रांची, (संजय कृष्‍ण)। जिस अस्पताल में बिरजू महाराज पैदा हुए, उसमें इनका छोड़ लड़कियां ही पैदा हुईं। तब, लोगों ने कहा, इतनी सारी लड़कियों के बीच एक लड़का हुआ है तो क्यों न उनका नाम बृजमोहन मिश्र रख दिया जाए, और यही नाम रख दिया गया। नाम की लंबाई को घर वालों ने थोड़ा घटा दिया। फिर बिरजू पुकारने लगे। यही नाम चस्पा हो गया- पंड‍ित बिरजू महाराज।

अमीरी भी देखी, गरीबी के द‍िन भी

सोमवार को जब रैडिशन में उनका दरश-परस हुआ तो 80 बसंत की ओर बढ़ते पंड‍ित बिरजू महाराज अपने बचपन की यादों में चले गए। उम्र का असर नहीं था। स्मृति लाजवाब थी। यादों के चिराग जब जले तो वह जमाना भी याद आया, जब राजा-महाराजा के दिए हुए पूर्वजों के पास चार-चार घोड़े हुआ करते थे। सिपाही हुआ करते थे। धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। सबके लिए अलग-अलग बग्घी हुआ करती थी। लेकिन समय ने ऐसा करवट लिया कि खाने के लिए भी लाले पड़ गए। साड़‍ियों को जलाकर उसमें से सोने-चांदी के तारों को बेचकर राशन आने लगा था।

ऐसे लय ताल की हुई जानकारी

कहते हैं, पिता अछन महाराज लखनऊ घराने के नर्तक थे। रामपुर-रायगढ़ महाराज के यहां पिता रहे। रायगढ़ महाराज के यहां दो साल पिता रहे। रायगढ़ महाराज खुद तबला बजाते थे। उनके साथ मैं भी था। ढाई साल की उम्र से ही पिता के संग-साथ हो लिए और जहां जाते, वहां यह भी जाते। पिता के नृत्य को देखते-समझते। यह काम अम्मा का था। अम्मा कहती हैं, बच्चे को भी साथ ले जाओ। उनकी वजह से जो आंखों-कानों ने सुना उसे आत्मसात कर लिया। यहीं से ताल व लय की जानकारी हुई।

501 रुपये देकर प‍िता का शार्ग‍िद बन गया

पिता ने कहा, लड़का तो अच्छा है, लयदार है। जब लोग महफिल में पिता को इनाम देते तो पिता मुझे गोद में उठा लेते और फिर इनाम लेते। ऐसे दौर भी देखे जब उबड़-खाबड़ जमीन पर दरी बिछ गई और उसी दरी पर कार्यक्रम पेश किया। जब पिता का शागिर्द बनना चाहा तो पिता ने कहा, नजराना लगेगा। तब, कहीं से बीस तो कहीं पचीस रुपये जो इनाम मिले थे, उसे एकत्रित कर करीब पांच सौ एक रुपये पिता को देकर विधिवत गंडा बंधवाया। बहुत सिंपल पर्सन थे पिता। उस समय साढ़े सात साल की उम्र थी। छह साल की उम्र में रामपुर के दरबार में नाचा हूं। बाबू जहां भी नाचे, वहां-वहां ले जाते। लेकिन दुर्भाग्य से जब साढ़े नौ साल का हुआ तो पिता का साया सिर से उठ गया। फिर चाचा की सोहबत में आगे बढ़ा। तबला, बांसुरी, सरोद, सितार आदि सीखा। बांसुरी बाद में छोड़ दी, क्योंकि इससे स्वर पर प्रभाव पड़ता, क्योंकि गाने में दिक्कत होती।

नाचता हूं तो लगता है कृष्‍ण मेरे सामने खड़े हैं

14 साल की उम्र में संगीत भारती में रहा। वहां भारती कला केद्र रहा। वहां नृत्य नाटिका की। कथा रघुनाथ रामायण तीन घंटे की। कृष्ण लीला की। फिर एक अतुकांत कविता पर नृत्य किया। उसे खुद लिखा भी और कंपोज भी किया...मैं एक लोहे का टुकड़ा हूं...। बस कत्ल कत्ल, कत्ल, एक दूसरा लोहा उठाया, उसे मंदिर का घंटा बनाया। मंदिर की शोभा बढ़ता रहा। तो घुंघरूओं की रोशनी में कविता भी लिखता हूं, पेंटिंग भी करता हूं, तबला भी बजता हूं, सरोद भी बजाता हूं। पर, आज ये चीजें सेंकेंडरी हैं। नृत्य ही प्रमुख है। बाबा की पांच हजार ठुमरी, उसी को बजाता हूं। सुनाता हूं। रसिकों का प्यार मुझे बहुत मिला। बड़े लोगों ने खूब आशीर्वाद दिया। डांस को बहुत प्यार करता हूं। हर मूवमेंट को देखता हूं, तो लगता है, कृष्ण मेरे सामने खड़े हैं। कभी अकेला नहीं नाचता। वह नाचते हैं और साथ-साथ मैं नाचता हूं।

माधुरी दीक्ष‍ित के अंदर कुदरतन एक भाव है

सत्यजीत रे शतरंज के खिलाड़ी बना हरे थे। उन्होंने नृत्य की बात कही। बोले, कोई सेट नहीं होगा। नृत्य में नाखून तक दिखाना चाहता हूं। गाना क्या हो, तो ठुमरी गाई ? अमजद खान वाजिद अली शाह बनकर बैठे थे। इसके बाद यश चोपड़ा ने फोन किया, तो माधुरी दीक्ष‍ित के लिए नृत्य किया। माधुरी दीक्ष‍ित आगे बढ़ीं, तो देवदास, डेढ़ इश्किाया, बाजीराव मस्तानी में। संजय लीला भंसाली मन को समझते हैं। डिस्टर्ब नहीं करते। फिल्मी नाच झमेले वाला होता है। मैं पहले ही पूछता हूं, हेरोइन कपड़ा पहनेगी न। इसके बाद दीपिका पादुकोण ने कोशिश की, बाजीराव में। लेकिन माधुरी दीक्षित के अंदर कुदरतन एक भाव है। अभी तक मेरी फेवरेट हैं।

अब मैं पूजा कर रहा हूं, नाच नहीं रहा हूं

जीवन के इस मोड़ पर इस उम्र में सांसारिक जीवन से विरक्ति होती है। लेकिन नृत्य-संगीत प्रभु की ओर ध्यान दिलाने लगता है। मीरा, सूरदास ने खूब रचा। मीरा ने प्रोग्राम के ल‍िए नहीं नाचा। रिदम में रामायण लिख दिया कवियों ने। भक्ति तो माध्यम है। अब मुझे लगता है, मैं पूजा कर रहा हूं, नाच नहीं रहा हूं।

(पंड‍ित बिरजू महाराज का यह साक्षात्‍कार अगस्त 2017 में दैनिक जागरण के ल‍िए संजस कृष्‍ण ने ल‍िया था।)

Edited By: M Ekhlaque