रांची, (राकेश कुमार सिंह)। 1857 का सिपाही विद्रोह वस्तुत: ब्रितानी साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत का पहला मुक्तिकामी महासंग्राम था। अकादमिक इतिहास की पुस्तकों में इस महासमर में पलामू की जनजातियों के योगदान को बहुत महत्व नहीं दिया गया जबकि नवीनतम शोध और दस्तावेजी सच्चाइयों से यह रहस्य उद्घाटित होने लगा है कि 1857 के संघर्ष के दो वर्ष तक पलामू की जनजातियां लगभग हारी हुई लड़ाई को लड़ती रही थीं। इस जनयुद्ध के नायक भोगता थे। भोगता जनजाति के दो सहोदर भाई पीतांबर साही और नीलांबर साही।

टूट गया झूठा अहंकार

मंगल पांडेय की फांसी की खबर जब झारखंड तक पहुंची तो पठार सुलग उठा। हजारीबाग जेल ढहा दी गई। इधर, बड़कागढ़ के विश्वनाथ शाहदेव और भंवरी के पांडेय गणपत राय के नेतृत्व में हुए ‘हटिया युद्ध’ में अंग्रेजी पलटन की अपराजेयता का मिथक टूट चुका था। अंग्रेजी राजसत्ता का मान, शक्ति, सम्मान और अहंकार सब कुछ छोटानागपुर खास में मटियामेट हो चुका था। छोटानागपुर में अंग्रेजी सत्ता ध्वस्त हो चुकी थी और कानून व्यवस्था विश्वनाथ शाहदेव के हाथों आ गई थी। तब पलामू के 12 गांवों की छोटी सी जागीर ‘चेमो-सनेया’ के भोगता जागीरदार पीतांबर साही रांची में थे। सूचना थी कि विद्रोह का यह चक्रवात रांची तक ही नहीं रुकने वाला था। हजारीबाग जेल से मुक्त हुए कैदियों की स्वतंत्र पलटन रांची विजय के बाद बाबू कुंवर सिंह की सेना से जुड़ने के लिए रोहतास कूच करने वाली थी। पीतांबर भी अविलंब चेमो सनेया के लिए निकल पड़े।

उबलता अग्निगर्भ

पीतांबर के पिता भोगता के मुखिया चेमू सिंह की 12 गांवों की पुश्तैनी जमींदारी थी। कोल विद्रोह में अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध सक्रियता के आरोप में अंग्रेजों ने चेमू सिंह की जमींदारी जब्त कर उन्हें निर्वासन में धकेल दिया था। इसी दौरान चेमू सिंह का निधन हो गया। पिता की अपमानजनक मृत्यु और अब फिरंगियों की गुलामी पीतांबर-नीलांबर के कलेजे में शूल की भांति धंस चुकी थी। भोगता समाज के भीतर अंग्रेजी दासता के प्रति आक्रोश और प्रतिशोध का लावा उबलता रहता था। अंग्रेजों ने पलामू के चेरो राजा चुरामन राय को राजगद्दी से धकेलकर पलामू परगना को नीलाम कर खरीद लिया था। चेरो लोग भी औपनिवेशिक व्यवस्था की हड़प नीति के कारण भीतर-भीतर उबल रहे थे परंतु अंग्रेजी राज के विरुद्ध मुंह खोलने का साहस नहीं था। तब नीलांबर-पीतांबर ने चेरो लोगों के साथ मिलकर खरवार लोगों को भी अपने साथ जोड़ा और इस तरह अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध पलामू में चेरो-खरवार भोगता गठबंधन तैयार हो गया।

टूट गई अंग्रेजी कानून व्यवस्था

पलामू की ओर अग्रसर आजाद देसी पलटन और अंग्रेजी फौज के बीच चतरा में घमासान युद्ध हुआ था, जिसमें देसी पलटन की करारी हार हुई थी। पलामू अभियान की कमर टूट चुकी थी, लेकिन नीलांबर-पीतांबर परचम उठाए लोगों में स्वाधीनता का स्वाभिमान जगाते अंग्रेजी सत्ता से दो-दो हाथ करने निकल पड़े थे। नीलांबर के नेतृत्व में 10 हजार विद्रोहियों ने डालटनगंज से दो मील दक्षिण-पश्चिम स्थित ठकुराई रघुवर दयाल सिंह की चैनपुर स्थित हवेली को घेर लिया था। दोनों ओर से चार-पांच घंटे तक बेनतीजा गोलाबारी के बाद आक्रोशित विद्रोहियों ने कोयल नदी के तट पर स्थित शाहपुर किले पर धावा बोल दिया। किले के आग्नेयास्त्र लूट लिए। शाहरपुर थाना जला दिया गया था। नीलांबर के नेतृत्व में विद्रोही दल लेस्लीगंज पर कहर बनकर टूटा था। लेस्लीगंज के तमाम सरकारी भवन फूंक दिए गए। पलामू में नीलांबर-पीतांबर के आंदोलन की हाहाकारी शुरुआत हो चुकी थी। सीधी लड़ाई से बचते हुए नीलांबर-पीतांबर गुरिल्ला युद्ध लड़ रहे थे। नीलांबर के बेटे कुमार शाही ने सरदार परमानंद और भोज-भरत के साथ पलामू किले पर भी कब्जा कर लिया था। तिलमिलाए अंग्रेजों ने पूरी ताकत के साथ पलामू किले पर हमला बोल दिया। पलामू किले पर पुन: कब्जा करने के बाद डाल्टन ने लेस्लीगंज को मुख्यालय बनाकर नीलांबर-पीतांबर के दमन की तैयारी की। कर्नल टर्नर पलामू के जंगलों की खाक छानता रहा पर नीलांबर-पीतांबर का कोई सुराग नहीं मिल रहा था। खीज और क्रोध से उबलते टर्नर ने चेमो-सनेया पर आक्रमण कर दिया, लेकिन गुरिल्ला लड़ाकों के सामने कोई टिक नहीं सका। मनिका, छतरपुर, लातेहार, महुआडांड़, छेछारी जैसे महत्वपूर्ण अंग्रेजी ठिकानों पर नीलांबर-पीतांबर के आक्रमण ने अंग्रेजी कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी थीं।

लगाया एड़ी-चोटी का जोर

विश्वनाथ शाहदेव और पांडेय गणपत राय को फांसी हो चुकी थी। लाल किले पर अंग्रेजी ध्वज अभी भी था परंतु पलामू में नीलांबर-पीतांबर की तूती बोल रही थी जो अंग्रेजी राज के लिए बड़ी अपमानजनक थी। अंग्रेजों ने ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अपनाई। सबसे पहले खरवारों को बरगलाया। भ्रमित खरवार आंदोलन से अलग हो गए। फिर अंग्रेजों ने चेरो जागीरदार भवानीबख्श राय का भयादोहन कर शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए। भवानीबख्श राय के टूटते ही पूरा चेरो समाज गठबंधन से अलग हो गया और दोनों भाई अकेले पड़ गए। अंग्रेजों ने अब चेमो सेनेया की सख्त नाकेबंदी कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, फिर भी दोनों भाई पकड़ में नहीं आए। हालांकि सनेगा गांव के भूखा साह और शिवचरण मांझी जैसे विश्वस्त साथी अंग्रेजों के मुखबिर बन गए तो दोनों भाई टूट गए। अंग्रेजों ने एक और चाल चली। उन्होंने सर्वक्षम-माफी और विस्मरण की घोषणा की। यह तय समयसीमा के भीतर आत्मसमर्पण करने वाले विद्रोहियों को क्षमा करने की नीति थी। पीतांबर और कुमार शाही ने आत्मसर्मण कर दिया। जिसके बाद उद्विग्न नीलांबर ने भी समर्पण कर दिया।

बिना सबूत के मिली सजाएं

लेस्लीगंज की अदालत में विद्रोहियों पर लूट, हत्या, आगजनी, राजद्रोह आदि आरोपों के लिए मुकदमे चलाए। हालांकि अंग्रेजी सरकार एक भी महत्वपूर्ण गवाह नहीं जुटा सकी थी, फिर भी परिस्थितिजन्य सबूतों और खरीदी गई गवाहियों के आधार पर अभियुक्तों की सजाएं निर्धारित की गईं। पीतांबर के मामले में नरमी बरतते हुए आजीवन निर्वासन यानी काला पानी, कुमार शाही को 14 साल सश्रम कारवास की सजा मिली और नीलांबर को फांसी की सजा हुई। मार्च 1859 को फांसी की सजा दे दी गई थी।

(लेखक हिंदी के जाने-माने कथाकार हैं)

Edited By: M Ekhlaque