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    जर्मन मिशनरियों ने निकाली पहली पत्रिका

    By JagranEdited By:
    Updated: Thu, 03 May 2018 08:21 AM (IST)

    रांची : भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में राची से प्रकाशित 'घरबंधु' शायद पहली पत्रिका है, जो 1872 से आज तक रांची में प्रकाश्तिा हो रही है। इसका प्रकाशन जर्मन मिशनरियों ने शुरू किया था।

    जर्मन मिशनरियों ने निकाली पहली पत्रिका

    रांची : भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में राची से प्रकाशित 'घरबंधु' शायद पहली पत्रिका है, जो 1872 से अनवरत निकल रही है। 1872 में ही राची में लिथो प्रेस लगाया गया। दो नवंबर, 1845 को ही यहा जर्मन मिशनरियों के कदम पड़े और कुछ सालों में यहा ¨हदी और स्थानीय भाषा सीखकर पत्रिका का प्रकाशन शुरू कर दिया।

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    इस पत्रिका का कहीं जिक्र नहीं होता है। चूंकि इसका मूल उद्देश्य धर्म प्रचार करना था, लेकिन इसे प्राचीन पन्ने पलटने से पता चलता है कि इसमें तार के समाचार भी प्रकाशित होते थे। एक दिसंबर 1872 को इसका पहला अंक आया था। पहले यह पाक्षिक था। बाद में इसे मासिक कर दिया गया और अब यह मासिक ही निकल रही है। पहले इसका टैग लाइन था-चुटिया नागपुर की एवं जेलिकल मंडलियों के लिए और अब गोस्सनर चर्च की मासिक ¨हदी पारिवारिक पत्रिका हो गया है। हालाकि गोस्सनर चर्च से करीब अस्सी हजार से ऊपर लोग जुड़े हैं, लेकिन चार-पाच हजार ही प्रकाशित होती है। यहा 1882 से अंक उपलब्ध हैं। इन अंकों में धर्म संबंधी प्रचार सामग्री ¨हदी में प्रकाशित होती थी। इसके साथ तार के समाचार, स्थानीय समाचर प्रकाशित होते थे। 1901 के अंकों में चीन की लड़ाई का जिक्र मिलता है। इसके साथ ही आस-पास की खबरें भी प्रकाशित होती थीं। जरूरी नहीं कि सभी खबरें चर्च की हों। सन् 1872 से निकल रही पत्रिका कभी बंद नहीं हुई।

    इसके बाद रांची से 1924 में छोटानागपुर पत्रिका निकली। यह मासिक थी। यह 32 पेज की थी। इसके संपादक मामराज शर्मा थे। मैनेजर शुक्रा उरांव। इसका कार्यालय अपर बाजार में था और मुद्रण बाबूलाल गुप्त द्वारा लक्ष्मी प्रेस गया में होता था। रांची से एक पत्रिका 'आदिवासी' जो आजादी के तत्काल बाद निकली। इसे प्रसिद्ध साहित्यकार राधाकृष्ण संपादित करते थे। यह भी पत्रिका लंबे समय तक चली। बाद में बंद हो गई थी, लेकिन अब फिर से सरकार प्रकाशित कर रही है। जिला सूचना एवं जनसंपर्क से यह हर सप्ताह प्रकाशित हो रही है। इस पत्रिका ने अपने समय में झारखंड की कला-संस्कृति साहित्य को प्रकाश में लाया। सैकड़ों आदिवासी लेखक पैदा हुए। समय-समय पर इसके विशेषांक निकले, जो आज भी किसी दस्तावेज से कम नहीं हैं। आज तो पूछना ही नहीं है। कई पत्र-पत्रिका निकल रहे हैं।