कद्दू को क्यों कहते हैं सीताफल, काशीफल और कूष्माण्ड? एक सब्जी के चार नाम, हर नाम की अलग कहानी
कद्दू के सीताफल, काशीफल और कूष्माण्ड जैसे विभिन्न नामों के पीछे पौराणिक कहानियां हैं।

कद्दू एक, नाम अनेक (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हमारी रसोई में ऐसी बहुत सी सब्जियां हैं, जो एक दो नहीं बल्कि कई नामों से जानी जाती हैं। इनमें से एक सब्जी है कद्दू, जिसे संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा कहते हैं, कहीं कुम्हड़ा, कोहड़ा तो कहीं पर सीताफल या काशीफल।
माना कि कुछ नाम किसी खास क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा के आधार पर रखे गए हैं, पर इसे सीताफल, काशीफल या कूष्माण्डा आखिर क्यों कहा जाता है? क्या इसका काशी, माता सीता या कूष्माण्डा माता से कोई कनेक्शन है? आइए इसपर थोड़ा गहराई से बात करते हैं।
कद्दू को क्यों कहा गया सीताफल?
कद्दू को सीताफल कहे जाने के पीछे रामायण काल से जुड़ी पौराणिक कहानी है। कहते हैं कि जब भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ; तो वनवास के इन दिनों में श्री राम इसी फल को माता सीता के लिए लेकर आते थे।
इसके अलावा, कुछ ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि रावण के सीताहरण के बाद माता सीता बहुत दुःखी थीं। इस पीड़ा में उन्होंने जितने भी आंसू जमीन पर गिराए, उन्हीं से पेड़ बने और इन्हीं पेड़ों से यह फल उपजा। जिसके चलते इसे सीताफल कहा जाने लगा।
ठंडी तासीर के चलते भी पड़ा सीताफल नाम
सीताफल कहे जाने का एक तीसरा तर्क यह भी है कि इस फल की तासीर ठंडी होती है, ऐसे में इसे शीतफल नाम दिया गया। इसी नाम में आगे चलकर थोड़ा बहुत बदलाव हुआ और इस तरह यह सीताफल बन गया।
कद्दू को काशीफल कहे जाने की वजह
कद्दू का काशी से कोई सीधा कनेक्शन तो नहीं है, लेकिन हिंदू धार्मिक मान्यताओं से नाता जरूर है। हिंदी धर्म में काशी को प्राचीनकाल से ही मोक्ष प्राप्ति और वेदों का केंद्र माना जाता रहा है। वहीं, धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा पाठ जैसे श्राद्ध या भंडारे में कद्दू की सब्जी बनाना शुभ माना गया है। इसी वजह से कद्दू काशीफल भी कहलाया।
माता कूष्माण्डा से भी है कद्दू का संबंध
कद्दू का संस्कृत नाम कूष्माण्ड है, यह नवरात्र में मां दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम है, जिन्होंने इस ब्रह्मांड की रचना की थी। फिर इस फल के आकार को ध्यान से देखें, तो यह ब्रह्मांड की तरह ही दिखाई देता है। यही कारण है कि हम कद्दू को कूष्माण्ड भी कहते हैं और नवरात्र में मां कूष्माण्डा को इस फल का खासतौर से भोग लगाया जाता है।
