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    बुनकरों के लोकल कपड़े बने ग्लोबल

    By JagranEdited By:
    Updated: Sun, 18 Apr 2021 10:15 PM (IST)

    बाटम पारंपरिक हस्तकरघे पर ही की जाती है कपड़े की बुनाई बढ़ी कमाई वाचस्पति मिश्

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    बुनकरों के लोकल कपड़े बने ग्लोबल

    बाटम

    पारंपरिक हस्तकरघे पर ही की जाती है कपड़े की बुनाई, बढ़ी कमाई वाचस्पति मिश्र

    सिमडेगा:जिले में पारंपरिक ढंग से बने बीरू कपड़े लोकल से ग्लोबल होने लगे हैं। यहां बने कपड़ों की डिमांड अब विदेशों तक हो रही है। बीरू कपड़े से बने गमझे एवं साड़ी समेत मास्क,जैकट, टीशर्ट आदि भी बाजार में ट्रेंड कर रहे हैं। विदित हो कि

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    लाल व सफेद रंग के मिश्रण से बने ये गमझे-साड़ियां स्थानीय आदिवासी समाज

    की महिलाओं के परिधान रहे हैं।खासकर ही अक्सर विभिन्न उत्सवों के मौके पर

    महिलाएं व पुरुष ऐसे ही परिधान पहनकर नृत्य करते हैं। स्थानीय बाजार में तो

    ये गमझे 250 से लेकर 400 तो साड़ियां भी 600-1000 रुपये तक में बिकते हैं।वहीं

    विदेशों में इस प्रकार के गमझे व साड़ियां अधिक दामों पर बिकते हैं। विदेशों में ये कपड़े भले ही नए फैशन में ट्रेंड कर रहे हों, मगर जिले में आज भी लोग पारंपरिक हस्तकरघा मशीन से ही कपड़े बुनते हैं।जिले के केरसई प्रखंड के बासेन पंचायत के

    गुझरियां गांव सदियों से बुनकरों का गांव रहा है ।गांव में पौ फटते ही हस्तकरघा की खट-खट सुनाई देने लगती है ।गांव के लोग सुबह से शाम तक हस्तनिर्मित कपड़े बनाने में जुट जाते है। घर की औरतें धागा को सुलझाने का काम करती हैं, तो घर के मर्द उन धागों को लकड़ी के बने हस्तकरघा के सहारे खूबसुरत कपड़ो का रूप देने में लग जाते है। सूती धागों से निर्मित ये कपड़े आज झारखंड की माटी की सुगंध विदेशों तक फैला रहे हैं। गांव के हीं एक व्यक्ति मिठ्ठू मेहर ने सभी ग्रामीणो से बने कपड़े इकठ्ठे कर इसे रांची व दिल्ली तक थोक बाजार में पंहुचाने का काम करते हैं । जहां से विदेशों में भी ये कपड़े सप्लाई किए जाते हैं। उसने बताया कि सबसे ज्यादा बीरू कपड़े की मांग है। ये कपड़े फैशन में शामिल होने लगे हैं।गांव के हाट बाजार में बिकने वाले ये पारंपरिक कपड़े अब नए डिजाइन के साथ अपनी अलग पहचान बनाने लगे हैं।इधर इंस्टाग्राम पर पर जोहारग्राम नाम से एक पेज बनाया गया है।जिस पर इन कपड़ो से बने सामग्री डिजाइनर कपड़ों को स्थानीय मॉडलो के सहारे प्रदर्शित कर ऑनलाइन भी इसकी बिक्री शुरू की जा रही है। इधर गुझरिया गांव में अभी करीब 15 घरों में कपड़े बुनने का काम किया जा रहा है। पारंपरिक लकड़ी के हस्तकरघा की वजह से डिमांड के अनुसार कपड़े तैयार करने में इन्हें परेशानी आ रही है। प्लाश मार्ट के तहत की जाती है ब्रांडिग

    सिमडेगा:झारखंड राज्य आजीविका मिशन सोसायटी के डीपीएम निशिकांत नीरज ने बताया कि जिले में बुनकरों के द्वारा बनाए गए उत्पादों को प्रमोट करने व मंच देने के लिए लगातार कार्य किए जा रहे हैं। बुनकरों के द्वारा बनाए गए कपड़े को पलाश मार्ट के तहत भी प्रचारित व प्रसारित किया जा रहा है।