नई दिल्ली, लाइफस्टाइल डेस्क। कोरोनावायरस की दुसरी लहर में मरीज़ों को सबसे ज्यादा परेशानी ऑक्सीजन लेवल कम होने से हुई है। इस दौरान कुछ मरीज़ों का ऑक्सीजन लेवल तेज़ी से कम होता रहा और मरीज़ों को इसका अंदाज़ा भी नहीं हुआ। जब तक ऑक्सीजन लेवल कम होने का पता चला तब तक मरीज़ के अस्पताल में भर्ती होने तक की नौबत आ गई। आमतौर पर खून में ऑक्सीजन का लेवल पता लगाने के लिए ऑक्सीमीटर का सहारा लिया जाता है, लेकिन तकनीक की कामयाबी से अब ऑक्सीजन का स्तर स्मार्टफोन से भी जांचा जा सकता है। इस तकनीकी कामयाबी ने पल्स ऑक्सीमीटर के चलन को पुराना कर दिया है। हाल ही में कोलकाता के हेल्थ स्टार्टअप ने एक मोबाइल ऐप बनाया है जिसका इस्तेमाल ऑक्सीमीटर की जगह पर किया जा सकता है।

अगर आप अपने लिए कोई नया और अच्छा ऑक्सीमीटर खरीदने का प्लान कर रहे हैं तो आपको इसके लिए कम से कम 2 हजार रुपये या उससे अधिक रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इतना पैसा खर्च करने के बाद भी हो सकता है बढ़ती डिमांड की वजह से आपको पल्स ऑक्सीमीटर नहीं मिले।

कोलकाता बेस्ड हेल्थ स्टार्टअप ने लोगों की दिक्कत को ध्यान में रखते हुए एक मोबाइल ऐप डेवलप की है जिसे ऑक्सीमीटर की जगह पर इस्तेमाल किया जा सकता है। आइए इस ऐप के बारे में विस्तार से जानते हैं।

मोबाइल ऐप बेस ऑक्सीमीटर कैसे करें इस्तेमाल:

हेल्थ स्टार्टअप द्वारा डेवलप की गई इस मोबाइल ऐप को CarePlix Vital कहा जाता है जो कि यूजर के ब्लड ऑक्सीजन लेवल, पल्स और रेसप्रेशन रेट्स को मॉनिटर करने का काम करती है। इस मोबाइल ऐप को इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले आपको स्मार्टफोन के रियर कैमरे और फ्लैशलाइट पर उंगली रखनी है। कुछ सेकंड के अंदर ही ऑक्सीजन सेटुरेशन (SpO2), पल्स और रेसिपिरेशन लेवल डिस्प्ले पर नजर आ जाता है।

CareNow Healthcare के को-फाउंडर सुभब्रत पॉल ने बताया कि लोगों को ऑक्सीजन सेटूरेशन और पल्स रेट जैसी जानकारी हासिल करने के लिए पल्स ऑक्सीमीटर या स्मार्टवॉच आदि डिवाइस की जरूरत पड़ती है। इस डिवाइस में इंटरनल टेक्नोलॉजी की बात की जाए तो इसमें फोटोप्लेथिस्मोग्राफी या पीपीजी इस्तेमाल की जाती है।

कैसे करें जांच:

वियरेबल डिवाइस और ऑक्सीमीटर में इन्फ्रारेड लाइट सेंसर का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन फोन में सिर्फ फ्लैशलाइट का ही इस्तेमाल करके ऑक्सीजन की जांच की जा सकती है। इसमें जानकारी प्राप्त करने के लिए आपको रियर कैमरा और फ्लैशलाइट पर उंगली रखना होगा और करीब 40 सेकंड तक स्कैनिंग करनी होगी। उस दौरान लाइट के अंतर को केलकुलेट किया जाता है और अंतर के आधार पर PPG ग्राफ को प्लॉट किया जाता है। ग्राफ से SpO2 और पल्स रेट की जानकारी मिलती है।

                    Written By: Shahina Noor

Edited By: Shilpa Srivastava