रांची [मुजतबा हैदर रिजवी]। असम और मिजोरम की तरह झारखंड और ओडिशा के बीच सीमा विवाद चल रहा है। ओडिशा झारखंड में लगभग डेढ़ किलोमीटर अंदर तक घुस आया है और आठ गांव पर कब्जा जमा लिया है। झारखंड के सीमावर्ती गांव के लोगों की जमीनों पर कब्जा कर लेने से यह लोग भूमिहीन हो गए हैं। सीमा पर तनातनी रहती है। दोनों तरफ के लोगों के बीच कई बार लाठियां चल चुकी हैं। झारखंड सरकार ने कई बार ओडिशा से इस समस्या पर वार्ता की लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकल सका है।

झारखंड और ओडिशा के बीच सीमा विवाद की कई साल से चल रहा है। 1976 में गृह मंत्रालय ने हस्तक्षेप किया था और गृह मंत्रालय के अधिकारी ने जमशेदपुर आकर सर्किट हाउस में दोनों प्रदेशों के अधिकारियों के साथ बैठक कर मामले की छानबीन की थी। बिहार राज्य के राजस्व के दस्तावेज देखने के बाद गृह मंत्रालय के अधिकारी ने उड़ीसा को कब्जा हटा लेने का निर्देश भी दिया था। लेकिन उड़ीसा ने आज तक इस पर अमल नहीं किया है।

ओडिशा ने जिन आठ गांवों पर कब्जा जमाया है, वह पूर्वी सिंहभूम जिले के बहरागोड़ा अंचल के महुलडंगरी और गुड़ाबांदा अंचल के सोना पेटपाल, छेरघाटी, काशीपाल, कुड़िया, मोहन पाल, भुरसन व कोइमा गांव हैं। इनमें से सात गांवों पर गुड़ाबांदा अंचल के सोना पेटपाल, छेरघाटी, काशीपाल, कुड़िया, मोहन पाल, भुरसन, गुड़ाबांदा का कोइमा गांव पर उड़ीसा ने 1964 में कब्जा जमाया था। यह बे चिरागी गांव थे। यानी यहां सिर्फ खेत थे। कोई आबादी नहीं थी। यह खेत झारखंड (तत्कालीन बिहार) के सीमावर्ती गांव के लोगों के लोगों के थे।

साल 2018 में हुआ था माहौल डांगरी पर ओडिशा का कब्जा

ओडिशा ने बहरागोड़ा अंचल के महुलडांगरी गांव में तीन साल पहले नवंबर 2018 में कब्जा जमाया था। नवंबर 2018 में ओडिशा के मयूरभंज जिले के सिरसा और नेदा गांव के लोग माहुलडांगरी में घुस आए। माहुलडांगरी गांव में झारखंड के सीमावर्ती गांव का कांसा लगा हुआ था। कांसा से यह लोग टोकरी बनाते हैं। जब यह लोग टोकरी बनाने के लिए कांसा काटने गए तो सिरसा और नेदा गांव के लोगों ने मिलकर किसानों पर पथराव कर दिया। दोनों तरफ से पथराव हुआ। लेकिन महुलडांगरी गांव के लोग कमजोर पड़ गए। गांव के लोग बताते हैं कि ओडिशा की पुलिस भी सिरसा और नेदा गांव के लोगों के साथ थी और झाड़पोखरिया थाना की पुलिस ने लाठी चार्ज कर बहरागोड़ा के लोगों को खदेड़ दिया था। इस तरह साल 2018 में बहरागोड़ा प्रखंड के 500 एकड़ में फैले माहुल डांगरी एरिया पर भी ओडिशा ने कब्जा जमा लिया। अब ओडिशा के कब्जे में आच गांव की लगभग ढाई हजार एकड़ जमीन है।

2018 में ही ओडिशा ने कोइमा-रातुला सड़क पर भी कर लिया कब्जा में साल 2018 में कोईमा-रातुला सड़क पर भी कब्जा कर लिया। यह सड़क पहले पूर्वी सिंहभूम जिले में थी। तकरीबन एक किलोमीटर लंबी इस सड़क के ऊपर मयूरभंज जिला प्रशासन ने नई सड़क बना दी और इस कब्जा कर लिया। अब मयूरभंज जिले की पुलिस इस सड़क तक हफ्ते में तीन चार-बार गश्त करती है। यह सड़क ओडिशा के झारपोखरिया और सारस कोना से झारखंड सीमा तक आने वाले गांव को जोड़ती है। अधिकारी बताते हैं कि इस सड़क का निर्माण 2014 में बहरागोड़ा के बेलाजुड़ी पंचायत ने करवाया था।

कोइरा नाला के रास्ता बदलने से ओडिशा ने उठाया फायदा

स्वर्णरेखा नदी में गिरने वाले कोइरा नाले के कटाव और दिशा बदलने से भौगोलिक स्थिति में हुए परिवर्तन का उड़ीसा ने फायदा उठाया। झारखंड और ओडिशा के बीच कोइरा नाला को सीमा माना गया है। कोइरा नाला बराबर झारखंड की सीमा की ओर अपनी दिशा बदल रहा है। बताते हैं कि झारखंड की तरफ जितना यह नाला घुसा, उधर ओडिशा के पड़ोसी सीमावर्ती गांव के लोगों ने झारखंड की जमीन पर कब्जा जमाते चले गए। पूर्वी सिंहभूम जिले के इन सात गांव के लोग जब खेती करने अपने इलाके में अपने खेतों पर गए तो वहां से मार कर भगा दिया गया। मामला जब सरकार के स्तर तक पहुंचा तो झारखंड सरकार के अधिकारियों ने उड़ीसा सरकार के अधिकारियों से वार्ता भी की लेकिन कोई हल नहीं निकल सका।

10 दिसंबर 1983 को झारखंड ने सात गांवों पर दोबारा कर लिया था कब्जा

10 दिसंबर 1983 को झारखंड के सिंहभूम के डीसी ने इन सात गांवों पर कब्जा करने की योजना तैयार की थी। डीसी सिंहभूम जिले के अधिकारियों के साथ ही भारी संख्या में पुलिस का लाव लश्कर लेकर सीमा पर पहुंचे और किसानों को बुलाकर खूंटागड़ी करवाई। सभी सातों गांव को झारखंड की सीमा में लेते हुए खूंटे गाड़ दिए गए। सातों गांव के लोग भी मौके पर मौजूद थे। इसकी जानकारी मिलते ही मयूरभंज के डीसी भी पुलिस फोर्स के साथ पहुंचे। लगा कि दोनों तरफ से टकराव होगा। लेकिन डीसी सिंहभूम के समझाने पर वह वापस लौट गए।

हफ्ते भर में ही ओडिशा ने दोबारा गांव पर कर लिया कब्जा

ओडिशा के अधिकारियों ने आकर पुलिस की मदद से सभी खूंटे उखाड़ दिए और खेतों में काम कर रहे किसानों को वहां से मार भगाया। इस तरह झारखंड के इन सातों गांवों हफ्ते भर के अंदर ही ओडिशा के अधिकारियों ने दोबारा कब्जा जमा लिया और अब तक इनका कब्जा बरकरार है।

कब-कब हुआ विवाद सुलझाने का प्रयास

पहला प्रयास- 9 सितंबर 1962

जमशेदपुर सर्किट हाउस में दोनों राज्यों के अधिकारियों की बैठक हुई। इसके बाद 16 सितंबर को स्थल का अधिकारियों ने किया संयुक्त निरीक्षण किया। 1963 से 1965 तक लगातार चली संयुक्त बैठक में नहीं निकला कोई हल।

दूसरा प्रयास-1972 में तत्कालीन बंदोबस्त अधिकारी महेंद्र सिंह ने सभी गांव का किया स्थल निरीक्षण और विवादित जमीन को बिहार राज्य की बताया। ओडिशा सरकार से बात की गई। उन्हें दस्तावेज सौंपे गए। लेकिन समस्या का कोई समाधान नहीं हो सका।

तीसरा प्रयास- 6 जनवरी 1976 को गृह मंत्रालय के अधिकारी केवी के सुंदरम ने दोनों राज्यों के अधिकारियों के साथ जमशेदपुर में बैठक की। गृह मंत्रालय ने सात गांवों में बिहार का राजस्व प्रशासन होने का सबूत देखने के बाद बिहार के दावे को सही माना और ओडिशा को गांव खाली करने के निर्देश दिए। लेकिन उड़ीसा सरकार ने इस निर्देश पर आज तक अमल नहीं किया।

चौथा प्रयास- 10 दिसंबर 1983 को सिंहभूम में मयूरभंज के डीसी ने स्थल का निरीक्षण किया। सिंहभूम के डीसी के आदेश पर सातों गांवों को झारखंड की सीमा में लेते हुए खूंटा गड़ी हुई।

पांचवा प्रयास- 19 अगस्त 1992 को दोनों राज्यों के अधिकारियों की जमशेदपुर में हुई बैठक। अगली बैठक की तय हुई रूपरेखा।

छठा प्रयास-- 13 जुलाई 2005 को झारखंड और उड़ीसा के अधिकारियों की भुवनेश्वर में हुई बैठक। इसके बाद अधिकारियों ने संयुक्त रुप से स्थल का निरीक्षण करने का लिया निर्णय।

सातवां प्रयास-3 और 4 अप्रैल 2008 को दोनों राज्यों के अधिकारियों ने सातों गांवों का संयुक्त रूप से किया स्थल निरीक्षण।

आठवां प्रयास-जून 2016 में दोनों अधिकारियों की बैठक हुई। प्रशासन की तरफ से सरकार को सर्वे रिपोर्ट दी गई। सरकार ने इसे ओडिशा के अधिकारियों के साथ शेयर किया। अगले चक्र की बातचीत पर सहमति बनी।

नवां प्रयास- जून 2018 में ओडिशा की पुलिस द्वारा झारखंड के ग्रामीणों के साथ मारपीट करने के बाद सीओ गुड़ाबांदा और बहरागोड़ा ने सीमा का निरीक्षण कर ओडिशा के अधिकारियों से बात की। लेकिन कोई फायदा नहीं निकला।

Edited By: Vikram Giri