TOP 10 फोर्ब्स के Global Career
करियर कैसा होना चाहिए? यूथ की नजरों से देखें तो ऐसा करियर, जिसमें अपॉच्र्युनिटीज, पर्सनैलिटी और डिफरेंट वर्क स्टाइल, ज्यादा हायरिंग ऑप्शंस के साथ हेल्दी एनवॉयरनमेंट हो और ग्लोबल होने के साथ जिसमें ज्यादा पैसा हो। चाहें आप इंडिया में जॉब करें या अमेरिका में, स्टैंडर्ड एक जैसे हों। अगर ऐसे ही किसी ग्लोबल करियर की ख्वाहिश रखते हैं, तो फेमस अमेरिकन बिजनेस मैगजीन फोर्ब्स के टॉप 10 ग्लोबल करियर्स में से किसी एक को सलेक्ट कर सकते हैं। फेमस करियर काउंसलर जितिन चावला बता रहे हैं कि कैसे आप ग्लोबल करियर में अपना फ्यूचर बना सकते हैं..

बीएमई का Magic
टॉप टेन में शामिल बीएमई यानी बायोमेडिकल इंजीनियर की अगले 10 सालों में जॉब ग्रोथ रेट सबसे अधिक 62 परसेंट तक है..
हेल्थ साइंस में हम इन दिनों जीन और टिश्यू मैनिपुलेशन, ऑर्टिफिशिअल ऑर्गस, लाइफ सेविंग इक्विपमेंट्स, एमआरआई, सीटी स्कैनिंग और सोनोग्राफी जैसे नए-नए शब्द सुनते हैं। ये सब बायोमेडिकल इंजीनियरिंग का मैजिक है। नई विशेषताओं से भरपूर बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में यूथ के लिए जॉब ऑप्शंस की कमी नहीं है। इंडिया के हेल्थकेयर सेक्टर में आई ग्रोथ ने इस फील्ड में इजाफा किया है। नेशनल और इंटरनेशनल लेवल के हेल्थ एक्सपर्ट्स कम रेट पर इस टेक्नोलॉजी के जरिए पेशेंट्स को फिट कर रहे हैं।
क्या है बीएमई?
बायोमेडिकल इंजीनियरिंग यानी बीएमई मेडिकल सेक्टर की एक ग्रोथ करती हुई रोमांचक ब्रांच है। इसके स्पेशलिस्ट ऐसे इंस्ट्रूमेंट्स डिजाइन करते हैं, जो क्लीनिकल नजरिए से यूजफुल हों। इनमें क्लीनिकल कंप्यूटर्स, आर्टिफिशियल हॉर्ट, व्हील चेयर आदि शामिल हैं।
एलिजिबिलिटी
इसके बैचलर प्रोग्राम में एंट्री के लिए मैथमेटिक्स और बायोलॉजी से मिनिमम 55 परसेंट मार्क्स के साथ हायर सेकेंडरी पास होना जरूरी है। इसके लिए आपको इंस्टीट्यूट का एंट्रेंस एग्जाम क्वालिफाई करना होगा। इस कोर्स का पीरियड चार साल है। चाहें तो इसे कंप्लीट करने के बाद बीएमई में पीजी करने का भी ऑप्शन है।
पर्सनल स्किल्स
जिनका टेक्नोलॉजी की ओर रुझान है और जो हमेशा कुछ न कुछ नया करना चाहते हैं, यह फील्ड उन्हीं के लिए है। टीम वर्क इस फील्ड का मेन पार्ट है। कैंडिडेट को टीम वर्क के रूप में काम करना आना चाहिए।
वर्क कुछ हट के
इनका वर्क अन्य मेडिकल प्रोफेशनल्स से अलग है, क्योंकि ये खुद ट्रीटमेंट नहीं करते हैं, बल्कि ट्रीटमेंट में हेल्पफुल इंस्ट्रूमेंट्स बनाते हैं। अपने इंस्ट्रूमेंट्स के जरिए ये मेडिकल प्रॉब्लम्स को सॉल्व करने में मदद करते हैं। ये किसी इमरजेंसी ब्रेकडाउन और मेंटिनेंस से रिलेटेड प्रॉब्लम होने पर खराब हो चुके इंस्ट्रूमेंट्स को भी ठीक करते हैं।
मेन इंस्टीट्यूट्स
-आईआईटी, मुंबई
-एम्स, नई दिल्ली
-बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, वाराणसी
-जेबी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग, हैदराबाद
-जादवपुर यूनिवर्सिटी, कोलकाता
हॉट है जॉब सेक्टर
हेल्थ केयर सेक्टर में बडे-बडे प्राइवेट ग्रुप भी कदम रख रहे हैं, जिसके चलते लेटेस्ट फैसिलिटीज से लैस नए-नए हॉस्पिटल खुलते जा रहे हैं। मेडिकल टूरिज्म की कॉन्सेप्ट आकार ले रही है। इन चीजों को देखते हुए बायो-मेडिकल इंजीनियर की डिमांड आने वाले समय में और भी बढने की उम्मीद है। बायोमेडिकल इंजीनियर के लिए जॉब के चांस मेडिकल इंस्ट्रूमेंट मैन्युफैक्चरिंग, ऑर्थोपेडिक एंड री-हैबिलिटेशन इंजीनियरिंग, मॉलिक्यूलर इंजीनियरिंग की कई ब्रांचेज में है। ये कॉरपोरेट सेक्टर्स के साथ मिलकर भी काम कर सकते हैं। रिसर्च एंड डेवलपमेंट फील्ड तो इनके लिए हॉट ऑप्शन हमेशा से रही है। बीपीएल, लार्सन एंड टर्बो, विप्रो मेडिकल और सिमेंस जैसी कंपनियां तो क्वॉलिफिकेशन और एक्सपीरियंस के बेस पर इसके प्रोफेशनल्स को अपने सेल्स और मार्केटिंग डिपार्टमेंट में फटाफट रिक्रूट तो करती ही हैं, साथ ही कई दूसरे डिपार्टमेंट्स में भी इनकी काफी डिमांड है।
Eye Testing के एक्सपपर्ट
फोर्ब्स की टॉप टेन लिस्ट में शामिल ऑप्टोमेट्री की जॉब ग्रोथ रेट आने वाले सालों में 33 परसेंट तक रह सकती है..
आंखें हमारी बॉडी का सबसे महत्वपूर्ण पार्ट हैं। यही हमें दुनिया के रंग दिखाती हैं। इस कारण ही इनकी केयर हम सभी की प्रॉयरिटी रहती है। आंखों की बेहतर देखभाल कैसे की जाए, यह हमें ऑप्टोमेट्रिस्ट ही बताते हैं। इसके लिए इन्हें स्पेशल ट्रेनिंग दी जाती है। इससे रिलेटेड कोर्स करके इस फील्ड में भी करियर बना सकते हैं। यूएस समेत इंडिया में भी इनकी काफी डिमांड है।
कोर्स ऑप्शन
इसमें करियर बनाने के लिए ऑप्टोमेट्री में बैचलर डिग्री या बीएससी अथवा डिप्लोमा कोर्स करना जरूरी है। सभी कोर्सेज में एंट्री के लिए हायर सेकेंडरी साइंस स्ट्रीम फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथमेटिक्स या बायोलॉजी व अंग्रेजी के साथ मिनिमम 50 परसेंट मार्क्स से पास होना जरूरी है। इसका डिप्लोमा कोर्स दो वर्ष का और बैचलर डिग्री चार वर्ष का है। इसमें तीन साल का कोर्स और एक साल की इंटर्नशिप करनी होती है। इंटर्नशिप के पीरियड में स्टूडेंट को किसी क्लीनिक या हॉस्पिटल में आई स्पेशलिस्ट की कमांड में वर्क करना होता है।
क्या है वर्क?
ये आंखों की देखभाल और आई टेस्टिंग में यूज आने वाले इंस्ट्रूमेंट्स के रख-रखाव के स्पेशलिस्ट हैं। ये आई टेस्टिंग करके चश्मा अथवा लेंस लगाने की एडवाइज भी देते हैं। ये आंखों की डिजीज, कलर ब्लाइंडनेस, दूर व पास देखने की प्रॉब्लम आदि का भी पता लगाते हैं।
सैलरी
किसी अच्छे इंस्टीट्यूट से कोर्स करने के बाद शुरुआती दौर में 10 से 15 हजार रुपये तक मिल जाते हैं। जैसे-जैसे इस फील्ड में एक्सपीरियंस बढता है और क्वॉलिटी निखरती है, सैलरी भी उसी रेश्यो में बढती चली जाती है।
जॉब ऑप्शंस
इंडिया में कोर्स करने के बाद जॉब की कोई कमी नहीं है। गवर्नमेंट और प्राइवेट हॉस्पिटल्स, नर्सिग होम में जॉब के ऑप्शन तो हैं ही, साथ ही आप अपना आई क्लीनिक, ऑप्टिकल लेंस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट आदि भी खोल सकते हैं। इसके अलावा कॉन्टैक्ट लेंस और ऑप्थेल्मिक लेंस इंडस्ट्री और विभिन्न डिपार्टमेंट्स के आई डिवीजन में वर्क कर सकते हैं। आंख के डॉक्टरों को ट्रेंड असिस्टेंट की जरूरत होती है, जो प्रोफेशनल तरीके से चश्मा, लेंस और अन्य नेत्र संबंधी इंस्ट्रूमेंट बना सकें। सरकारी रूल्स के मुताबिक ऑप्टिकल्स शॉप में केवल ट्रेंड ऑप्टीशियन को ही रखने का प्रॉविजन है। ग्लोबल करियर की वजह से आप अब्रॉड भी जा सकते हैं।
मेन इंस्टीट्यूट्स
-ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, दिल्ली
-जामिया हमदर्द, फैकल्टी ऑफ मेडिसिन, हमदर्द नगर, दिल्ली
-स्कूल ऑफ ऑप्टोमेट्री : गांधी नेत्र अस्पताल, अलीगढ, उत्तर प्रदेश
-स्कूल ऑफ ऑप्टोमेट्री : जनकल्याण नेत्र अस्पताल, लखनऊ
-सीतापुर आई हॉस्पिटल, सीतापुर
-वीबीएस पूर्वाचल यूनिवर्सिटी, उत्तरप्रदेश
-इंदिरागांधी इंस्टीटयूट ऑफ मेडिकल साइंस, पटना
-पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, पटना
-गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, पटियाला
-मेडिकल कॉलेज, अमृतसर
-ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्टोमेट्रिक साइंस, कोलकाता
Oral Healthके केयर-टेकर
फोर्ब्स ने डेंटल हाइजीनिस्ट को टॉप टेन की लिस्ट में रखा है। आने वाले समय में इसकी जॉब ग्रोथ 38 परसेंट तक रहेगी और जॉब डिमांड ग्लोबल रहेगी..
डेंटल हाइजीनिस्ट ओरल हेल्थ की देखभाल का स्पेशलिस्ट होता है। अगर आप इस फील्ड में जाकर करियर बनाना चाहते हैं, तो चांस कम नहीं हैं। अमेरिका ही नहीं, इंटरनेशनल लेवल पर सबसे ज्यादा जॉब इसी फील्ड में माने जा रहे हैं।
सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स
डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया, नई दिल्ली से रिलेटेड कुछ कॉलेजों से डेंटल मैकेनिक और डेंटल हाइजीन से जुडे सर्टिफिकेट या डिप्लोमा कोर्स कर सकते हैं। फॉरेन के मुकाबले इंडिया में अभी इसमें अटेंशन कम है, लेकिन ग्रोथ को देखते हुए अब लोग इस ओर रुख कर रहे हैं। अमेरिका, ऑस्टेलिया, यूके जैसे कंट्रीज में डेंटल हाइजीन को अच्छा करियर माना जाता है।
वर्क प्रोफाइल
डेंटल हाइजीनिस्ट डेंटिस्ट की हेल्प के साथ दांतों की सफाई, छिलाई, एक्सरे लेना तथा उन्हें डेवलप करना, इंस्टूमेंट्स को स्टरलाइज करना, डेंटल क्लीनिंग, स्केलिंग और पॉलिशिंग, डेंटल इंप्रेशन लेना आदि करता है। यह पेशेंट की मेडिकल हिस्ट्री, ब्लड प्रेशर और दूसरे जरूरी डिटेल भी चेक करता है।
स्किल्स
इसके लिए फिट एंड फाइन, गुड हेल्थ, हार्डवर्कर, चीजों को ध्यान से समझने वाला होना चाहिए। एक अच्छा डेंटल हाइजीनिस्ट ट्रीटमेंट के दौरान पेशेंट से कम्युनिकेशन करते हुए उन्हें पेन का अहसास नहीं होने देता। इसके पास साइंटिफिक नॉलेज के अलावा आर्टिस्टिक अप्रोच होना जरूरी है। यह एक तरह का साइंटिस्ट है, जो सभी तरह के मुंह के रोगों की रोकथाम, पहचान तथा ट्रीटमेंट द्वारा पेशेंट की हेल्प करता है।
एंप्लायमेंट ऑप्शंस
बदलती लाइफ स्टाइल में लोगों का खानपान बदल गया है। कम उम्र में ही लोगों को डेंटल प्रॉब्लम होने लगी है, जिसका ट्रीटमेंट कराने के लिए हम डेंटिस्ट के पास जाते हैं। एक्सपर्ट के अनुसार स्थिति यह है कि पॉपुलेशन के एवरेज रेश्यो में जितने डेंटिस्ट हाइजीनिस्ट की जरूरत है, उससे कहीं कम हैं। इस लिहाज से डेंटिस्ट के लिए हॉस्पिटल्स के डेंटल ट्रीटमेंट डिपार्टमेंट के अलावा प्राइवेट सेक्टर में भी काफी स्कोप बना हुआ है। वे एजुकेशन सेक्टर में भी किस्मत आजमा सकते हैं। वहां भी उनके लिए ऑप्शंस कम नहीं हैं। इसके अलावा नर्सिग होम्स, रिसर्च डिपार्टमेंट्स, फॉर्मास्युटिकल कंपनियों में भी करियर बना सकते हैं। वे डेंटल केयर से जुडी एजेंसीज, डिफेंस में भी वर्क कर सकते हैं। इसके अलावा चाहें तो कॉस्मेटिक डेंटिस्ट बनकर सेल्फ एम्प्लॉयमेंट का खुला ऑप्शन भी चुन सकते हैं। ओरल कैंसर इंटरनेशनल लेवल पर एक बडा खतरा बनकर सामने आ रहा है। ऐसे में ओरल हाइजीन पर स्पॉटलाइट पहले से कहीं अधिक हो गई है। डेंटल साइंस की तरफ रुझान होने की वजह से स्किलफुल हैंडलिंग और एक्युरेसी इस करियर में आपके लिए काफी हेल्पफुल हो सकते हैं। इंडिया में इसकी पढाई अधिकतर डेंटल कॉलेजेज में ही कराई जा रही है। कुछ इंस्टीट्यूट्स अलग से कोर्स भी कंडक्ट करा रहे हैं।
फ्यूचर है ब्राइट
इंडिया में डेंटल हाइजीनिस्ट नया करियर है। इस कारण इसके बढने के चांसेज सबसे ज्यादा हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि आज हर दूसरा व्यक्ति डेंटल डिजीज से ग्रसित है और उचित देखभाल के अभाव में उनकी डेंटल प्रॉब्लम्स बढ रही हैं। सरकारी और निजी प्रयास से अब जागरुकता बढ रही है और डेंटल डिजीज को भी लोग सीरियस लेने लगे हैं। इसके अलावा, इंडिया में ऐसी क्लास भी है, जिसके पास पैसे की कमी नहीं है। उनकी लाइफ स्टाइल भी बिंदास है। स्मार्ट दिखने के लिए काफी संख्या में ऐसे लोग डेंटल हाइजीनिस्ट के पास आ रहे हैं। अगर आप कुछ दिन एक्सपीरियंस लेकर खुद का क्लीनिक खोलते हैं और बेहतर वर्क से पेशेंट को सटिस्फाइड करते हैं, तो आपको दूसरे करियर फील्ड की अपेक्षा आगे बढने के चांसेज सबसे ज्यादा हैं। आने वाले सालों में इस फील्ड काफी स्कोप है, क्योंकि जिस स्पीड से लाइफ स्टाइल चेंज हो रही हैं, उसी स्पीड से डेंटल प्रॉब्लम्स भी बढ रही हैं।
Finance की प्लानिंग
फाइनेंस सेक्टर में अगले 10 सालों में जॉब ग्रोथ रेट 32 परसेंट तक बढने की उम्मीद है। ऐसे में करियर के लिहाज से यह बेस्ट ऑप्शन है..
ग्लोबलाजेशन से इंडियन इकोनॉमी में ही चेंज नहीं आया है, बल्कि इंडियन कॉरपोरेट सेक्टर ही बदल गया है। नई-नई जॉब सामने आ रही हैं। अगर आप भी कॉरपोरेट सेक्टर में करियर स्टैब्लिश करना चाहते हैं, तो फाइनेंशियल एक्सपर्ट बन शुरुआत कर सकते हैं। यहां करियर बनाने के कई ऑप्शन हैं। इसका कोर्स करके कहीं भी जॉब के लिए एडजस्ट हुआ जा सकता है। इसमें डिग्री या पीजी कोर्स कर लें तो करियर की राह आसानी से सहज हो जाती है।
पीजी डिग्री तक
फाइनेंशियल प्लानर बनने के लिए डिप्लोमा से लेकर मास्टर डिग्री तक के कोर्स हैं। इन कोर्सेज में फाइनेंशियल अकाउंटिंग और इकोनॉमिक्स पर मेन फोकस रहता है। इन कोर्सेज से चार्टर्ड अकाउंटेंट, कॉस्ट अकाउंटेंट, सीएस, एमबीए प्रोफेशनल्स को एक्स्ट्रा बेनिफिट मिलता है।
एलिजिबिलिटी
कॉमर्स बैकग्राउंड के स्टूडेंट्स के लिए यह गोल्डन फील्ड है, लेकिन अन्य स्ट्रीम के स्टूडेंट्स भी इसमें करियर बना सकते हैं। एंट्री के लिए मिनिमम क्वॉलिफिकेशन किसी भी स्ट्रीम में 50 परसेंट मार्क्स के साथ हायर सेकेंडरी पास होना जरूरी है। कोर्स में एंट्री मेरिट या एंट्रेंस बेस पर दी जाती है।
वर्क प्रोफाइल
फाइनेंशियल सर्विस से जुडे इस प्रोफेशनल का मेन वर्क ऑर्गेनाइजेशन के लिए मनी क्रिएट करना, कैश जनरेट करना और किसी भी इनवेस्टमेंट पर अधिक से अधिक रिटर्न दिलाना है। इसके साथ ही आगे की फाइनेंशियल प्लानिंग भी ये करते हैं। ये किसी भी कंपनी की बैलेंसशीट को एनालाइज करते हैं, ताकि फ्यूचर के लिए फाइनेंस प्लानिंग की जा सके।
जॉब आप्शंस
इंडिया दुनिया की तीसरी सबसे तेजी से बढती हुई मार्केट है। अर्नस्ट एंड यंग की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंडिया आईपीओ के मामले में दुनिया का पांचवां सबसे बडा कंट्री बन गया है। म्युचुअल फंड में भी इसकी ग्रोथ सराहनीय है और आने वाले तीन सालों में इस सेक्टर में 30 परसेंट की ग्रोथ देखी जा सकती है। फोर्ब्स के टॉप 50 माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूट्स में इंडिया के सात इंस्टीट्यूट जगह बनाने में सक्सेस हुए हैं। फाइनेंशियल आउटसोर्सिग सर्विस के बढने से टैलेंटेड प्रोफेशनल्स की उपलब्धता, ऑफशोर लोकेशन, बेहतर आउटसोर्सिग स्ट्रेटेजी आदि सभी में इजाफा हुआ है। हाल के वर्षो में जिस तरह से फाइनेंशियल केपीओ सेक्टर बढा है, उसने फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के लिए अपॉच्र्युनिटीज के नए रास्ते खोल दिए हैं।
मेन इंस्टीट्यूट्स
- दिल्ली यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली - अलीगढ मुस्लिम यूनिवíसटी, अलीगढ
- द इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट ऑफ इंडिया, दिल्ली
- देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी, इंदौर
- कुरुक्षेत्र यूनिवíसटी, हरियाणा
-यूनिवíसटी ऑफ लखनऊ, लखनऊ
जॉब सीन
इसके प्रोफेशनल्स को कारपोरेट फाइनेंस, इंटरनेशनल फाइनेंस, मर्चेट बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज, कैपिटल एंड मनी मार्केट, पोर्टफोलियो मैनेजमेंट, स्टॉक ब्रोकिंग, शेयर, रजिस्ट्री, क्रेडिट रेटिंग आदि में जॉब मिलती है। गवर्नमेंट बैंक्स के अलावा प्राइवेट और फॉरेन बैंक्स की एंट्री होने से फाइनेंशियल एक्सपर्ट, फाइनेंशियल एनालिस्ट, फाइनेंशियल प्लानर आदि की डिमांड बढी है। एचडीएफसी, आईसीआईसीआई, विदेशी बैंक जैसे- आरबीएस, सिटीगोल्ड वेल्थ मैनेजमेंट, सिटी बैंक, डच बैंक, एचएसबीसी आदि में बहुत ऑप्शंस हैं। इनवेस्टमेंट फर्म जैसे- डीएसपी मैरील लाइंच, कोटक सिक्योरिटीज, आनंद राठी इंवेस्टमेंट और जे.एम. मार्गन स्टेनली में भी जॉब के अवसर हैं। इस फील्ड में एक बार पैर जम जाएं, तो मनी प्रॉब्लम अपने आप खत्म हो जाती है। सैलरी क्वॉलिटी वर्क, एक्सपीरियंस और इंडस्ट्री पर डिपेंड करती है।
आईटी है एवरग्रीन
सॉफ्टवेयर इंजीनियर और कंप्यूटर सिस्टम एनालिस्ट की जॉब ग्रोथ रेट आने वाले 10 सालों में 30 परसेंट और 22 परसेंट तक रहने की संभावनाएं हैं..
आईटी सेक्टर में इंडियन यूथ हर जगह अपना परचम लहरा रहे हैं। इससे रिलेटेड कोई भी ऐसी बडी कंपनी नहीं है, जिसमें इंडियन टैलेंट का योगदान न हो। यह सेक्टर हमेशा से टैलेंट को अट्रैक्ट करने वाला रहा है। वैसे तो इससे रिलेटेड सभी ब्रांचेज में जॉब की कमी नहीं है, लेकिन सॉफ्टवेयर इंजीनियर और सिस्टम एनालिस्ट की डिमांड मार्केट में कुछ ज्यादा ही दिखाई दे रही है।
सॉफ्टवेयर इंजीनियर
सॉफ्टवेयर दो तरह के होते हैं। एप्लीकेशन और सिस्टम। इन दोनों सॉफ्टवेयर्स की हेल्प से कई तरह की प्रोग्रामिंग लैंग्वेज डेवलप की जाती हैं, जिनका यूज विभिन्न प्रकार के वर्क में किया जाता है।
फोकस मार्केट डिमांड पर
सॉफ्टवेयर इंजीनियर मार्केट की डिमांड के अनुसार सॉफ्टवेयर्स की डेवलपिंग में हेल्प करते हैं। किस सॉफ्टवेयर में क्या कमी है, किसमें क्या नई चीज जोडनी है, ये काम भी इन्हीं के जिम्मे रहता है। किसी भी प्रोग्राम के नए वर्जन में भी इनकी भूमिका आगे ही रहती है।
जॉब ऑप्शंस
आईटी को लेकर स्टूडेंट्स का रुझान जिस तरह बढ रहा है, उसे देखते हुए इसके प्रोफेशनल्स के लिए जॉब की कोई कमी आने वाले कई वर्षो तक नहीं होगी। कंप्यूटर का इस्तेमाल बढने से कई नए तरह के सॉफ्टवेयर बनाए जाने की जरूरत रोज ही महसूस की जाती है। इस वर्क में हेल्पफुल होते हैं, सॉफ्टवेयर इंजीनियर। इससे समझा जा सकता है कि इनकी डिमांड तकरीबन सभी फील्ड में है।
ऑलवेज अपडेट
एक अच्छा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना है, तो हमेशा इस फील्ड में अपडेट रहना पडेगा। कोई भी नई चीज आए, उसे सीखें। किस सॉफ्टवेयर में कहां, क्या कमी है, उसे जज करें और कुछ नया करने की कोशिश करते रहें। जो लोग कुछ इस तरह की अप्रोच रखते हैं, यह फील्ड उन्हीं के लिए है।
सिस्टम एनालिस्ट
सिस्टम एनालिस्ट की डिमांड भी कम नहीं है। कंट्री में कई नए तरह के कंप्यूटर बनाने की प्रक्रिया भी चल रही है। आपसी कॉम्पिटिशन के चलते कंपनियां भी नए-नए तरह के कंप्यूटर बना रही हैं। ऐसे में इसके स्पेशलिस्ट्स के पास जॉब की कमी आने वाले दो-तीन दशकों तक कम होती नहीं दिखाई देती।
इनोवेशन
सिस्टम एनालिस्ट नए कंप्यूटर्स को डेवलप करने का प्लान बनाता है। वह देखता है कि डिमांड के अनुसार कंप्यूटर के आकार और उसकी क्वॉलिटी में किस तरह के चेंजेज करने जरूरी हैं। इसका फोकस कंप्यूटर की वर्किग कंडीशन्स और उसके अपीयरेंस दोनों पर रहता है।
जॉब आप्शंस
सिस्टम एनालिस्ट की डिमांड गवर्नमेंट और प्राइवेट दोनों ही सेक्टर्स में है। मार्केट में जिस तरह से कॉम्पिटिशन का ट्रेंड आया है, वह इसके प्रोफेशनल्स के लिए गोल्डन है। इसकी अच्छी नॉलेज है तो आईटी सेक्टर की किसी भी बडी कंपनी के साथ जुडकर वर्क कर सकते हैं। खुद का कारोबार भी कर सकते हैं।
स्किल्स
कंप्यूटर की फील्ड में हो रहे सभी अपडेट की पूरी तरह नॉलेज हो। कस्टमर की बात को समझने की काबिलियत और अपनी कम्युनिकेशन स्किल से उसे सटिस्फाइड करने की क्वॉलिटी। मार्केट में कंप्यूटर से रिलेटेड प्रोडक्ट्स की सप्लाई, इसकी जानकारी जरूरी है।
कोर्स
इन दोनों से रिलेटेड कई तरह के कोर्स विभिन्न इंस्टीट्यूट्स द्वारा चलाए जा रहे हैं। आप किसी भी अच्छे इंस्टीट्यूट से क्वॉलिटी कोर्स करके इस फील्ड में एंट्री कर सकते हैं।
करियर का बैकबोन
आज आईटी सेक्टर में सबसे अधिक प्रोफेशनल्स कोर्स कर रहे हैं और सभी को जॉब्स भी मिल रही हैं। मुख्य वजह यह है कि इंडिया में लगातार कंप्यूटराइजेशन हो रहा है। यही कारण है कि एक समय अमेरिका की सिलिकॉन वैली को इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में टॉप माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षो में अमेरिका की आईटी बादशाहत को किसी ने टक्कर दी है, तो वह भारत है। आज भारत आईटी सेक्टर में दुनिया के टॉप कंट्रीज में शुमार किया जाता है। ग्लोबल मंदी में सबसे अधिक प्रभावित होने के बावजूछ पिछले कुछ सालों में भारतीय आईटी सेक्टर में फास्ट ग्रोथ होने के कारण जॉब्स के ऑप्शन तेजी से बढे हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारतीय आईटी और आईटीईएस सेक्टर में आने-वाले समय में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और सिस्टम एनालिस्ट हॉट रह सकता है।
न्Audiologist में करियर
अगर आप 37 परसेंट जॉब ग्रोथ रेट वाले सेक्टर में सर्विस करना चाहते हैं तो ऑडियोलॉजी बेस्ट ऑप्शन है..
अगर आप किसी कारण डॉक्टर नहीं बन पाए हैं तो ऑडियोलॉजिस्ट बनकर इस फील्ड में एंट्री कर सकते हैं। बदलती लाइफ स्टाइल में साउंड पॉल्युशन तेजी से बढता जा रहा है, जिसके चलते कानों की प्रॉब्लम्स वाले पेशेंट्स की संख्या बढ रही है। इनके ट्रीटमेंट में ऑडियोलॉजिस्ट हेल्प करते हैं। एसोचैम और इसी तरह की दूसरी रिपोर्ट्स के अनुसार आने वाले सालों में कम से कम एक लाख से भी अधिक ऑडियोलॉजिस्ट की हमें जरूरत पडेगी।
ऑडियोलॉजी है क्या?
बोलने और सुनने से जुडी कमियों की स्टडी को ऑडियोलॉजी कहते हैं। इसके अंतर्गत यह जानने का प्रयास किया जाता है कि किन कारणों से यह प्रॉब्लम आ रही है।
कई हैं कोर्स
इस फील्ड में आप बैचलर ऑफ स्पेशल एजुकेशन, हियरिंग इंपेयरमेंट, बीएससी इन ऑडियोलॉजी, स्पीच एंड लैंग्वेज, एमएससी, स्पीच पैथोलॉजी एंड ऑडियोलॉजी कोर्स के साथ कई सर्टिफिकेट कोर्स भी कर सकते हैं।
ऑडियोलॉजी एंड स्पीच थेरेपी में तीन साल की डिग्री लेने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन किया जा सकता है। जो लोग डिग्री या डिप्लोमा नहीं ले सकते हैं वे सर्टिफिकेट कोर्स कर सकते हैं, जिसकी अवधि 6 माह है। इस कोर्स में एनाटॉमी काउंसिलिंग, हियरिंग डिस्ऑर्डर, न्यूरोलॉजी एंड न्यूरो साइकोलॉजी, साइकोलॉजी स्टैटिस्टिक्स जैसे सब्जेक्ट स्टूडें्स को पढाए जाते हैं।
एलिजिबिलिटी
अगर आपको इस फील्ड में जाकर करियर बनाना है, तो बायोलॉजी सब्जेक्ट से हायर सेकेंडरी पास होना जरूरी है। इस फील्ड से रिलेटेड कोर्स करना चाहते हैं तो आपको कॉम्पिटिशन का सामना एंट्री लेवल पर ही करना पडेगा।
वर्क प्रोफाइल
ये पेशेंट के बोलने और सुनने में आ रही प्रॉब्लम का पता लगाता है और उसे ठीक करने की हर संभव कोशिश करता है। इसकी जांच तीन तरीकों से की जाती है- ऑडियोमेट्री टेस्ट, इंपेंडेंस टेस्ट और बेरा टेस्ट। कितने पॉवर और कौन सा हियरिंग ऐड पेशेंट के लिए फिट रहेगा, इसका डिसीजन भी यही लेता है। पेशेंट को तरह-तरह से बोलने के लिए भी यह मोटिवेट करते हैं। यह देखते हैं प्रॉब्लम का मेन बेस कहां पर है। एक बार उसे पकड लेते हैं तो आगे का काम खुद ब खुद आसान हो जाता है।
जॉब राडार
ऑडियोलॉजिस्ट गवर्नमेंट और प्राइवेट हॉस्पिटल्स, चाइल्ड डेपलपमेंट सेंटर्स, प्री स्कूल, काउंसिलिंग सेंटर्स, फिजिकल मेडिसिन एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर्स, एनजीओ के अलावा ऑडियोलॉजी एंड स्पीच थेरेपी से रिलेटेड कोर्स करने के बाद खुद का क्लीनिक भी खोल सकते हैं। ऑडियोलॉजिस्ट की सैलरी 15 हजार से शुरू होती है, जो एक्सपीरियंस के साथ बढती जाती है। अगर इसके स्पेशलिस्ट के रूप में आपको विदेश में काम करने का चांस मिल जाता है, तो सैलरी इंडिया की तुलना में कई गुना तक बढ जाती है।
मेन इंस्टीट्यूट्स
-ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली
-आईपी यूनिवíसटी, दिल्ली
-अली यावरजंग नेशनल इंस्टीट्यूट फार द हियरिंग हैंडिकैप्ड, बांद्रा, मुंबई
-ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग, मैसूर यूनिवíसटी, बैंगलुरु
-पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ
-जे एम इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग, इंद्रपुरी, केशरीनगर, पटना
-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एजुकेशन, पटना
-इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच एंड हियरिंग, बैंगलुरु
-उस्मानिया यूनिवíसटी, हैदराबाद
फ्यूचर का Calculation
फोर्ब्स ने एक्चुरियल साइंस को भी टॉप टेन में शामिल किया है। आने वाले सालों में इसमें जॉब ग्रोथ रेट 27 परसेंट तक हो सकती है..
इंश्योरेंस के जोखिम और प्रीमियम का कैल्कुलेशन कर फ्यूचर में अमाउंट की सिचुएशन क्या होगी, यह बताने का काम एक्चुरियल साइंस का स्पेशलिस्ट ही कर सकता है। सबसे पहले इसकी जरूरत भारतीय जीवन बीमा निगम, एलआईसी में महसूस की गई थी। आज बैंक, स्टॉक एक्सचेंज, गवर्नमेंट एवं प्राइवेट फर्म्स सभी को इसकी आवश्यकता है।
वर्क प्रोफाइल
इस फील्ड के प्रोफेशनल डेथ, डिजीज, एक्सीडेंट और डिसएबिलिटी आदि के दौरान होने वाले फाइनेंशियल रिस्क का पास्ट एवं फ्यूचर के बेस पर इवैल्यूएशन करते हैं। इसके लिए पुराने ट्रेंड और मैथमेटिक्स और स्टेटिस्टिक्स की हेल्प ली जाती है।
कई तरह के कोर्स
अगर आप इस फील्ड में जाकर करियर बनाना चाहते हैं, तो कोर्स के कई ऑप्शन आपके पास मौजूद हैं। इसमें आप बीए, बीएससी, पीजी डिप्लोमा इन सर्टिफाइड रिस्क एंड इंश्योरेंस मैनेजमेंट, कोर्स ऑफ इंश्योरेंस एजेंट, पीजी डिप्लोमा इन इश्योरेंस साइंस, पीजी डिप्लोमा इन इंश्योरेंस एंड फाइनेंशियल सर्विस जैसे कोर्स कर सकते हैं। इन कोर्सेज से आपको इस फील्ड की बारीकियां मालूम चल जाएंगी, जो आगे बहुत काम आती रहेंगी।
एलिजिबिलिटी
ग्रेजुएट डिग्री के कोर्स में एडमिशन के लिए मैथ्स या स्टैटिस्टिक्स में कम से कम 85 परसेंट मार्क्स के साथ बारहवीं पास होना जरूरी है। इंग्लिश की अच्छी नॉलेज का बेनिफिट भी आपको मिलेगा।
पीजी डिप्लोमा, मास्टर्स डिग्री और सर्टिफिकेट कोर्स के लिए मैथ्स/स्टैटिस्टिक्स/ इकोनॉमेट्रिक्स सब्जेक्ट से ग्रेजुएट की डिग्री होनी चाहिए। अच्छी कम्युनिकेशन स्किल भी सेक्टर में आगे बढाने का काम करेगी।
मेन इंस्टीट्यूट्स -इंस्टीट्यूट ऑफ सर्टिफाइड रिस्क एंड इंश्योरेंस मैनेजर्स, हैदराबाद
-कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज, दिल्ली यूनिवर्सिटी, दिल्ली
-अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ
-बिडला इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
-यूनिवर्सिटी ऑफ कल्याणी, पश्चिम बंगाल
-एमिटी स्कूल ऑफ इंश्योरेंस एंड एक्चुरियल साइंस, नोएडा
जॉब ऑप्शंस
इंडिया में इसका स्कोप काफी है, क्योंकि ट्रेंड प्रोफेशनल्स और इंस्टीट्यूट कम हैं। अगर आपकी इंग्लिश अच्छी है, तो आप फॉरेन में जाकर बेहतर कमाई कर सकते हैं। इन प्रोफेशनल्स की डिमांड गवर्नमेंट और प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियों के साथ टैरिफ एडवाइजरी कमिटी, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (आईआरडीए), सोशल सिक्योरिटी स्कीम, फाइनेंशियल एनालिसिस फर्म में भी है। स्पेशलिस्ट्स के अनुसार, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में इस फील्ड से जुडे ट्रेंड लोगों की कमी होने से वे भारत अपने काम को आउटसोर्स कर रही हैं। बीपीओ कंपनी में भी जोखिम का विश्लेषण करने के लिए एक्चुअरि प्रोफेशनल्स की बहाली की जा रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले तीन वर्षो में इंडिया में लगभग 30 हजार से अधिक ट्रेंड प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी। अगर आपका इंट्रेस्ट इस फील्ड में है तो करियर को ग्लोबल टच दे सकते हैं।
एक्सरसाइज से Treatment
जिस तरह से लाइफ स्टाइल बदल रही है, कई तरह की डिजीज भी आ गई हैं। यही कारण है प्रोफेशनल्स फिजियोथेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट का जॉब ग्रोथ रेट 33 परसेंट और 39 परसेंट तक रहने की संभावना है..
फिजियोथेरेपी जिसे हम फिजिकल थेरेपी के नाम से भी जानते हैं, तेजी से इसमें डिजीजेज का ट्रीटमेंट एक्सरसाइज से किया जाता है। मेडिकल साइंस की यह बहुत इंपॉर्टेट ब्रांच बन गई है। एक फिजियोथेरेपिस्ट का मेन वर्क फिजिकल वर्क्स का इवैल्यूएशन, मेंटिनेंस और रिस्टोरेशन करना है। यह वाटर थेरेपी, मसाज आदि अनेक प्रॉसेस से पेशेंट का ट्रीटमेंट करते हैं। फिजियोथेरेपी कमजोर पडते मसल्स और नसों को मजबूत करता है। अब इसकी जरूरत कॉर्डियो रिलेटेड डिजीज से लेकर प्रेग्नेंसी तक में महसूस की जा रही है। इस फील्ड में स्पेशलाइजेशन की भी फैसेलिटी है।
ऑक्युपेशनल थेरेपी
इसी से मिलता-जुलता और सहायक है ऑक्यूपेशनल थैरेपी। मानसिक, शारीरिक और अन्य वजहों से डैमेज पैशेंट को ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट नई लाइफ देता है। वह इसे मॉरल सपोर्ट करने के साथ ही फिजिकल और मेंटली स्ट्रॉन्ग बनाने में भूमिका निभाता है। इसके लिए वह कंप्यूटर के अलावा और कई माडर्न टेक्निक यूज करता है। अगर आप ऑक्युपेशनल थेरेपी से संबंधित डिग्री या डिप्लोमा कोर्स करते हैं तो आपके लिए गोल्डन अपॉच्र्यूनिटीज मौजूद हैं।
स्किल्स
एक फिजियोथेरेपिस्ट का कम्युनिकेशन में परफेक्ट होना जरूरी है, क्योंकि यह प्रोफेशन आम लोगों से जुडा है। इसके अलावा उसका पेशेंस, लॉन्ग टर्म वर्क कैपेसिटी, बेटर मेमोरी और लोगों की फीलिंग्स को समझने वाला होना चाहिए।
फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स
सभी हॉस्पिटल्स में फिजियोथेरेपिस्ट का होना जरूरी है। एम्स, एम्स ट्रॉमा सेंटर, सफदरजंग, आरएमएल हो या अपोलो, गंगाराम, मैक्स सहित सभी हॉस्पिटल्स में लगभग हर डिपार्टमेंट में फिजियोथेरेपिस्ट को अप्वॉइंट किया जा रहा है।
जॉब ऑप्शन्स
हॉस्पिटल्स, नर्सिंग होम, रीहैबिलिटेशन सेंटर्स, प्राइवेट ऑफिस, प्राइवेट क्लीनिक, आउट पेशेंट क्लीनिक, कम्युनिटी हेल्थ केयर, स्पेशल स्कूलों, सीनियर सिटीजन सेंटर्स, स्पोर्ट्स सेंटर, फॉरेन, एनजीओ आदि।
इंस्टीट्यूट वॉच
-अमर ज्योति इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोथेरेपी, नई दिल्ली
-एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोथेरेपी, नोएडा
-इंडियन स्पाइनल इंज्यूरीज सेंटर, नई दिल्ली
-आईपी यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली
-फैकल्टी ऑफ अलाइड हेल्थ साइसेंज, जामिया हमदर्द यूनिवसिर्टी, नई दिल्ली
-पंडित दीन दयाल उपाध्याय इंस्टीट्यूट फॉर द फिजिकल हैंडीकैप्ड, नई दिल्ली
मेन कोर्स
कोई अच्छा कोर्स करके इस फील्ड में एंट्री की जाए तो बेटर रहेगा। इसके कोर्स में डिजीज की पहचान, ट्रॉमा, फिजिकल एंड मेंटल कंडीशन को पहचानने और उनकी रिकवरी को लेकर उठाए जाने वाले स्टेप्स की बारीकियां समझाई जाती हैं। साइंस स्ट्रीम से रिलेटेड स्टूडेंट्स इसमें करियर बना सकते हैं। इसके दो मेन कोर्स हैं: बीपीटी और एमपीटी। इन दोनों ही कोर्सेज में अंतिम छ: माह स्टूडेंट को किसी हॉस्पिटल में इंटर्नशिप कराई जाती है। एक प्रैक्टिसिंग फिजियोथेरेपिस्ट के रूप में किसी हॉस्पिटल या क्लीनिक में वर्क करने के लिए कम से कम बीएससी डिग्री होनी जरूरी है। हायर सेकेंडरी पास स्टूडेंट इसका कोर्स कर सकते हैं। इसके लिए उनका फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और इंग्लिश में कम से कम 50 परसेंट मार्क्स होना जरूरी है। किसी भी इंस्टीट्यूट में एडमिशन लेना है, तो इसके लिए एंट्रेंस एग्जाम देना होगा।
जेआरसी टीम
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