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    यहां शिव से पहले होती है नाग की पूजा, फहराया जाता है तिरंगा

    By Sachin MishraEdited By:
    Updated: Fri, 07 Jul 2017 03:19 PM (IST)

    जब देश आजाद हुआ तो यहां पर तिरंगा फहराया गया। इस पहाड़ को स्वाधीनता पूर्व फांसी टुंगरी कहा जाता था।

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    यहां शिव से पहले होती है नाग की पूजा, फहराया जाता है तिरंगा

    संजय कृष्ण, रांची। रांची के पहाड़ी मंदिर से कुछ अनूठी परंपराएं जुड़ी हैं। जैसे, यहां आदिवासी सबसे पहले नाग देवता की पूजा करते हैं। इसके बाद पहाड़ी बाबा का दर्शन करते हैं। झारखंड नागभूमि है। नाग भी शिव का ही अलंकार हैं। आदिवासी के लिए नाग महत्वपूर्ण हैं। सो, यहां पहले नागगुफा में नाग का दर्शन करने के बाद वे पहाड़ी बाबा का दर्शन करते हैं।

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    बाकी लोग पहले पहाड़ी बाबा पर जलार्पण करने के बाद नाग की पूजा करते हैं। आदिवासी बहुत प्राचीन काल से ही नाग देवता की पूजा करते आ रहे हैं। नाग देवता रांची के नगर देवता भी हैं। नाग देवता नागवंशियों के कुल देवता भी हैं। सावन में भी पहले नाग देवता की पूजा आदिवासी करते हैं। इसके बाद बाबा पहाड़ी की पूजा शुरू होती है।

    फहराया जाता है तिरंगा:

    यही नहीं, यह ऐसा मंदिर है, जहां 15 अगस्त व 26 जनवरी को तिरंगा फहराया जाता है। इसलिए, यहां विशाल तिरंगा भी स्थापित हो गया है। जब देश आजाद हुआ तो यहां पर तिरंगा फहराया गया। इस पहाड़ को स्वाधीनता पूर्व फांसी टुंगरी कहा जाता था। हालांकि इसका वास्तविक नाम रांची बुरू है। यहां कई स्वतंत्रता सेनानियों को अंगरेजों द्वारा फांसी दी गई।

    ऊंचाई तीन सौ फीट:

    पहाड़ी बाबा 300 फीट की ऊंचाई पर हैं। उनका दर्शन करने के लिए भक्तों को 468 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस पहाड़ी का भू-भाग लगभग 26 एकड़ में फैला हुआ है। पहाड़ी मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। पहाड़ी स्थित नाग देवता का स्थल 55 हजार साल पुराना बताया जाता है। 1905 के आसपास ही पहाड़ी के शिखर पर शिव मंदिर का निर्माण हुआ था। 1908 में पालकोट के राजा से इस पहाड़ी को नगरपालिका के एक अंग्रेज अधिकारी ने मात्र 11 रुपये में ले लिया था। हस्तांतरण आलेख में यह शर्त लिखा हुआ था कि पहाड़ी पर स्थित मंदिर सार्वजनिक होगा। 1917 में एमजी हेलेट द्वारा प्रकाशित बिहार-उड़ीसा गजेटियर में रांची पहाड़ी की चोटी पर शिव मंदिर का उल्लेख है।

    बना है आकर्षण का केंद्र

    मंदिर प्रांगण से रांची शहर का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है। पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी यह मंदिर महत्वपूर्ण है, क्योंकि पूरी पहाड़ी पर मंदिर परिसर के इर्द-गिर्द विभिन्न भांति के हजार से अधिक वृक्ष हैं। साथ ही यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का अनुपम सौंदर्य भी देखा जा सकता है।

    हिमालय से पुरानी है रांची पहाड़ी

    रांची बुरू हिमालय से भी पुराना है। इस पहाड़ी का अध्ययन करने के लिए सौ साल पहले तक वैज्ञानिक आते थे। शोध से ही पता चला कि यह पहाड़ प्रोटेरोजोइक काल का है, जिसकी आयु लगभग 4500 मिलियन वर्ष है। रांची शहर का यह एकलौता पहाड़ है, जो शहर के अन्य पहाड़ बरियातू हिल या टैगोर हिल से भी लाखों साल पुराना है। इसकी बनावट भी दूसरे पहाड़ों से भिन्न है। रांची के पर्यावरणविद् डॉ. नीतीश प्रियदर्शी का कहना है कि यह पहाड़ मुख्यत: कायांतरित शैल चट्टानों से बना है और यह धारवाड़ काल का है, जिसकी आयु 3500 मिलियन है। कुछ भूवैज्ञानिकों का मानना है कि इस पहाड़ की आयु 980 से 1200 मिलियन वर्ष है। इस पहाड़ के चट्टान का भौगोलिक नाम ‘गानेटिफेरस सिलेमेनाइट शिष्ट’ है।

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