चंद्रगुप्त मौर्य की शादी से लेकर जोधाबाई की रसोई तक, भारतीय दाल का वो इतिहास जो 99% लोग नहीं जानते
भारतीय भोजन में दालों का गहरा इतिहास है, जो हड़प्पा सभ्यता से शुरू होकर मौर्य साम्राज्य तक फैला है। चंद्रगुप्त ...और पढ़ें

भारतीय दालों का सदियों पुराना इतिहास: मौर्य काल से दाल मखनी तक की रोचक कहानी (Picture Credit- AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय भोजन की बात हो और दाल का जिक्र न हो, तो थाली कुछ अधूरी सी लगती है। यह सिर्फ प्रोटीन का जरिया ही नहीं, बल्कि मन को सुकून देने वाला 'कंफर्ट फूड' है।
कश्मीर की वादियों से लेकर कन्याकुमारी के तट तक, दालें तो वही हैं- अरहर, मूंग या मसूर, लेकिन हर राज्य का अपना खास 'तड़का' इन्हें एक नई रूह और पहचान देता है। घर की सादी 'पीली दाल' से लेकर होटल की शाही 'दाल मखनी' तक, हर एक डिश के पीछे एक दिलचस्प इतिहास छिपा है। चलिए, आज इन्हीं किस्सों से पर्दा उठाते हैं-
हड़प्पा से लेकर मौर्य साम्राज्य तक
दाल से हमारा रिश्ता सदियों पुराना है। खुदाई में मिले सबूत बताते हैं कि हड़प्पा सभ्यता के लोग भी मटर, चना और मूंग दाल खाया करते थे। इतिहास के पन्ने पलटें, तो पता चलता है कि 303 ईसा पूर्व चंद्रगुप्त मौर्य की शादी में, जो दाल परोसी गई थी, वो आज भी पूर्वी भारत में मिलने वाली मशहूर 'घुगनी' की पूर्वज मानी जाती है।
पंचमेल दाल: महाभारत से लेकर मुगलकाल तक का कनेक्शन
पंचमेल दाल आज कई लोगों के खाने का हिस्सा है। जैसाकि नाम से पता चलता है कि पांच दालों (मूंग, चना, तुअर, मसूर, उड़द) के मेल से बनी दाल 'पंचमेल' या 'पंचरत्न दाल' कहलाती है।
इसका इतिहास भी बेहद दिलचस्प है। इसका एक किस्सा महाभारत काल से जुड़ा हुआ है, जब अज्ञातवास के दौरान भीम राजा विराट की रसोई में खाना बनाते हैं। कहा जाता है कि तब भीम ने घी और 5 दालों को मिलाकर इसका आविष्कार किया था।
वहीं, इसका दूसरा किस्सा मुगलकाल से जुड़ा माना जाता है। कहा जाता है कि जोधा बाई ने शादी के बाद वे इसे मुगलों की मांसाहारी रसोई में बनाया था और इसे शाही स्थान दिलाया था।

(Picture Credit- AI Generated)
एक रसोइए की गलती से बनी मुरादाबादी दाल
मूंग दाल से बनने वाली मुरादाबादी दाल कई लोगों को बेहद पसंद होती है, लेकिन क्या इसे खाते समय कभी आपने सोचा है कि आखिर इस दाल को सबसे पहले कब-कैसे और किसने बनाया होगा। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह शाही डिश एक गलती का नतीजा थी।
1625 में शाहजहां के बेटे, राजकुमार मुराद बख्श ने मुरादाबाद शहर बसाया। उन्हें राजस्थानी दाल पसंद थी, लेकिन वे कुछ हल्का खाना चाहते थे। उन्होंने रसोइए को कुछ ऐसा ही बनाने को कहा। इस पर रसोइए ने धीमी आंच पर मूंग दाल पकाई, जो मखमली और हल्की मीठी बन गई। राजकुमार को यह इतनी पसंद आई कि वे इसे दिन में तीन बार खाने लगे। आज भी इसे सूखे पत्तों के दोने में कुरकुरी खटाई और मिर्च के साथ परोसा जाता है।
दाल मखनी की कहानी
दाल की कहानी 'दाल मखनी' के बिना पूरी नहीं हो सकती। इसे बनाने का क्रेडिट कुंदन लाल गुजराल को जाता है। उन्होंने सोचा कि जो मखमली ग्रेवी (टमाटर और क्रीम) वे 'बटर चिकन' के लिए इस्तेमाल करते हैं, क्यों न उसे काली दाल और राजमा के साथ आजमाया जाए? उनका यह प्रयोग सफल रहा और दुनिया को मिल गई सबसे क्रीमी और लजीज दाल मखनी
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