स्वामी विवेकानंद के ध्येय वाक्य- यदि बच्चे विद्यालय तक नहीं पहुंच पाते तो विद्यालय को बच्चों तक पहुंचना होगा- को आधार मानते हुए एवं आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक भाऊराव देवरस की प्रेरणा से वर्ष 1989 में धनबाद के टूंडी प्रखंड में एकल विद्यालय प्रारंभ किया गया। एकल विद्यालय प्रारंभ करते हुए एक शिक्षक-एक विद्यालय की परिकल्पना बनी थी। धीरे-धीरे इसी एकल विद्यालय ने एकल अभियान का रूप ले लिया है।

1989 में ओडिशा के सह प्रांत प्रचारक के पद से श्यामजी गुप्त को वनवासी क्षेत्र में काम करने के लिए भेजा गया। उन्होंने जंगलों एवं सुदूर गांवों में काम करते हुए गरीबी व अशिक्षा को नजदीक से देखा था। जब उन्हें झारखंड के वनवासी क्षेत्रों में काम करने के लिए भेजा गया, तब इन इलाकों में साक्षरता का प्रतिशत 30 के भी नीचे था। ग्रामीण महिलाओं की स्थिति तो और खराब थी।

बाहरी लोगों को देखते ही बच्चे जंगल की ओर भाग जाते थे। परन्तु उस समय भी बड़ी-बड़ी इमारतें एवं चहारदीवारी बनाकर विदेशी कॉन्वेंट के स्कूल एवं चर्च झारखंड के गांवों में प्रभावी थे। फिर स्वामी विवेकानंद के ध्येय वाक्य से प्रेरणा लेते हुए धनबाद में इसे प्रारंभ किया गया।

संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्यामजी गुप्त की देखरेख में काम आगे बढ़ा। आज एकल से जुड़े लोग अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड सहित कई देशों में हैं। एकल के प्रयास से रांची सहित झारखंड के सभी जिलों में साक्षरता प्रतिशत बढ़ गया है। बच्चे शिक्षित हो रहे हैं। रांची के आरोग्य भवन में इसका केंद्रीय मुख्यालय है।

78536 हजार गांवों में चल रहा है एकल विद्यालय
झारखंड के 60 विद्यालयों से प्रारंभ होकर मात्र 27 वर्षों में देश के लगभग सभी प्रांतों में यथा उत्तर से दक्षिण (कश्मीर से कन्याकुमारी) एवं पूरब से पश्चिम (असम से गुजरात) तक कार्य फैल चुका है। वर्तमान में झारखंड में 6510 एवं पूरे देश में 78536 गांवों में एकल विद्यालय संचालित हैं। लक्ष्य इस संख्या को एक लाख तक पहुंचाने का है।

एकल के पंचमुखी आयाम से बदल रहा समाज

1. प्राथमिक शिक्षा: छह से 14 वर्ष तक की आयु वर्ग के गांव के बच्चों को (जो स्कूल नहीं जाते हैं) अनौपचारिक विधि से आनंदमय वातावरण में खेल-कहानी एवं प्रयोग के माध्यम से गट रचना कर गांव के सुविधानुसार तीन घंटे तक विद्यालय चलाकर पढ़ाने का काम किया जाता है। भाषा, गणित, सामान्य ज्ञान, हस्तशिल्प, स्वास्थ्य शिक्षा, योग-शारीरिक, खेलकूद एवं संस्कार सात विषयों की शिक्षा दी जाती है।

ग्रामीण परिवेश को देखते हुए गांव के ही युवक या युवती का चयन कर उसे सघन प्रशिक्षण के द्वारा पठन पाठन के लायक तैयार किया जाता है। कक्षा 4 से 5 के बाद बच्चों का नामांकन सरकारी विद्यालयों में करा दिया जाता है।

2. आरोग्य शिक्षा: ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले रोगों में 70-75 फीसद वैसे रोग हैं जो स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के अभाव में यथा गंदे पानी तथा उपयुक्त आहार की कमी के कारण हो रहे हैं। ग्रामीणों विशेषकर महिलाओं में यदि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता ला दी जाए तो अधिकांश रोगों का स्वयं निदान हो जाएगा।

इसे ही ध्यान में रखते हुए आरोग्य योजना के माध्यम से हर गांव की महिलाओं की आरोग्य समिति बनाकर साप्ताहिक पाठशाला के माध्यम से डायरिया, मलेरिया, सामान्य बुखार, कुपोषण, टीकाकरण मातृ शिशु सुरक्षा आदि विषयों की शिक्षा दी जाती है।

3. ग्राम विकास: गौ आधारित खेती एवं कृषि आधारित ग्राम उद्योग के लक्ष्य के साथ ग्राम विकास का कार्यक्रम चलाया जा रहा है। देश में चल रहे ग्राम विकास के सिद्धांत को ही एकल अभियान ने बदल कर दिखाया हैं। आज गौ आधारित खेती के आधार पर खड़े किये गये ग्रामोद्योग के कार्य गांव में स्थायी विकास के मॉडल बन रहे हैं। रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव को देखते हुए जैविक खेती के द्वारा पोषण वाटिका अभियान को बल दिया गया है।

देश भर में आज 65 हजार किसान पोषण वाटिका के माध्यम से अपने गांव में रहकर ही लाखों की कमाई करने लगे हैं। गत 5-7 वर्षों से देश भर में ग्राम विकास के कार्य में गति आई। किसानों ने कई प्रकार से जैविक खाद बनाये। देश में 65 हजार से ऊपर के लोगों ने जैविक बेड लगाकर 35-40 हजार टन जैविक खाद का उत्पादन किया एवं इसके कारण से जैविक उत्पादन हो रहा है।

4. स्वाभिमान जागरण
स्वाभिमान जागरण अभियान के माध्यम से ग्राम स्वराज्य मंच की स्थापना कर ग्रामीण युवाओं में उत्साह एवं समाज-देश और राष्ट्रीय महापुरुषों के प्रति स्वाभिमान का जागरण हो रहा है।

5. एकल की कथाकार योजना
संस्कार शिक्षा के माध्यम से वनवासी एवं जनजातीय समाज में अनेकों सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं। पहली बार जनजातीय एवं वंचित समाज के लड़के-लड़कियां अयोध्या, वृन्दावन जैसे धाम में प्रशिक्षण लेकर गांव-गांव में कथा वाचन एवं सत्संग चलाना प्रारंभ किये हैं। आज तक जो काम बड़े-बड़े धर्माचार्य एवं संत महात्मा नहीं कर पाये वह कार्य इन छोटे-छोटे कम पढ़े-लिखे वनवासी ग्रामीण युवक-युवतियों के द्वारा हो रहा है।

मिशनरीज के सफेद वस्त्रधारी सिस्टर-ब्रदर्स के सामने अब गांव-गांव में भगवा साड़ी-कुर्ता पहने स्थानीय समाज की युवतियां भी गांव में अपने धर्म संस्कृति की सुरक्षा के लिए संघर्षरत हैं। गो हत्या, मद्यपान सेवन एवं छुआछूत में कमी आई है।

प्रभाव:
पहले मिशनरीज के लोग जब गांवों में जाते थे तो वे लोगों में एक स्वाभाविक आकर्षण का केंद्र होते थे पर आज स्थिति बदल गई है। आज उन्हें गांवों में महत्व मिलना बंद हो रहा है। धर्मांतरण तो दूर अब लोग स्वधर्म में आना प्रारंभ कर दिये हैं। गो-गंगा-गायत्री एवं तुलसी-सीता-सावित्री की महिमा गांव-गांव में स्थापित हो रही है। अयोध्या, वृन्दावन, नाडियाद एवं नवद्वीप जैसे केंद्रों में कथा प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की गई है। 2500 से अधिक कथाकारों का प्रशिक्षण हो चुका है।

- लल्लन कुमार शर्मा, एकल अभियान के केंद्रीय सह अभियान प्रमुख

By Nandlal Sharma