटिंग करना क्यों है इतना मुश्किल
शोध के अनुसार, जीभ से पहले दिमाग को स्वाद का एहसास होता है, खासकर भूख लगने पर भोजन की कल्पना अधिक स्पष्ट हो जाती है।

खाली पेट हमारा दिमाग कैसे हमें बिना खाए ही पकवानों का स्वाद महसूस कराता है? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
द कन्वर्सेशन, डुनेडिन (न्यूजीलैंड)। 'स्वाद' का एहसास सिर्फ जीभ से नहीं, बल्कि मस्तिष्क से शुरू होता है। जब आप किसी पसंदीदा खाने के बारे में सोचते हैं या उसे देखते हैं, तो दिमाग में मौजूद स्वाद की यादें सक्रिय हो जाती हैं और आप बिना खाए ही स्वाद की कल्पना कर सकते हैं।
न्यूरोलाजिकल शोध में पाया गया है कि जब बहुत तेज भूख लगती है, तब आपका दिमाग भोजन के स्वाद, खुशबू और उसे खाने के अनुभव की कल्पना बेहद स्पष्ट और जीवंत रूप से करने लगता है। शोध से पता चलता है कि भोजन की इच्छाएं हमारे 'मन की आंख' को भी बदल सकती हैं, वह मानसिक चित्रण जो हमें पहले कौर का दृश्य या स्वाद लेने में सक्षम बनाता है। इसी प्रक्रिया के कारण जब आप खाली पेट होते हैं, तो दिमाग में अस्वास्थ्यकर या मीठे खाद्य पदार्थों की लालसा अधिक बढ़ जाती है।
हर इंसान के लिए अलग होता है खाने का अनुभव
यह इस तथ्य को दर्शाता है कि मानव मस्तिष्क के लिए भोजन एक बहु संवेदी अनुभव प्रदान करता है। यह एक कुरकुरी पेस्ट्री के दृश्य या रात के खाने की पकने की महक से शुरू हो सकता है और उस भोजन के स्वाद और बनावट के साथ आगे बढ़ सकता है जिसे हमने खाया है। चूंकि खाने के अनुभव हमारे मस्तिष्क में छाप छोड़ते हैं, हम बाद में उन्हें हर इंद्रिय के साथ मानसिक चित्रण के माध्यम से फिर से बना सकते हैं। हम जीभ पर नींबू की तीखी खटास की कल्पना कर सकते हैं या नाक के माध्यम से ताजे काफी की सुगंध का अनुभव कर सकते हैं। यह भी खोजा है कि हम सभी इसे एक ही तरीके से नहीं कर सकते। कुछ लोग संवेदी अनुभवों को समृद्ध विवरण में फिर से जी सकते हैं, जबकि अन्य केवल हल्की छाप बना सकते हैं।
भोजन की इच्छाएं कैसे अधिक स्पष्ट होती हैं
यूनिवर्सिटी आफ ओटागो में डुनेडिन में दो सत्रों में चलाए गए प्रयोगों की एक श्रृंखला में हमने 60 लोगों का अवलोकन किया जिन्होंने पिछले रात उपवास किया था। एक सत्र तब चलाया गया जब प्रतिभागी भूखे रहे और दूसरा तब जब उन्हें एक पूर्ण नाश्ता दिया गया। विभिन्न खाद्य पदार्थों की तस्वीरें देखते समय उनसे कहा गया कि वे या तो उनके स्वाद या बनावट की कल्पना करें। भूख का स्पष्ट प्रभाव स्वाद के चित्रण पर पड़ा। जब वे भूखे थे, तो उन्हें भोजन के स्वाद की कल्पना करना अधिक आसान लगा, बजाय इसके कि जब वे पेट से भरे हुए थे।
फूड क्रेविंग हम पर इतनी हावी क्यों होती है?
यह बताता है कि केवल भोजन की इच्छा को बढ़ाने के अलावा यह भी बढ़ा सकता है कि खाने के अनुभव को मन कैसे अनुकरण करता है । यह भी समझा जा सकता है कि क्यों भोजन की इच्छाएं इतनी भारी हो सकती हैं, जो हमारी इंद्रियों को सुगंध, स्वाद और अपेक्षित आनंद का भव्य भोज प्रदान करती हैं। उन लोगों के लिए जिन्होंने प्रतिबंधात्मक आहारों का प्रयास किया, ये निष्कर्ष यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल इच्छाशक्ति कभी-कभी पर्याप्त नहीं होती। जैसे - जैसे भूख बढ़ती है, उन खाद्य पदार्थों के विचार जो हम सबसे अधिक चाहते हैं, अधिक स्पष्ट, तात्कालिक और संतोषजनक हो सकते हैं।
अध्ययन के निष्कर्षों में से एक में प्रतिभागी आमतौर पर खाद्य पदार्थों की बनावट की कल्पना करना अधिक आसान पाते हैं बजाय उनके स्वाद के। स्वाद और सुगंध से संबंधित चित्रण को दृश्य, श्रवण या स्पर्श चित्रण की तुलना में प्रकट करना कठिन माना जाता है। फिर भी स्वाद और सुगंध का चित्रण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस बारे में न्यूरोसाइंटिस्ट्स का कहना है कि हमारी इच्छाओं और व्यवहार पर इस कल्पना का जो असर होता है, उसमें दिमाग के संवेदी हिस्सों की सक्रियता शामिल होता है।
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