विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

बुढ़िया के बाल समझकर खाते हैं जिसे बच्चे, उसकी कहानी है 120 साल पुरानी; डेंटिस्ट ने बनाई थी यह मीठी कैंडी

Published: Sat, 26 Sep 2026 04:51 PM (IST)

बचपन की पसंदीदा कॉटन कैंडी, जिसे 'बुढ़िया के बाल' भी कहते हैं, शुरुआत में 'फेयरी फ्लॉस' नाम से बेची गई थी।

अमेरिका में बनी थी पहली कॉटन कैंडी (Image Source: AI Generated)

अमेरिका में बनी थी पहली कॉटन कैंडी (Image Source: AI Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन में हम सभी ने मेलों में घूमते हुए एक पतली सी लकड़ी पर गोल-गोल लपेटी हुई कॉटन कैंडी तो जरूर खाई होगी। हां, वही कैंडी जिसे आम बोलचाल में ‘बुढ़िया के बाल’ कहा जाता है। मुंह में घुल जाने वाली यह कैंडी आज भी गली-मोहल्लों में मिल रही है, जो बच्चों की भी उतनी ही फेवरेट है। पर क्या आप इसके बनने की कहानी जानते हैं? 

क्या आप जानते हैं कि किसने रुई जैसी दिखने वाली इस मीठी सी कॉटन कैंडी का आविष्कार किया? अगर नहीं तो आइए आपको इसकी कहानी बताते हैं। 

अमेरिका में बनी थी पहली कॉटन कैंडी 

कॉटन कैंडी जिसे हम भारतीय बुढ़िया के बाल कहते हैं, सबसे पहले अमेरिका में बनी थी। अमेरिका में विलियम्स जेम्स मॉरिसन नाम के एक डेन्टिस्ट ने इस कैंडी का आविष्कार किया था। दरअसल, उन्हें नई-नई चीजें बनाने का बड़ा शौक था। कहते हैं कि साल 1897 में जेम्स मॉरिसन ने जॉन सी व्हाटर्न नामक एक हलवाई के साथ मिलकर एक मशीन इन्वेन्ट की, इस अनोखी मशीन में गरम चीनी को घुमाकर कैंडी तैयार होती थी। 

5 लाख डॉलर की हुई थी पहली कमाई 

डेन्टिस्ट ने मशीन को ‘फेयरी फ्लॉस’ नाम से पेटेंट करवाया था। इसका मतलब होता है ‘परियों का सूती धागा’। उन्होंने इस मशीन को बनाने के 7 साल बाद एक मेले में रखा और 25 पैसे प्रति बॉक्स के हिसाब से कैंडी को बेचना शुरू किया। 

इतिहास में यह बात दर्ज है कि 7 महीनों तक चलने वाले इस मेले में जेम्स ने 68,000 से ज्यादा डिब्बे बेचे, जिससे उन्होंने $17,000 यानी करीब 5 लाख डॉलर की कमाई की थी।  

दूसरे डेन्टिस्ट ने रखा कॉटन कैंडी नाम 

इस कैंडी को पहली बार जेम्स नामक डेन्टिस्ट ने फेयरी फ्लॉस नाम से बेचा, फिर दूसरी बार डॉ. जोसेफ लास्को ने साल 1920 में ऐसी ही मिलती-जुलती एक मशीन बनाई और कैंडी को एक सरल नाम दिया ‘कॉटन कैंडी’। डॉ. जोसेफ की मशीन की बनी कैंडी बिल्कुल रुई जैसी थी, जिस वजह से लोगों ने भी इस नाम को अपना लिया। 

शुरू-शुरू में ये कैंडी सफेद रंग में बिकती थी, फिर कुछ सालों बाद इसकी पहचान हल्के गुलाबी और नीले रंग से जुड़ गई। आज कॉटन कैंडी का इतिहास भले ही 120 साल पुराना हो चुका है, पर छोटे बच्चों में इसे खाने का क्रेज उतना ही नया और उत्साह से भरा हुआ है। 

यह भी पढ़ें- युद्ध के मैदान और एक गलती से बना दाल बाटी चूरमा, दिलचस्प है इस राजस्थानी डिश की कहानी; रेसिपी भी है काफी आसान